
अरुण जोशी - दक्षिण एशियाई कूटनीतिक मामलों के जानकार,
रमजान के पाक महीने की सबसे पवित्र रात शब-ए-कद्र पर पाकिस्तान ने काबुल में एक अस्पताल पर हवाई हमला कर उसे मलबे में तब्दील कर दिया। 16 मार्च को की गई इस भीषण बमबारी में करीब 400 बेगुनाहों की मौत हो गई। पाकिस्तान जिसे पड़ोसी देश के खिलाफ 'खुली जंग' कह रहा है, यह उसमें अब तक का सबसे बर्बर और घातक हमला है। अस्पताल जैसे संवेदनशील और मानवीय स्थल पर हमला केवल सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि भारत के साथ अपने संबंध मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे और इस्लामाबाद के प्रभाव से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे अफगानिस्तान को अपने दबाव में लाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है। दरअसल, पाकिस्तान क्षेत्र में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए अपने पंख फैलाने की कोशिश में है।
पाकिस्तान ने यह हमला ऐसे समय पर किया है, जब पूरी दुनिया पिछले तीन हफ्तों से मध्य-पूर्व एशिया में चल रहे युद्ध में उलझी हुई है। इस वैश्विक व्यस्तता का लाभ उठाकर उसने अफगानिस्तान पर आक्रामक कार्रवाई शुरू कर दी। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) जैसे पाकिस्तान विरोधी आतंकी संगठनों को पनाह दी जा रही है। साथ ही, उसे तालिबान के भारत के करीब आने से भी छटपटाहट है। लेकिन यह रणनीति उलटी भी पड़ सकती है और पूरे दक्षिण एशिया में अस्थिरता फैल सकती है। इस हमले ने पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को भी बेनकाब किया है। भारत ने अफगानिस्तान में पाकिस्तान की कार्रवाई की कड़ी निंदा कर बिल्कुल सही किया और इसे साफ तौर पर मानवता के खिलाफ अपराध बताया। विदेश मंत्रालय ने साफ कहा कि सैन्य कार्रवाई के नाम पर ऐसे जघन्य अपराधों को छिपाया नहीं जा सकता।
पाकिस्तान को लगा कि जब पूरी दुनिया पश्चिम एशिया के संघर्ष में उलझी हुई है और वहां की स्थिति ने वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारी उथल-पुथल मचा रखी है, तो वह अफगानिस्तान में आम नागरिकों के खिलाफ किए गए अपने अपराधों से बच निकलेगा। भारत का संदेश साफ है कि दुनिया के किसी भी कोने में हालात कैसे भी हों, वह निर्दोष नागरिकों के पक्ष में आवाज उठाता रहेगा- खासतौर पर तब, जब हमला आतंक का निर्यातक पाकिस्तान जैसा देश कर रहा हो। यह सवाल भी उठता है कि पाकिस्तान आखिर तालिबान के खिलाफ क्यों हो गया, जबकि आज अफगानिस्तान पर शासन कर रहा तालिबान कभी उसका समर्थन पाकर ही सत्ता तक पहुंचा था। जब अगस्त 2021 में अफगानिस्तान की सत्ता 20 साल बाद तालिबान ने संभाली और अमरीका को वहां से हटना पड़ा, तब पाकिस्तान ने इसे 'आजादी का पल' बताया था। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि काबुल से अमरीकी सेनाओं की तय समय से पहले वापसी और तालिबान के कब्जे में पाकिस्तान की सेना की भी प्रत्यक्ष भूमिका रही थी। दरअसल, अब तालिबान पाकिस्तान के इशारों पर चलने को तैयार नहीं है।
यही कारण है कि पाकिस्तान उस पर दबाव बनाने के लिए हमलों का सहारा ले रहा है। टीटीपी जैसे संगठन पाकिस्तान के लिए आंतरिक चुनौती बन चुके हैं। इसके साथ ही, पाकिस्तान भारत की ओर से मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में चलाए गए 'ऑपरेशन सिंदूर' से पहुंचे भारी नुकसान से अभी तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है। ऐसे में, अफगानिस्तान पर हमला कर वह क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इसके लिए उसने निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाया है। भारत के लिए इस मामले में प्रतिक्रिया देना केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय दायित्व भी था। भारत और अफगानिस्तान के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। भारत इस अमानवीय कृत्य पर चुप नहीं रह सकता था।
साथ ही, क्षेत्र में चीन-पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकी को देखते हुए भारत के लिए यह भी जरूरी है कि वह अपने हितों और सहयोगियों की रक्षा करे। स्पष्ट है कि पाकिस्तान की यह आक्रामक नीति न केवल अफगानिस्तान-पाकिस्तान संबंधों को और बिगाड़ेगी, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया को अस्थिरता की आग में झोंक सकती है। अब समय आ गया है कि पाकिस्तान यह समझे कि वह इस तरह के हमलों से बच नहीं सकता। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी इस पर गंभीरता से ध्यान देना होगा, ताकि मानवता के खिलाफ ऐसे अपराधों पर रोक लगाई जा सके।
Published on:
19 Mar 2026 01:41 pm
