
अखबारों की आजादी के बारे में लोकतंत्र के नाम पर समय-समय पर देश में बड़े पैमाने पर चर्चा होती रहती है। अखबारों को लिखने की आजादी हो, इससे अच्छी क्या बात हो सकती है। आजादी की हिमायत सुनकर कभी-कभी यह खटका भी होने लगता है कि आजादी खत्म होने के कोई आसार तो नहीं है? एक अखबारनवीस के नाते आजादी की हिमायत करने में, मैं किसी से पीछे भी कैसे रहना चाहूंगा, लेकिन आजादी की बात करते समय मुझे हर घड़ी यह महसूस होता रहता है कि आजादी एक बड़ा महंगा सौदा है और आजादी एक बड़ा बन्धन है जो एक नागरिक को ही नहीं, अखबारों को भी जिम्मेदारी के शिकंजे में कस देती है। अखबारों की आजादी ऐसी भी कोई चीज नहीं है जो बख्शीश में मिलने वाली हो, यह आजादी अखबारों को खुद अपने जिम्मेदार आचरण से हासिल करनी होगी।
कहना न होगा कि जिम्मेदारी के सारे दावे और आजादी की बेशुमार दुहाइयां देने के बावजूद आज देश के अखबारों का आचरण आजादी को बढ़ावा देने वाला नहीं कहा जा सकता। देश के अखबारों के बारे में एक आम शिकायत तो यह है कि वे राजनीति में जरूरत से ज्यादा लिप्त हैं और जनजीवन के दूसरे पहलुओं पर बहुत कम ध्यान देते हैं। परन्तु राजनीति में भी अखबारों की जो भूमिका देखने में आती ही रही है वह पक्षपातपूर्ण रहा है। दूसरे पक्ष को आमतौर पर दरगुजर कर देने में ही अखबारनवीसों का सारा कमाल देखने में आता है। अखबारों का यह आचरण देखकर यह कहना मुश्किल है कि सुप्रीम कोर्ट की या संविधान की दी हुई आजादी का इस्तेमाल भी वे ठीक से कर सकेंगे या नहीं। जैसा कि मैंने ऊपर लिखा कि आजादी एक बड़ा ही महंगा सौदा है और कड़ा बन्धन है।
अखबार अगर समझते हैं कि ज्यादा से ज्यादा पृष्ठ छापें, बड़े-बड़े भवन बना लें और भारी भरकम मशीनें लगा लें तो आजादी बनी रहेगी तो यह उनका भ्रम ही है। हो सकता है आजादी भी बनी रहे लेकिन इज्जत तो मिट्टी में मिल जायेगी और इज्जत गिर जाने के बाद आजादी को बचा पाना मुश्किल हो जायगा। अखबार वाले सहयोगी कहीं यह न समझ बैठे कि मैं आजादी का दुश्मन हूं। मेरा कसूर सिर्फ यही है कि मैं चोर-चोर, मौसेरे भाई वाली एकता को नहीं मानता। आजादी मुझे भी प्यारी है और उसके लिए पूरी कीमत चुकाने को हर घड़ी तैयार रहता हूं, लेकिन मैं आजादी को स्वार्थपूर्ति का हथियार मात्र मानने को तैयार नहीं हूं। आशा है बिरादरी वाले मुझे माफ करेंगे।
(1 दिसम्बर 1972 को 'झूठ व बेईमानी का नाम अखबार नवीसी' आलेख से पत्रिका में हर पहलू को स्थान)
राजस्थान पत्रिका में यह परम्परा रही है कि उसमें किसी विवाद के हर पहलू और हर दृष्टिकोण को स्थान दिया जाता है। विवाद तो आए दिन खड़े होते हैं और अखबारों में खुलकर उनकी चर्चा भी होती है। राजस्थान पत्रिका में यह खासतौर पर विचार रखा जाता है कि हमारी नीति के विरुद्ध आने वाले विचारों को यथेष्ट स्थान दिया जाय। यहां तक कि मेरे विरुद्ध लगाए जाने वाले व्यक्तिगत आपेक्षों को भी प्रकाशन से नहीं रोका जाता। विचारों और समाचारों को इतनी स्वतन्त्रता होना ही चाहिए यह हम लोकतन्त्र की बुनियादी शर्त मानते हैं और उस पर अमल करते हैं। इसके बावजूद हमारा अनुभव यह रहता है कि जिस विचार से लोग सहमत नहीं होते, उसके दमन के लिए तरह-तरह की धमकियां देते हैं। वे यह चाहते हैं कि समाचार पत्र अपना कोई मत या विचार नहीं रखें और उसे प्रकाशित न करें। सिर्फ आंदोलनकारियों की बात का ही समर्थन करें। पत्रिका की आवाज किसी भी धमकी से न बंद हुई है और न होगी।
(29 सितम्बर 1972 को 'आवाज न बंद हुई न होगी' शीर्षक आलेख से)
न्यू यॉर्क के अर्थतंत्र को देखते हुए न्यूयॉर्क टाइम्स में विज्ञापनों की संख्या दूसरे अखबारों से ज्यादा है। अखबार के कलेवर के अलावा उसके स्तंभों को पढ़कर यह जरूर महसूस किया कि न्यूयॉर्क टाइम्स में पत्रकारिता की दृष्टि से ऐसी कोई विशेषता नहीं है जो हमारे देश के अखबारों से उसे श्रेष्ठ सिद्ध कर सके। सिर्फ साधनों की माया है।
(कुलिश जी की पुस्तक 'अमरीका एक विहंगम दृष्टि' से)
युग के सारू सास्त्र छै,
आजकाल अखबार।
सास्त्र चलावै जगत नै,
ये चाले जुगधार।।
('सात सैंकड़ा' से)
'समापन कड़ी'
Published on:
19 Mar 2026 02:06 pm
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