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कुलिश जन्मशती पर्व: जनता के लिए सरकार के साथ और सरकार के खिलाफ भी थे कुलिश जी

राजस्थान पत्रिका के संस्थापक संपादक कर्पूर चन्द्र कुलिश का पत्रकारीय अभियान मात्र एक मकसद के साथ शुरू हुआ था। मकसद था जनता तक जो आवाज पहुंचनी चाहिए, उसे पहुंचाना। उन्होंने इस मकसद से कभी मुंह नहीं मोड़ा। इसके लिए जिस किसी के भी खिलाफ कलम चलानी पड़ी, चलाई। खुल कर चलाई।

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राजस्थान पत्रिका के संस्थापक संपादक कर्पूर चन्द्र कुलिश सब कुछ सरकार के ही भरोसे छोड़ने के बजाय नागरिकों को भी अपनी ज़िम्मेदारी समझने की जरूरत पर बल देते थे। (फोटो: पत्रिका)।

नवंबर, 1972 में जयपुर में नगर परिषद के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए थे। दीवाली का वक्त था। सफाई का त्योहार। लेकिन, जयपुर वालों ने गंदगी में ही मनाई। कुलिश जी ने इस पर सरकार की जबरदस्त खिंचाई की।

15 नवंबर, 1972 को उन्होंने ‘हाय गंदगी’ शीर्षक से अग्रलेख लिखा। इसमें उन्होंने सरकार से सख्त सवाल पूछे और उसे कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने नगर परिषद को भी नहीं छोड़ा। उन्होंने लिखा- इस गंदगी से अचानक कहीं महामारी फैल गई तो? क्या नगर परिषद और सरकार उस वक्त का इंतजार कर रही है?

उन्होंने सरकार को घेरते हुए पूछा- नगर परिषद का जो बुरा हाल है, किसी से छिपा नहीं है। फिर सरकार हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठी है?

जब हड़ताल को बताया लोकतंत्र में मिले अधिकारों का दुरुपयोग

जनता के काम में बाधा आने पर कुलिश जी की कलम रुकती नहीं थी। अप्रैल, 1973 में जब राजस्थान बिजली बोर्ड के टेकनिशियन्स और इंजीनियर्स हड़ताल पर चले गए तो 25 तारीख को उन्होंने लिखा- इस कदम को सरकार क्या, समाज का कोई वर्ग सहन नहीं कर सकता।

हड़ताल करने वालों की नाकामियां गिनाते हुए कुलिश जी ने लिखा- गांधी सागर का पानी बीत रहा है, सतपुड़ा से बिजली नहीं मिल रही है और भाखड़ा की बिजली में कटौती हो रही है। राज्य भर के कल-कारखाने ठप्प हो गए हैं। पैदावार बुरी तरह गिर गई है। बिजली की कटौती के कारण जगह-जगह छंटनी हो रही है और मजदूर की रोजी-रोटी पर आंच आ रही है। उधर भीषण अकाल के कारण गंभीर अन्न संकट व्याप्त है। सारा समाज और शासन एक नाजुक दौर से गुजर रहा है। इस दर्दनाक हालत में बिजली बोर्ड के कर्मचारियों ने हड़ताल का कदम उठा कर कोढ़ में खाज पैदा करने का काम किया है। इस कदम को कोई भी होश-हवाश वाला नागरिक मजदूर आंदोलन की परिभाषा में नहीं लेना चाहेगा।

उन्होंने इस हड़ताल को लोकतंत्र में हमें मिले अधिकार का दुरुपयोग बताया और ‘जन-जन की मजबूरी का फायदा उठाने पर तुल गए हड़तालियों के लिए कठोरतम दंड’ की मांग की।

हर समस्या के लिए सरकार ही दोषी?

कुलिश जी ने अपनी कलम चलाते हुए केवल जनता का ध्यान रखा, किसी वर्ग-समुदाय का नहीं। 1973 में गेहूं के थोक व्यापार से जुड़े सरकार के फैसले का जब थोक व्यापारी विरोध कर रहे थे तो उन्होंने साफ लिखा- सरकार ने यह फैसला किन हालात में किया है, उन्हें ध्यान में रखें, तो व्यापारियों का विरोध न्यायसंगत नहीं कहा जाएगा। व्यापारी हर समस्या के लिए सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं और अपनी कोई जिम्मेदारी मानने को तैयार नहीं हैं और अपने तौर-तरीके भी नहीं बदलना चाहते हैं।

सरकार के जनहित के कदम को खुल कर समर्थन

कुलिश जी को जहां भी लगा कि सरकार का कोई कदम जनहित में है, वहां उन्होंने सरकार का खुल कर साथ दिया। अगस्त, 1974 में जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जयपुर आ रही थीं, तो उन्होंने ‘अन्नपूर्णा खाली हाथ’ शीर्षक से यह अग्रलेख लिखा था।

‘अन्नपूर्णा खाली हाथ’

प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी आज एक विशेष व्रत लेकर जयपुर आ रही हैं। वे पहले भी आई हैं, राजलक्ष्मी के रूप में अपने और अपने दल के लिए वोट मांगने। भवानी के रूप में भारत-पाक युद्ध के दौरान वीर भूमि का आह्वान करने के लिए। आज वे अन्नपूर्णा के रूप में आ रही हैं, लेकिन उनका अक्षय पात्र खाली है और उनके प्रशस्त भाल पर 60 करोड़ जनता का भीमकाय पेट भरने की गहन चिन्ता है।

प्रधानमंत्री की यह यात्रा पिछली सभी यात्राओं से अत्यधिक महत्व रखती है। यही क्या कम है कि इस महान देश की प्रधानमंत्री गेहूं के दाने मांगने को कोने-कोने में जाए। उनके इस अभियान से सहज ही समझा जा सकता है कि देश के सामने अन्न की समस्या कितनी विकट है और उसकी विकटता को कितनी गंभीरता से प्रधानमंत्री ने हृदयंगम किया है। अपने ग्रन्थों में अन्न को देवता कहा गया है। दुर्गा सप्तशती में भूख के लिए कहा गया है ‘या देवी सर्व भूतेषु क्षुधा रूपेण संस्थित:।’ यह शाश्वत सत्य आज सबसे ज्यादा उजागर है।

यह सही है कि तेल के आयात पर विदेशी मुद्रा का खर्च एक हजार करोड़ तक पहुंच गया है, परन्तु इससे अधिक कटु सत्य है कि अन्न के आयात पर करीब-करीब तीन हजार करोड़ की विदेशी मुद्रा खर्च हो रही है। अर्थतन्त्र की इस विकृति के राजनीतिक परिणामों को देखें, तो तस्वीर एकदम खौफनाक दिखाई देती है। जिस देश के सामने अन्न और डॉलर के लिए हाथ पसारो, वही पहुँचा मरोड़ने को तैयार रहता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष में हमारी जमा पूंजी में काफी छीजत हो चुकी है। अगर हालात में सुधार नहीं हुआ, तो वह दिन दूर नहीं, जब हमारी राजनीतिक स्वाधीनता आर्थिक पराधीनता में परिणत हो जाए और हमारी नीतियां भी दूसरों के इशारों पर बनने-बदलने लगें। क्या हम इसे सहेंगे?

प्रधानमंत्री की आज की यात्रा को हमें इसी संदर्भ में देखना है। वे हर एक राज्य में जा रही हैं। कृषि का विषय राज्यों की सूची में आता है, किन्तु राज्यों में जो उदासीनता या शिथिलता इस मामले में देखने में आई है, इसीलिए प्रधानमंत्री ने कदम रखा है ताकि राज्यों की नींद उड़े। मुख्यमंत्रियों की काबलियत अब इस बात में नहीं मानी जाएगी कि उनकी मुट्ठी में कितने विधायक हैं, बल्कि इस बात में समझी जाएगी कि वे कितने लोगों का पेट पाल सकते हैं। अन्न की पैदावार के लिए अब मुख्यमंत्रियों पर सीधी जिम्मेदारी डाली जाएगी। भौगोलिक परिस्थितियाँ और साधनों का रोना सुनने के लिए अब किसी को फुर्सत नहीं है। सीधा सवाल है अपना पेट आप भरने का। अगर वे आज भी दिन के उजाले की तरह दिखने वाली सच्चाई को न समझ पाए, तो उनकी टोपियां उछलते देर नहीं लगेगी, चाहे वह विदेशियों के हाथों उछले या भूखे भारतीयों के हाथों। प्रधानमंत्री के मन में यह बात घर कर गई है और उनकी यात्रा का यही एक संदेश है।

(यह आलेख राजस्थान पत्रिका के संस्थापक संपादक कर्पूर चन्द्र कुलिश की जन्मशती पर प्रकाशित किए जाने वाले उनके विचारों की शृंखला के तहत पेश किया गया है।)