भीतर की शून्यता असल में खरा सोना है, जिसके पास है वह असल में अमीर है, जिसके पास नहीं है वह सिर्फ गरीब ही नहीं है, बल्कि बीमार भी है।
दमन आहूजा, स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार
परेशान हम सब इसीलिए हैं कि भीतर बहुत स्ट्रेस है, प्रेशर है, गोल्स हैं, अवसाद है, चिंता है, तैयारी है, गम है और न जाने क्या क्या! रात को नींद नहीं आती, दिन में एक मिनट का भी चैन नहीं मिलता। न खाने का सुख, न चलने का सुख, न बैठने का सुख, न कमाने का सुख, न खर्च करने का सुख! वास्तव में भीतर कुछ नहीं है, भीतर कुछ नहीं होता, भीतर केवल शून्यता होती है। न विश्वास हो तो भीतर देखने की कोशिश कर लो, यदि कुछ दिखाई दे जाए तो बताना!
शारीरिक दृष्टि से यदि महसूस करोगे तो भीतर किडनी, लिवर, गाल ब्लेडर, छोटी आंत, बड़ी आंत, फेफड़े, दिल, रक्त संचार और जो शरीर के चित्र में आपने देखा होगा, वे दिखाई देंगे, लेकिन कहीं भी ऊपर लिखित चीजें नहीं दिखाई देंगी। असल में जो है वो तो सिर्फ बाहर ही है। धुंआ, आवाज, भागदौड़, नौकरी, उसकी टेंशन, व्यापार की चिंता, युद्ध, ट्रंप, गैस, तेल संकट, महंगाई और भी सब कुछ बाहर ही तो है। हमने अपने भीतर इस सब को खुद डाला है और परेशान होकर बैठे हैं। बच्चों को इनकी जानकारी नहीं होती इसलिए वे सहज आनंद से हमेशा निश्चल दिखते हैं।
कभी-कभी भीतर देखने की कोशिश कीजिएगा तो पता चलेगा कि वहां तो सिर्फ बाहर की प्रतिध्वनि है। जो हम खुद ही भीतर डाल रहे हैं। आपके घर में किसने आना है, किसने नहीं आना है, वह तो आपने स्वयं तय करना है, किसे बसाना है, किसे बाहर से ही अलविदा करना है, ये भी आपने स्वयं ही तय करना है, किसे कितने समय तक भीतर रखकर बाहर छोडऩा है ये भी आप ही तय करेंगे। फिर चाहे, वे लोग हों, सामान हो, या विचार हों! यदि ये साधारण-सी युक्ति हम समझ लें तो जितने बाहर हम बन संवर के रहते हैं उतने ही भीतर भी व्यवस्थित हो जाएंगे। आवश्यक सामान रखेंगे और अनावश्यक बाहर कर देंगे। भीतर की शून्यता असल में खरा सोना है, जिसके पास है वह असल में अमीर है, जिसके पास नहीं है वह सिर्फ गरीब ही नहीं है, बल्कि बीमार भी है। चूंकि वह अपने होने का आनंद नहीं ले पा रहा है एवं मनुष्य होने के बावजूद बिना विवेक के पशुवत जीवन ही बिता पा रहा है।
चलने का आनंद, खाने का आनंद, नहाने का आनंद, सोने का आनंद, सुबह सुबह पक्षियों की आवाजों को सुनते हुए, उगते हुए सूरज के साथ चाय पीने का आनंद- इस सब में बाहरी पैसों की बहुत जरूरत नहीं है, जरूरत है तो केवल सामान्य जरूरतों संग सरल जीवन को जीने के नजरिए की। इसे हम स्वयं विकसित कर सकते हैं। कुल मिलाकर अपना जीवन जीने की कीमत को यदि सस्ता किया जाए, तो दिमाग में अनावश्यक भागदौड़ स्वयं समाप्त हो जाएगी।
आनंद तो प्रकृति में सर्वत्र बिखरा पड़ा है। हमने ही ज्यादा पैसे और महत्वाकांक्षाओं के लालच में इन्हें देखना-महसूस करना छोड़ दिया है। ये पशुवत जीवन हम न बिताएं, इसकी चाबी भी हमारे पास अपनी-अपनी है, किसी दूसरे की चाबी से अपने भीतर का ताला खोला नहीं जा सकता। वजह साफ है कि सबके पास अपने-अपने परिवेश हैं, अपनी-अपनी समस्याएं हैं। भीतर जाने के लिए अपने द्वारा लगाए अनावश्यक इच्छाओं के ताले हमें स्वयं अपनी चाबी से खोलने होंगे। यह चाबी है सजगता की, यानी हम इस पल में होकर सिर्फ इतना तय कर लें कि हमारे भीतर क्या विचार प्रवेश करेंगे, क्या नहीं- तो आपके भीतर कभी कलह का, क्लेश का, बहस का, ईष्र्या का, बेवजह की अभिलाषाओं का कूड़ा इकट्ठा नहीं होगा।