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अमरीका के रुख से सवालों के घेरे में नाटो की एकजुटता

हॉर्मुज स्ट्रेट में सैन्य उपस्थिति या आक्रामक अभियानों के लिए ठिकानों के उपयोग से परहेज यह दर्शाता है कि अब हर अमरीकी रणनीतिक प्राथमिकता को स्वत: नाटो की सामूहिक प्राथमिकता नहीं माना जाता।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 29, 2026

अपूर्व राकेश पाण्डेय, स्वतंत्र लेखक एवं शोधार्थी

नाटो ने वैश्विक शक्ति-संतुलन और सुरक्षा संरचना को निर्णायक रूप से प्रभावित किया है। नाटो की वास्तविक शक्ति केवल उसकी सैन्य क्षमता में नहीं, बल्कि उस राजनीतिक एकजुटता में निहित रही है, जो साझा खतरे की धारणा और अमरीकी नेतृत्व के तहत विकसित हुई। आज यही एकजुटता प्रश्नों के घेरे में है। यह केवल अस्थायी मतभेद नहीं, बल्कि गठबंधन की प्रकृति में एक गहरे परिवर्तन का संकेत है। इस परिवर्तन के केंद्र में अमरीका की बदलती भूमिका है।

लंबे समय तक वाशिंगटन नाटो का सुरक्षा-प्रदाता और संतुलनकारी केंद्र रहा, जिसने न केवल सैन्य सुरक्षा सुनिश्चित की, बल्कि सहयोगियों के बीच सहमति भी गढ़ी। हाल के वर्षों में अमरीकी दृष्टिकोण अधिक सशर्त और लेन-देन आधारित होता गया है। ट्रंप के दौर में यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से सामने आई, जब नाटो की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाते हुए सुरक्षा गारंटी को वित्तीय योगदान से जोड़ा गया। इससे यूरोपीय सहयोगियों के बीच असहजता स्वाभाविक है। यूनाइटेड किंगडम अपेक्षाकृत अमरीकी रुख के साथ खड़ा दिखाई देता है, वहीं, जर्मनी-स्पेन जैसे देश आर्थिक बाधाओं और भिन्न सुरक्षा प्राथमिकताओं का हवाला देते हुए अधिक सावधानी बरत रहे हैं।

ईरान को लेकर अमरीकी नीति के समर्थन में नाटो को लामबंद करने के प्रयासों को फ्रांस, जर्मनी, यूके और स्पेन जैसे देशों ने सीमित समर्थन दिया है। हॉर्मुज स्ट्रेट में सैन्य उपस्थिति या आक्रामक अभियानों के लिए ठिकानों के उपयोग से परहेज यह दर्शाता है कि अब हर अमरीकी रणनीतिक प्राथमिकता को स्वत: नाटो की सामूहिक प्राथमिकता नहीं माना जाता। नाटो की बदलती वास्तविकता का असामान्य उदाहरण ग्रीनलैंड को लेकर सामने आया। इसके विपरीत, रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में नाटो की एकता अपेक्षाकृत सुदृढ़ दिखाई देती है।

रूस के विरुद्ध यूक्रेन के समर्थन में गठबंधन ने सामूहिक प्रतिक्रिया दी है, जो यूरोपीय सुरक्षा के लिए खतरे की तात्कालिकता को दर्शाती है किंतु यहां भी एकरूपता पूर्ण नहीं है। सैन्य सहायता, ऊर्जा प्रतिबंध और संघर्ष के संभावित समाधान को लेकर मतभेद स्पष्ट हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि नाटो की एकता अब स्वत: स्फूर्त नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुरूप निर्मित होती है। आंतरिक विविधताएं इस प्रवृत्ति को और गहरा करती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में भारत का अनुभव उल्लेखनीय है, जिसने रणनीतिक स्वायत्तता व बहु-संरेखण की नीति अपनाई।

नाटो ऐसे दौर में प्रवेश करता दिखाई देता है, जहां औपचारिक एकता के बावजूद वास्तविक संरेखण लचीला और चयनात्मक होता जा रहा है। यह गठबंधन अब कठोर, एकीकृत राजनीतिक समुदाय की अपेक्षा विविध राष्ट्रीय हितों को समायोजित करने वाला मंच अधिक प्रतीत होता है। अमरीकी विचारक स्टेन रिन्निंग इंगित करते हैं, नाटो पतन की ओर नहीं, रूपांतरण की ओर अग्रसर है। बदलती विश्व-व्यवस्था में नाटो का अस्तित्व बना रहेगा, पर उसकी प्रकृति अधिक लचीली व कम एकीकृत होगी।