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जाननी होगी आतंक की असल वजह

दक्षिण पंथी व वामपंथी दोनों ही विचारधारा के लोगों का आरोप है कि कट्टरपंथी इस्लाम ही भारत में आतंकवाद की मुख्य वजह है

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Oct 13, 2017
kashmir terrorist

- अमीश

अगर पाकिस्तानी आतंकवाद पर काबू पाना है तो उसके नापाक इरादों पर हम नैतिक, बौद्धिक व सैद्धांतिक माध्यम से विजय पाकर ही ऐसा कर सकते हैं न कि उसके साथ शांति बहाली की उम्मीद रख कर। इसके विपरीत, मैं भारतीय मुसलमानों को शक की निगाह से देखने वालों से सहमत नहीं हूं।

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हाल ही एक विदेशी अखबार के संवाददाता से भारत में इस्लामिक आतंकवाद के प्रतिकार स्वरूप उभरे हिन्दू आतंकवाद पर बातचीत हो रही थी। इस लेख की अवधारणा ने वहीं से आकार लिया। हालांकि इस तरह के लेख में धार्मिक भावनाएं आहत होने की आशंका रहती है लेकिन एक बार को हम इन संवेदनशील भावनाओं के खयाल को एक तरफ रखते हैं। भारत सशक्त देश है और हमारी अखंडता को इन बातों से कोई खतरा भी नहीं है पर मुद्दे की बात यह है कि हिन्दू आतंकवाद बनाम हिन्दुस्तानी इस्लामी आतंकवाद को समझने के लिए कुछ आंकड़ों को समझना जरूरी है।

आतंकवाद और उसकी प्रतिक्रिया का अध्ययन करने वाली अमरीका की संस्था है नेशनल कॉन्सॉर्टियम। यह आतंकवाद संबंधी वैश्विक आंकड़े संजोती है। इसके जरिए भारत में 1974 से लेकर आज तक हुए आतंकी हमलों की जानकारी है। इसमें दुनिया के करीब 10 हजार आतंकी घटनाओं की जानकारी है। रूपा सुब्रमण्या ने इनका विश्लेषण किया है। इसी तरह साउथ एशियन टेररिज्म पोर्टल पर भी करीब 20 हजार आतंकी घटनाओं की जानकारी है। इनके आंकड़े कहते हैं कि तथाकथित हिन्दू आतंकवाद का आरोप पूर्णत: मिथ्या है।

भारत पर हमला करने वाले दस हजार आतंकियों में से केवल 0.6 प्रतिशत ही ‘हिन्दू आतंकी’ की श्रेणी में आते हैं। देखा जाए तो भारत की हिन्दू आबादी कुल जनसंख्या का 80 प्रतिशत है। इस आधार पर भारत में हिन्दू आतंकवाद नाम की कोई चीज नहीं है। उधर, भारत में इस्लामी आतंकवाद पर बहुत से विचारक बेबाकी से अपनी राय व्यक्त करते रहते हैं। दक्षिण पंथी व वामपंथी दोनों ही विचारधारा के लोगों का आरोप है कि कट्टरपंथी इस्लाम ही भारत में आतंकवाद की मुख्य वजह है। कश्मीरी आतंकवाद को छोड़ दें तो भारत में आतंकवाद की घटनाएं करीब 3 प्रतिशत ही हैं।

मैं मानता हूं कि कश्मीर में कट्टरपंथी इस्लाम की समस्या है। कश्मीरी जनता आजादी के बाद से वहां से कश्मीरी पंडितों के सफाये में लगी है। इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कश्मीर की भौगोलिक आजादी एक अलग मसला है। एक ओर जहां भारत में इस्लामी आतंकवादी घटनाओं की आशंका हिंदू आतंकी हमलों की अपेक्षा अधिक है, वहीं हमें यह भी मानना होगा कि इस्लामी आतंकवाद बड़े पैमाने पर ‘पाकिस्तानी आतंक निर्यात उद्योग’ की देन है। इन्हें कुछ हिंदुस्तानियों का सहयोग प्राप्त है। लेकिन, जब मैंने पुलिस वालों से बात की तो पता लगा कि कई पाक आतंकी भारतीय मुस्लिम समुदाय ने ही पकड़वाए हैं। यह है देशभक्ति!

मैं इस बात का पक्षधर हूं कि अगर पाकिस्तानी आतंकवाद पर काबू पाना है तो उसके नापाक इरादों पर हम नैतिक, बौद्धिक व सैद्धांतिक माध्यम से विजय पाकर ही ऐसा कर सकते हैं न कि उसके साथ शांति बहाली की उम्मीद रख कर। इसके विपरीत, मैं भारतीय मुसलमानों को शक की निगाह से देखने वालों से सहमत नहीं हूं। बड़ी संख्या में भारतीय मुसलमान अपने देशवासी हिन्दू भाइयों की तरह ही देशभक्त और शांतिप्रिय हैं। आखिर भारत में आतंकवाद का मुख्य स्रोत है क्या? समझदारों के लिए यह कोई नई बात नहीं है कि वामपंथी आतंक देश के लिए सबसे बड़ा आतंक है। इसके अनेक नाम हो सकते हैं माक्र्सवादी, साम्यवादी या माओवादी।

वास्तविकता यह है कि पिछले 40 वर्षों में भारत में जितनी भी आतंकी घटनाएं घटीं, उनमें से 30 फीसदी के मूल में यही विचारधारा थी। पिछले एक दशक में घटी सारी आतंकी घटनाओं में वामपंथी आतंकवाद का योगदान 50 प्रतिशत तक हो गया है। अगर हम वाकई भारत में आतंकवाद समाप्त करना चाहते हैं तो पहले हमें माक्र्सवादी, साम्यवादी, माओवादी विचारधारा का आनुपातिक विश्लेषण करना होगा। इनमें ऐसा क्या है, जो हिंसा को प्रोत्साहित करता है। फ्रांसीसी इतिहासकार व विद्वान स्टीफन कुर्टोइस ने अपनी पुस्तक ‘द ब्लैक बुक ऑफ कम्युनिज्म’ में लिखा है कि सौ सालों में दुनिया भर में करीब 9 करोड़ लोग वामपंथी शासित राज्यों में मारे गए। ज्यादातर घटनाएं मानवजनित आपदा, नरसंहार अथवा जातीय संघर्ष रहीं।

भारतीय संदर्भ में देखें तो प्रकट साक्ष्यों के अनुसार जहां कहीं भी साम्यवाद या माक्र्सवाद हावी है, वहां राजनीतिक हिंसा चरम पर है जैसे पश्चिम बंगाल और केरल। मैं यह नहीं कह रहा कि सारे साम्यवादी या माक्र्सवादी व्यक्तिगत तौर पर दोषी हैं, वे तो स्वयं इन विचारधाराओं में जकड़े हुए हैं। जरूरत है तो बस इस विचारधारा के सावधानी व शांतिपूर्ण विश्लेषण और संभवत: सुधार की। माक्र्सवादी व साम्यवादी विचारधारा के समर्थकों को सार्वजनिक तौर पर दूसरों के साथ हिंसा व वैमनस्य त्यागना होगा। वैचारिक मतभेद हो सकते हैं क्योंकि जरूरी नहीं कि सभी लोग समान विचारधारा के पक्षधर हों।

भारत विविधता प्रधान देश है तो विविध विचारधाराएं होना लाजिमी है। हम तो सभी से सवाल करने को उचित मानते हैं, यहां तक कि ईश्वर से भी। वैदिक संस्कृत में अंग्रेजी शब्द ‘ब्लैशफेमी’ का कोई अनुवाद नहीं है जिसका आशय निरादर या उल्लंघन है। परन्तु एक भारतीय दूसरे भारतीय के साथ मतभेदों को मिटाने के लिए हिंसा का सहारा ले, यह भी ठीक नहीं है। दुर्भाग्य से ऐसा साफ नजर आ रहा है।

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Published on:
13 Oct 2017 03:33 pm
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