ओपिनियन

टिप्पणी: यह ‘मौत’ नहीं, ‘हत्या’ है

बूंदी के अलकोदिया गांव में नौ साल की रिंकू अब कभी स्कूल नहीं जाएगी। वह सुबह घर से निकली थी जिंदगी की तरफ, लेकिन लौटी मौत की खबर बनकर। यह कोई दुर्घटना नहीं, यह व्यवस्था की असफलता का क्रूर चेहरा है।
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May 08, 2026
Bundi Dog Attack
मृतक बच्ची का फाइल फोटो: पत्रिका

बूंदी के अलकोदिया गांव में नौ साल की रिंकू अब कभी स्कूल नहीं जाएगी। वह सुबह घर से निकली थी जिंदगी की तरफ, लेकिन लौटी मौत की खबर बनकर। यह कोई दुर्घटना नहीं, यह व्यवस्था की असफलता का क्रूर चेहरा है। प्रदेश में लम्बे समय से कुत्तों के हिंसक होने और डॉग बाइट के बढ़ते मामलों की लगातार खबरों के बावजूद तंत्र सोया रहा। कुत्तों के काटे लोगों के दर्द को अनसुना किया गया। क्या सरकार किसी की मौत का इंतजार कर रही थी? क्या अब भी जिम्मेदारों के कानों पर जूं नहीं रेंगेंगी? रिंकू की मौत कोई साधारण मृत्यु नहीं, ब​ल्कि हत्या है और आरोपी है पूरा सिस्टम। क्या सभी जिम्मेदार अफसरों के ​खिलाफ केस नहीं होना चाहिए?


एक मजदूर की बेटी थी। जिसे उसके पिता ने पढ़ाने के लिए गांव बदला, झोपड़ी बनाई, सपने बुने। आज वही पिता अपनी बच्ची की अर्थी उठाकर खड़ा है। उसकी आंखों में जो सवाल है-‘मेरी बेटी की गलती क्या थी?’ उसका जवाब किसी मंत्री, किसी अफसर के पास नहीं है। उस मां की चीखें किसी रिपोर्ट में दर्ज नहीं होंगी, लेकिन वे इस व्यवस्था को हर दिन कटघरे में खड़ा करेंगी।


यह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, सिस्टम की सामूहिक विफलता है। सबसे बड़ा सवाल-जिम्मेदारी किसकी? नगर निकायों की? पंचायतों की? पशुपालन विभाग की? या फिर उस तंत्र की, जो हर घटना के बाद सिर्फ ‘जांच’ और ‘कार्रवाई’ का रटा-रटाया बयान जारी करता है? सच्चाई यह है कि जिम्मेदारी सबकी है और जवाबदेही किसी की नहीं।


प्रदेश में डॉग बाइट के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। कई जिलों में अस्पतालों की ओपीडी का बड़ा हिस्सा सिर्फ कुत्तों के काटने के मरीजों से भरा रहता है। बूंदी जैसे जिले में भी रोजाना 15-20 लोग एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगवाने पहुंच रहे हैं। यह आंकड़ा किसी आपदा से कम नहीं है।


समस्या पुरानी है, लेकिन समाधान आधे-अधूरे हैं। नसबंदी और टीकाकरण की योजनाएं फाइलों में दौड़ रही हैं, जमीन पर घिसट रही हैं। और कुत्तों के झुंड स्कूलों के बाहर, गलियों में, खेतों में खुलेआम घूम रहे हैं। बच्चे डर के साये में जी रहे हैं। …और सरकार केवल आंकड़े गिन रही है।


विडंबना यह भी है कि जैसे ही कुत्तों के नियंत्रण की बात होती है, बहस ‘श्वान-प्रेम’ बनाम ‘मानव सुरक्षा’ में उलझ जाती है। जबकि सच्चाई यह है कि दोनों का संतुलन ही असली समाधान है। जरूरत है वैज्ञानिक तरीके से नसबंदी व टीकाकरण अभियान चलाने की। हर जिले में डॉग कंट्रोल टास्क फोर्स बनाने की। स्कूलों और ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षा और जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने की। और सबसे जरूरी-जवाबदेही तय करने की। क्योंकि जब तक किसी अधिकारी पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हर घटना के बाद सिर्फ शोक और आक्रोश ही दोहराया जाएगा। रिंकू की मौत सिर्फ एक आंकड़ा नहीं बननी चाहिए। यह चेतावनी है-अगर अब भी नहीं चेते, तो अगली खबर किसी और मासूम की होगी। …और तब सवाल फिर वही होगा- क्या अब भी किसी और मौत का इंतजार है?
ashish.joshi@in.patrika.com

Published on:
08 May 2026 11:09 am