
रंगबाड़ी तालाब
कोटा की पहचान कभी कोचिंग, उद्योगों या कोटा स्टोन की खदानों से नहीं, पानी की संस्कृति से थी। पहाड़ियों से उतरता वर्षा जल जब तालाबों में सहेजा जाता था, तो शहर सिर्फ बसता नहीं, सांस लेता था। आज वही सांस टूट रही है। कभी 19 रियासतकालीन तालाब थे, अब चार बचे हैं। बाकी इतिहास की तरह नहीं, प्रशासन की चुप्पी और ‘राजनीतिक शह’ से मिटाए गए। कहीं कॉलोनियां काटकर, कहीं फ्लाई ऐश डालकर, कहीं सीवरेज मोड़कर। यह सिर्फ जल-स्रोतों का क्षय नहीं, शहर की आत्मा का क्षरण है।
पठारी क्षेत्र का पानी जब रियासतकालीन तालाबों में थमता था, तो बाढ़ नहीं आती थी, भूजल मुस्कुराता था और शहर सुकून से जीता था।
आज वही तालाब एक-एक कर मर रहे हैं और उनके साथ मर रहा है शहर का वैभव और समृद्ध इतिहास। रंगबाड़ी का चार सौ साल पुराना तालाब सीवरेज की बदबू में डूबा है। जौहरा बाई तालाब में कई सालों तक फ्लाई ऐश डालते रहे। अनंतपुरा और शिवपुरा तालाब भूमाफियाओं के कब्जे में हैं और काला तालाब पर तो कॉलोनी ही काट दी गई। छत्रपुरा तालाब के दोनों तरफ बस्तियां बसी तो अब वह ‘नाला’ ही रह गया। सवाल यह नहीं कि अतिक्रमण हुआ, सवाल यह है कि किसकी आंखों के सामने हुआ? नगर निगम, यूआइटी (अब केडीए), राजस्व और वन विभाग…सबकी नजरों के सामने तालाब गायब होते रहे। यह लापरवाही है या सुनियोजित लूट?
विडंबना देखिए, जिन तालाबों से हमारी संस्कृति जुड़ी थी, जहां हाड़ौती की आत्मा बसती थी, वे तालाब रिकॉर्ड से ही गायब कर दिए गए। विधानसभा में खुद नगरीय विकास मंत्री ने माना कि कोटा का महुआ, कोटड़ी, रानीसागर, झेला और रामकुंड तालाब का रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं है।
तालाब केवल पानी भरने के गड्ढे नहीं होते। वे शहर की प्राकृतिक जल-निकासी प्रणाली हैं, भूजल के भंडार हैं, जैव-विविधता के घर हैं और सांस्कृतिक स्मृतियों के मंदिर हैं। जब हम उन्हें पाटते हैं, तो बारिश में सड़कें डूबती हैं, कॉलोनियां जलमग्न होती हैं, बोरवेल सूखते हैं और तापमान बढ़ता है। बारिश के दौरान हर साल जलप्लावन और बाढ़ का संकट हमारी अपनी बनाई त्रासदी है।
यह भी सच है कि तालाबों पर कब्जा किसी एक व्यक्ति या विभाग का अपराध नहीं, एक सामूहिक अपराध है। भूमाफिया तभी पनपते हैं जब प्रशासन आंखें मूंद ले और समाज चुप्पी साध ले। नगर निकायों की लापरवाही, राजनीतिक संरक्षण और नागरिक उदासीनता…तीनों ने मिलकर तालाबों को कंक्रीट की कब्र बना दिया। तालाबों की जमीन पर फार्म हाउस, मैरिज गार्डन और अवैध कॉलोनियां फल-फूल गईं।
विडंबना यह भी है कि हम स्मार्ट सिटी का तमगा लिए घूम रहे हैं, लेकिन अपनी जल-स्मृति मिटा रहे हैं। पर्यटन, पर्यावरण और जल सुरक्षा…तीनों के लिए तालाबों का संरक्षण अनिवार्य है। अगर ये पुनर्जीवित हों, तो शहर का भूजल सुधरेगा, हरियाली लौटेगी और सांस्कृतिक पर्यटन का नया अध्याय खुलेगा। जिसकी कोटा को तत्काल आवश्यकता भी है।
कोटा दक्षिण के विधायक ने यह मुद्दा सदन तक पहुंचाकर एक महत्वपूर्ण दायित्व निभाया है। अब अपेक्षा है कि वे तालाबों को नष्ट करने वालों पर सख्त कार्रवाई करवाने का विषय भी उठाएं और तालाबों को खाली करवाने की जिम्मेदारी लें। यह सभी जनप्रतिनिधियों के लिए संकल्प लेने का भी सही वक्त है कि वे न केवल पुरानी जल संरचनाओं को संरक्षित करें, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए नई जल संरचनाएं तैयार करने की दिशा में भी सार्थक कार्य करें।
समाधान स्पष्ट है। हर तालाब की सीमांकन-मैपिंग हो, अतिक्रमण हटाने के लिए विशेष अभियान चले, सीवरेज और औद्योगिक मलबे पर कठोर दंड हो और नागरिक समितियों को निगरानी में शामिल किया जाए। नामजद जिम्मेदार तय हों, अवैध निर्माण पर तत्काल बुलडोजर चले और दोषियों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हों। …क्योंकि तालाब बचाना केवल पानी बचाना नहीं, शहर का ‘चरित्र’ बचाना है। अगर हमने अभी भी अनदेखी की, तो आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी-क्या तुम्हें पानी की कमी थी या संवेदना की? …और तब हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा, क्योंकि सूखे तालाबों के नीचे हमारी चुप्पी का इतिहास लिखा होगा।
ashish.joshi@in.patrika.com
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Updated on:
22 Feb 2026, 2:13 PM IST
Published on:
22 Feb 2026, 2:12 PM IST
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