कुलिश जी के विचार: पुरस्कार जिन्होंने दिए हैं वह अपनी दृष्टि से सही है... लेकिन पुरस्कारों का ज्यादा प्रचार करना मुझे संकोचग्रस्त कर देता है।
क.च. कुलिश (धाराप्रवाह से),
पुरस्कार पाने या लेने के विषय में मेरा स्वभाव काफी संकोची रहा है। वैसे तो स्वभावगत मैं संकोची नहीं हूं लेकिन प्रचार वृत्ति न होने के कारण संकोच करता हूं। बाहर लोगों के बीच में हावी होने में… प्रगट होने में… इसीलिए हिचकता हूं कि मैं अखबार चलाता हूं। बाहर ज्यादा प्रगट होना… अखबार के लिए अहितकर मानता हूं। लोक संग्रह की दृष्टि से यह उचित नहीं है। वेद मेरा व्रत है। इस बात को अधिक से अधिक लोगों में पहुंचाने के लिए… विस्तार देने के लिए… यदि अखबार का प्रयोग होता है और मेरे सभी साथी इससे सहमत है… तो मैं प्रयोग करता हूं। खुद के निजी व्यक्तित्व को महिमामंडित करना या अपने को स्थापित करने की कोशिश… अखबार के माध्यम से मैंने कभी नहीं की।
पुरस्कार जिन्होंने दिए हैं वह अपनी दृष्टि से सही है… लेकिन पुरस्कारों का ज्यादा प्रचार करना मुझे संकोचग्रस्त कर देता है। कहीं इसको दूसरे लोग अन्यथा न ले लें… ईष्र्या भाव न उपजे …. लोग अपने को हेय न समझें… कुछ-कुछ ऐसा भाव भी रहता है। इस भाव को जहां तक संभव हुआ… बढ़ाने का मौका भी नहीं दिया। मात्र इसी कारण से मैं कई प्रस्तावों को… आयोजनों को … अस्वीकृत कर देता हूं। लेकिन कई बार मंजूर भी करना पड़ता है।
पुरस्कारों के लिए संकोच के बाद भी जब मेवाड़ फाउण्डेशन ने तय कर लिया कि मुझे हल्दीघाटी पुरस्कार देना है… तो मुझे स्वीकृति देनी पड़ी। राष्ट्रीय स्तर पर किसी एक पत्रकार को दिया जाने वाला यह पुरस्कार… महाराणा भगवत सिंहजी ने आदेशात्मक रूप से लिखकर मुझे बाध्य-सा कर दिया कि मैं ग्रहण करूं। उनके प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान और आदर भाव था। इस तरह का आग्रह देखकर टालना… हठधर्मिता और अहम की श्रेणी में आ सकता था… यह जानकर मैंने हां कर दी। यही स्थिति गोयनका पुरस्कार के वक्त रही। प्रभाष जोशी लगभग छह महीने तक आग्रह करते रहे। उन्हें भी मैं बराबर टालता रहा। लेकिन रामनाथजी गोयनका का बराबर आग्रह रहा… आदेश रहा। प्रभाषजी के माध्यम से कहला दिया कि पुरस्कार तो वह देंगे ही… तब मेरे पास विचार के लिए गुंजाइश ही नहीं थी। रामनाथजी के प्रति मेरे मन में अपार श्रद्धा है… उन्हें टालना संभव नहीं था।
यह मेरा स्वभाव ही रहा कि मुझे पुरस्कार लेने में संकोच रहा। गोयनका पुरस्कार के अंतर्गत मुझे कांसे पर कास्ट की गई एक मूर्ति दी गई थी… जिसमें सूर्य भगवान रथ चला रहे हैं। साथ में एक लाख रुपए का चैक और शॉल था। दो बातें मुझे अप्रिय लगीं और मैंने फाउण्डेशन वालों को इस संदर्भ में एक पत्र लिखा। सूर्य भगवान के रथ के घोड़े… तार रूपी लगाम से बंधे हुए थे। शास्त्रीय दृष्टि से सूर्य की दिशा निश्चित होती है अत: उसके घोड़े वल्गाविहीन होते हैं जबकि पुरस्कार वाली मूर्ति में लगाम दिखाई गई थी। दूसरी बात पुरस्कार राशि के संदर्भ में थी । सुखदायक… प्रसन्नतापूर्ण… शुभ कार्यों में दी जाने वाली राशि अपूर्ण अंकों में होनी चाहिए । इसीलिए शादी विवाह या शुभ कार्यों में इक्कीस … इक्यावन … एक सौ एक रुपए देने का प्रावधान होता है। शून्य या संपूर्ण अंक वाली राशि व्यापारिक भुगतानों में या फिर श्राद्धपक्ष में दी जाती है… इसलिए पुरस्कार की राशि एक लाख न होकर एक लाख एक रुपया होनी चाहिए।
इंडियन न्यूज पेपर सोसाइटी के स्वर्ण जयंती वर्ष पर कुछ खास सम्पादकों को पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने पुरस्कृत किया था। मुझे भी पुरस्कार दिया गया। कलकत्ता में डॉ. हेडगेवार पुरस्कार दिया गया। इस तरह पुरस्कार… उपाधियां… सम्मान…. पद प्रतिष्ठाएं ग्रहण करने के लिए न तो मैंने कभी उद्यम किया… न ही मेरे मन में ऐसी लालसा ही रही। पर हां… एक पुरस्कार तो नहीं पर उपहार जरूर मेरी स्मृतियों में बना हुआ है। कलकत्ता में वैदिक व्याख्यान के दौरान श्रीमती सरला बिड़ला ने अपने हाथ से बनी पेंटिंग दी थी। निजी कृति थी… पर जिस आस्था और आदर भाव से उन्होंने मुझे दी थी… वह मेरे प्रिय उपहारों में से है। बाकी सम्मानजनक और उच्चकोटि के पुरस्कारों में… कांचीकोटि के शंकराचार्य ने तिरुपति में शॉल उढ़ाकर मुझे सम्मानित किया था… वह मेरे लिए अमूल्य उपहार था।
अनेक संस्थाएं मुझे सम्मानित करने का आग्रह करती है… किन्तु मुझे यह सुहाता ही नहीं है। 1 जुलाई, 1995 को एक सार्वजनिक समारोह में भीलवाड़ा में मेरे भाषण से कुछ युवा इतने प्रभावित हुए कि वे भीलवाड़ा से जयपुर तक… 20 से 27 फरवरी 96 तक उलटी दौड़ लगाते हुए आए और विश्वविद्यालय में उन्होंने मेरा सम्मान किया। उन धावकों से न मेरा परिचय था… न ही किसी के कहने से उन्होंने ऐसा किया। स्वत: प्रेरणा से उन्होंने ऐसा किया। बार-बार आग्रह करने के बाद… मैंने उन्हें अपनी रजामंदी दी। यहां भी मैंने यही कहा कि यह सब मुझे ऋण-भार जैसा लगता है। मेरी रुचि के एकदम विपरीत है। पर अत्यधिक अनुरोध के बाद भी हां न करना उचित नहीं है… इसलिए मुझे सहमति देनी पड़ी। भंवरलालजी जो खेलमंत्री भी है… उन्होंने अपने भाषण में यह कहा कि अगर मैं सम्मान करने की सहमति दे दूं… तो साल में 365 दिन भी कम पड़ेंगे। एक दिन में दो-दो सम्मान समारोह करने पड़ेंगे।