
राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी
जन्म और प्रारंभिक जीवन: जन्म - 20 मार्च 1926, जन्मस्थान - टोंक जिले का सोडा गांव। गांव में उन्हें प्यार से 'कोका' कहते थे। आर्थिक संसाधन सीमित थे, लेकिन पढ़ने-लिखने की ललक थी। प्रारंभिक शिक्षा नानगराम यादव से मिली, जिन्होंने उनके व्यक्तित्व की नींव रखी। छह वर्ष की आयु में मालपुरा आए। पांचवीं तक वहीं पढ़े। सुबोध स्कूल, जयपुर में शिक्षा के दौरान शिक्षक बजरंगलाल पारीक का गहरा प्रभाव पड़ा, जिन्होंने उनका नाम 'कपूर' से बदलकर 'कर्पूर' किया।
युवावस्था में आर्थिक संघर्ष गहरा रहा। किसी काम को छोटा नहीं समझा। मालपुरा की निजामत में क्लर्क से लेकर दिल्ली में डायरेक्टर ऑफ सिनेमेटोग्राफी तक उन्होंने कई कार्य किए। जयपुर लौटकर राशनिंग विभाग में टर्नर-फिटर का काम भी किया। इस दौर में स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक सरोकारों ने उनके विचारों को दिशा दी। संघर्षों के बीच आत्मअध्ययन और स्वाभिमान उनकी सबसे बड़ी पूंजी बने।
लेखन की शुरुआत कविताओं से हुई, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं। 'साहित्य सदावर्त' संस्था और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से जुड़कर विभाजन के बाद आए सिंधी समुदाय को हिंदी सिखाई।
वर्ष 1951 में 'राष्ट्रदूत' अखबार से प्रूफरीडर के रूप में पत्रकारिता की औपचारिक शुरुआत की। मेहनत और प्रतिबद्धता के दम पर रिपोर्टिंग और संपादन तक पहुंचे। 'घुमक्कड़' नाम से डायरी लेखन किया और निर्भीक टिप्पणियों के कारण पहचान बनाई। विचारों पर अंकुश स्वीकार नहीं होने के कारण त्यागपत्र दे दिया। यहीं से स्वतंत्र पत्रकारिता का संकल्प मजबूत हुआ।
7 मार्च 1956 को जयपुर से 'राजस्थान पत्रिका' की शुरुआत की। दो कुर्सियों, एक टेबल, एक टाइपराइटर और सीमित संसाधनों के साथ अखबार शुरू हुआ। मित्रों और सहयोगियों-हरमल सिंह, कोमल कोठारी, कन्हैयालाल कोचर, माणिकचंद सुराणा आदि से चर्चा और सहयोग मिला। अखबार का मूल मंत्र रहा- "जन सरोकार, निर्भीकता और सामाजिक जवाबदेही"। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने संपादकीय मूल्यों से समझौता नहीं किया।
धीरे-धीरे 'राजस्थान पत्रिका' ने प्रदेश में अपनी साख बनाई। 1960 के दशक से प्रसार संख्या लगातार बढ़ती चली गई। चुंगी आंदोलन, हाईकोर्ट बेंच विवाद और अन्य जन मुद्दों पर स्पष्ट रुख अपनाकर पत्रिका ने अपनी पहचान बनाई। 1970 के दशक में रोटरी मशीन, इतवारी पत्रिका और आधुनिक तकनीकों के साथ विस्तार हुआ। आपातकाल (1975) के दौरान भी पत्रिका ने निर्भीक पत्रकारिता का उदाहरण पेश किया। आगे चलकर यह एक बड़े मीडिया समूह के रूप में स्थापित हुआ, जिसने ग्रामीण, सामाजिक और प्रशासनिक मुद्दों को लगातार उठाया।
कुलिश जी केवल संपादक नहीं, बल्कि गहरे चिंतक भी थे। 20 मार्च 1986 को षष्टिपूर्ति के अवसर पर उन्होंने सक्रिय संपादकीय जिम्मेदारियों से दूरी बनाई। इसके बाद मधुसूदन ओझा और मोतीलाल शास्त्री के साहित्य से प्रेरित होकर वेदों पर गहन अध्ययन किया। उनके वेद विषयक लेख प्रकाशित हुए और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर व्याख्यान दिए। उनके लेखन में पत्रकारिता, संस्कृति व भारतीय दर्शन का अनूठा समन्वय दिखाई देता है।
पत्रकारिता और सामाजिक योगदान के लिए उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हुए। जनपक्षधर और निर्भीक संपादक के रूप में उनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हुई।
जीवन के अंतिम वर्षों में भी वे लेखन, चिंतन और अध्ययन में सक्रिय रहे। 17 जनवरी 2006 को उनका निधन हुआ, लेकिन 'राजस्थान पत्रिका' के माध्यम से स्थापित उनकी पत्रकारिता परंपरा और वैचारिक विरासत आज भी जीवित है।
Updated on:
20 Mar 2026 12:45 pm
Published on:
20 Mar 2026 12:45 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
