— पानाचन्द जैन (पूर्व न्यायाधीश, राजस्थान हाईकोर्ट)
भ्रष्टाचार लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रहा है। नए-नए घोटाले उजागर हो रहे हैं। हर रोज भ्रष्टाचार के मामले अखबारों की सुर्खियों बन रहे हैं। मंत्री, नेता, अधिकारी, कर्मचारी, यहां तक की न्यायविदों के विरुद्ध भी भ्रष्टाचार के मामले पढऩे को मिल रहे हैं। उत्तरप्रदेश के लोकायुक्त ने कुछ वर्ष पूर्व 1400 करोड़ रुपए का घोटाला पकड़ा था। मध्यप्रदेश के लोकायुक्त ने भी कई घोटाले उजागर किए हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर का मानना है कि सरदार सरोवर प्रोजेक्ट में हुआ घोटाला व्यापम घोटाले से भी बड़ा था। आजकल नरेगा तो भ्रष्टाचार का ही दूसरा नाम माना जाता है। देश में जगह-जगह छापे पड़ रहे हैं। आश्चर्य तब होता है जब छापों में प्राप्त राशि को गिनने के लिए लाई गई मशीनें भी कम पड़ जाती हैं। प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने सन 2011 में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन किया था। इसने बड़ा रूप ले लिया था। लोकपाल कानून बनाने की मांग ने जोर पकड़ा था। इस आंदोलन से पूरे देश की जनता जुड़ गई थी। भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता का रोष मुखर हुआ था। आंदोलन के फलस्वरूप लोकपाल बिल वर्ष 2013 में राज्यसभा और लोकसभा से पारित हुआ था। लोकपाल अधिनियम, 2014 के नाम से कानून बना। इसमें प्रावधान था कि जिन राज्यों में लोकपाल कानून नहीं है, वहां राज्य एक वर्ष में कानून बनाएंगे।
कई राज्यों में लोकपाल कानून है, लेकिन राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में अब भी पुराना ही लोकायुक्त कानून लागू है। हालांकि राज्य सरकार को करीब 11 साल पहले नए कानून के लिए ड्राफ्ट भी बनाकर दिया गया था, जिसके परीक्षण के लिए राज्य की तत्कालीन सरकार ने एक कमेटी भी बनाई थी। लोकपाल, सरकार के दखल से मुक्त होना चाहिए था। वह स्वायत्त संस्था होनी थी। वर्तमान में जांच एजेंसी एसीबी व सीबीआइ दोनों ही सरकार के अधीन हैं। इसका अर्थ है कि इसके कर्मचारियों-अधिकारियों की नियुक्ति, पोस्टिंग, ट्रांसफर, प्रमोशन सब सरकार की मर्जी पर है। ऐसी स्थिति में ये निष्पक्ष तरीके से और दबाव मुक्त होकर कैसे काम कर सकते हैं।
लोकपाल अधिनियम, 2014 केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाले पब्लिक सर्वेन्ट पर ही लागू होता है। वस्तुत: पब्लिक सर्वेन्ट की परिभाषा को विस्तार देने की आवश्यकता है। जहां पर सरकार का प्रशासनिक अथवा आर्थिक नियंत्रण है, वहां के कर्मचारी, अधिकारी आदि भी इस परिभाषा में लाए जा सकते हैं। इस प्रकार जो राजस्थान लोकपाल अधिनियम बनेगा, उसमें पब्लिक सर्वेन्ट की परिभाषा को वृहद रूप देना होगा, जिसमें वहां काम करने वाले कर्मचारी-अधिकारी सभी पब्लिक सर्वेन्ट माने जाएंगे। मंत्रिपरिषद (जिसमें मुख्यमंत्री भी हो) के साथ लोकल बॉडी, बोर्ड, सोसायटी, कॉपरेटिव सोसायटी, संस्थाएं, विश्वविद्यालय, स्कूल, अस्पताल, सरकारी कम्पनी आदि से जुड़े सभी अधिकारी-कर्मचारी पब्लिक सर्वेन्ट माने जाने चाहिए। जहां तक राजस्थान राज्य के लोकायुक्त अधिनियम का सवाल है, यह लोकपाल अधिनियम से सर्वथा भिन्न है। लोकायुक्त एक विभागीय कार्यवाही करने वाला अधिकारी मात्र है।
यह कानून राज्य को केवल सलाह देता है कि पब्लिक सर्वेन्ट के विरुद्ध दुराचार के संबंधित आरोपों की जांच लोकायुक्त करेंगे और सलाह देंगे कि उनको क्या दण्ड दिया जाए। सरकार भी उनकी सलाह को माने या नहीं, वह उस पर ही निर्भर करता है। पुराने कानून में राज्य सरकार ने कोई सारभूत संशोधन नहीं किया है। सामान्य भाषा में कहा जा सकता है कि लोकायुक्त कानून को लोकपाल अधिनियम मानना जनता के साथ धोखा है। प्रारंभ से ही जनता की मांग रही है कि ऐसा लोकपाल अधिनियम बनाया जाए, जो राज्य में भ्रष्टाचार के विष को समाप्त करने में सार्थक हो, जिसमें पब्लिक सर्वेन्ट की व्यापक परिभाषा हो। लोकपाल को न्याय करने के लिए असीमित अधिकार दिए जाएं। लोकपाल को वह संरक्षण दिया जाना चाहिए, जो संरक्षण केन्द्र के लोकपाल अधिनियम में है। लोकपाल अधिनियम में लोकपाल को अपनी जांच के मूल्यांकन के आधार पर स्पेशल कोर्ट में शिकायत दायर करने का अधिकार होना चाहिए, जिसके प्रॉसिक्यूशन की कार्यवाही निदेशक प्रॉसिक्यूशन विंग को दी जानी चाहिए।
लोकपाल को सीज करने का अधिकार दिया जाना चाहिए। लोकपाल की अपनी स्वतंत्र पुलिस होनी चाहिए। आरोपी को निलम्बित करने का अधिकार भी होना चाहिए। लोकायुक्त को आरोपी कर्मचारी से त्याग पत्र लेने का भी अधिकार हो, ऐसा प्रावधान कर्नाटक के लोकपाल अधिनियम में है। लोकपाल भ्रष्टाचारियों के लिए काल होना चाहिए। लोकायुक्त अधिनियम 1973, लोकपाल कानून 2014 की धारा 63 के अनुसार स्वत: रिपील हो चुका। लोकपाल एक्ट आने के बाद राजस्थान में कई लोकायुक्त नियुक्त हुए, उन्होंने अपने सीमित अधिकारों में इतना कार्य तो किया है कि जो अधिकारी अपने दायित्व को भी नहीं निभा पा रहे थे, उनको सक्रिय किया और दोषियों पर दबाव बनाए रखा, किन्तु भ्रष्टाचार रोकने में उनका कोई खास योगदान नहीं रहा।
सरकार जानती है कि लोकायुक्त अधिनियम, लोकपाल अधिनियम का विकल्प नहीं है। जनता के साथ यह बहुत बड़ा धोखा है। देश के कई राज्यों में लोकपाल कानून लागू हो चुका है। वहां कई भ्रष्टाचारियों को जेल भेजा जा चुका है। मध्यप्रदेश, यूपी, कर्नाटक आदि राज्यों में लोकपाल कानून लागू हो चुका है। इसके बावजूद कुछ राज्य इससे बच रहे हैं।