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आईना: मेरा दर्द न जाने कोई…

मैं राजस्‍थान का एक रोगी हूं।

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May 01, 2026
फोटो: पत्रिका

माननीय गजेंद्रसिंह खींवसर जी,
चिकित्सा एवं स्‍वास्थ्‍य मंत्री, राजस्थान

मैं राजस्‍थान का एक रोगी हूं। मेरा नाम ‘कुछ भी’ हो सकता है। बूंदी का वो आदमी, जो घर से पंखा उठाकर आपके अस्पताल आया। अलवर का बच्चा, जिसकी मां उसे गत्ते से हवा कर रही थी। पाली का वो मरीज, जिसका ऑपरेशन टॉर्च की रोशनी में हुआ या श्रीगंगानगर का वो युवा, जो इमरजेंसी के बाहर बंद पड़े वाटर कूलर के सामने खड़ा सोच रहा था… अब कहां जाऊं। मुझमें आप राजस्थान का हर वो इंसान देख सकते हैं, जो बीमार पड़ने के बाद 'आपके दरवाजे' पर आया और परेशान होकर लौटा।

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मंत्री जी, मुझे नहीं पता कि आपने नीति आयोग की वो रिपोर्ट देखी या नहीं, जिसमें देश के राज्यों की स्वास्थ्य सेवाओं की रैंकिंग होती है। उस रिपोर्ट के आईने में राजस्थान का चेहरा बहुत थका हुआ दिखता है।


मंत्री जी, मैंने पत्रिका में पढ़ा है कि आपके अस्पतालों में 24.33 करोड़ के 1,824 उपकरण बेकार पड़े हैं। 159 वेंटिलेटर जो सांस बचा सकते हैं, खुद बेजान हैं। नागौर में एयर कूलिंग सिस्टम खराब है। अजमेर में ऑर्थोपेडिक वार्ड के एसी बंद हैं। डूंगरपुर में टंकी भरी है, पर मरीज बाजार से पानी की बोतल खरीद रहा है। झुंझुनूं में दानदाता ने आरओ और कूलर दिया था, आज दोनों धूल फांक रहे हैं। कमोबेश अन्य जिलों में ऐसा ही कुछ मेरे यानी आम मरीज के साथ हुआ है। मंत्री जी… और तब मुझे समझ आया कि गरीब आदमी का बीमार पड़ना राजस्थान में सबसे बड़ी सजा है।

निशुल्क दवा योजना की क्या बात करूं? आप हर साल 1,500 से 2,000 करोड़ रुपए खर्च करते हैं। मैं पर्ची लेकर दवा काउंटर पर गया। पांच में से केवल दो दवा मिली। बाकी के लिए पूछा तो जवाब मिला - ब्रांडेड हैं, बाहर से ले लेना। वह कह कर निपटा ही था कि एक लपके ने मेरा पर्चा लपक लिया। बोला - मेरे पीछे आ जाओ। 15 परसेंट डिस्काउंट दिलवाऊंगा। डिस्काउंट के बाद उन तीन दवा की सात दिन की कीमत मेरे पूरे महीने के राशन से ज्यादा निकली। घर लौटते हुए सोचता रहा कि यह योजना मेरे लिए थी या दवा कंपनी के लिए? मेरी पीड़ा पत्रिका ने लिखी - सरकारी अस्पताल 80 फीसदी पर्चियों पर ब्रांडेड दवाएं लिखी जा रही हैं। सरकार कहती है जेनेरिक लिखो। डॉक्टर लिखते हैं ब्रांडेड। और दोनों पाटों मैं पिसता हूं।

मंत्री जी, वो हड़ताल वाला दिन भी मैं कभी नहीं भूलूंगा। निजी अस्पतालों ने चौबीस घंटे दरवाजे बंद किए। मैं तो नहीं जाता, लेकिन उस दिन जयपुर के एसएमएस में 30 फीसदी अधिक मरीज थे तो जेके लोन में रात के बारह बजे तक 600 लोग। एक मां बच्चे को लेकर भटक रही थी। निजी अस्पतालों की तंगदिली समझ आती है, लेकिन सरकार को आम आदमी के लिए ही है। उसके पास जगह नहीं थी। मैं सोचता रहा कि कैसा तंत्र है, जो एक दिन में फेल हो गया।

मंत्री जी, मेरे कुछ सवाल भी हैं, जिनका उत्तर शायद आपके पास हो। जो उपकरण खरीदे गए, उन्हें चलाना किसे था? जो उपकरण खराब मिले, उनके रखरखाव किसे करना था? दानदाता ने कूलर दिया, उसे संभालना किसकी जिम्मेदारी थी? सरकारी पर्चे पर ब्रांडेड दवाएं लिखी जा रही हैं… कौन जिम्मेदार है? क्या अस्पतालों के अधीक्षक और प्रभारी केवल नेताओं-अफसरों के दौरों के लिए ही लगा रखे हैं? आइसीयू तक में आग लग जाती है, मरीज की मौत हो जाती है… और आपको किसकी लापरवाही नहीं दिखती। जनता के सवाल खत्म नहीं हुए हैं। मैं बस यह पूछना चाह रहा हूं कि जनता को जीने का हक है। इलाज के नाम पर उसे मारना कब बंद होगा।


मंत्री जी, मैं पांच सितारा अस्पताल नहीं मांग रहा। बस इतना चाहता हूं, बुखार में भर्ती मरीज को गर्म पानी न पीना पड़े। बेड पर लेटे तीन चार बच्चे न भर्ती हों और उन्हें हवा मिले। दवा पूरी मिले। यह मांग नहीं है… मेरा हक है। और जब तक यह हक नहीं मिलता… 'निरोगी राजस्थान' सिर्फ एक नारा है। एक बीमार नारा।

भवदीय,
एक असहाय रोगी

veejay.chaudhary@in.patrika.com
twitter/veejaypress

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Published on:
01 May 2026 12:38 pm
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