3 नवंबर 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

आईना: कुर्सी मिली है…कमान अभी बाकी

लोकतंत्र के हर मोड़ पर कुछ फैसले ऐसे होते हैं, जो केवल कानून नहीं बनाते, बल्कि बदलाव की उम्मीद गढ़ते हैं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम भी ऐसा ही एक ऐतिहासिक क्षण है, जहां 33 प्रतिशत सीटों के आरक्षण के साथ बराबरी की तस्वीर उकेरी जा रही है।
2 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

जयपुर

•

image

Veejay Chaudhary

•

Updated: 17 Apr 2026, 6:17 PM IST

फोटो पत्रिका नेटवर्क

विजय चौधरी

लोकतंत्र के हर मोड़ पर कुछ फैसले ऐसे होते हैं, जो केवल कानून नहीं बनाते, बल्कि बदलाव की उम्मीद गढ़ते हैं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम भी ऐसा ही एक ऐतिहासिक क्षण है, जहां 33 प्रतिशत सीटों के आरक्षण के साथ बराबरी की तस्वीर उकेरी जा रही है। दिल्ली में संसद की विशेष बैठक चल रही है-उत्साह है, तालियां हैं, बयान हैं और राजनीतिक प्रतिबद्धता के स्वर मुखर हैं। कहा जा रहा है कि यह इतिहास बदलने वाला कदम है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल सीट मिल जाने से सत्ता में वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित हो जाती है?

राजस्थान इस प्रश्न से पहली बार नहीं जूझ रहा। इसका जवाब उसके इतिहास में पहले से अंकित है। रानी पद्मिनी, मीराबाई और हाड़ी रानी जैसी स्त्रियों ने किसी आरक्षण या कानून के सहारे नहीं, बल्कि साहस, आत्मविश्वास और निर्णायक क्षमता से अपनी जगह बनाई। आजादी के 75 वर्ष बाद भी संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी सीमित रही है। जब आधी आबादी निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त रूप से भागीदार नहीं होती, तो लोकतंत्र का संतुलन डगमगा जाता है। ऐसे में यह विधेयक महिलाओं के लिए एक नया द्वार खोलता है, ताकि वे निर्णय लेने की टेबल पर समान हिस्सेदारी सुनिश्चित कर सकें।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष चुनौतीपूर्ण है। राजस्थान में पंचायतों और नगरीय निकायों में वर्षों से 50 प्रतिशत आरक्षण लागू है और बड़ी संख्या में महिलाएं निर्वाचित होकर आई हैं। इसके बावजूद सरपंच पति, पार्षद पति और महापौर पति जैसी प्रवृत्तियां व्यापक हैं। पद महिला का होता है, लेकिन निर्णय किसी और के हाथ में रहता है। कई महिला प्रतिनिधियों ने स्वयं स्वीकार किया है कि सामाजिक दबाव और पारिवारिक सीमाओं के कारण वे स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं ले पातीं। वास्तविक सत्ता तब है, जब निर्णय लेने का अधिकार उसी के पास हो।

दरअसल, यह कानून जनता से पहले राजनीतिक दलों की चौखट से होकर गुजरेगा। इसका अर्थ है कि पहला बदलाव दलों के भीतर होना चाहिए। उन्हें अपने संगठनात्मक ढांचे, कार्य संस्कृति और राजनीतिक दृष्टिकोण में ऐसा परिवर्तन लाना होगा, जहां महिलाओं के लिए सम्मानजनक और प्रभावी भूमिका सुनिश्चित हो। आज भी समाज के अनेक परिवार राजनीति से दूरी बनाए रखते हैं, क्योंकि दलों के भीतर की अव्यवस्था उन्हें हतोत्साहित करती है।

साथ ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उन महिलाओं पर भी आती है, जो पहले से राजनीति में उच्च पदों पर आसीन हैं। यदि वे आगे बढ़कर यह संदेश दें कि राजनीति में महिलाओं की भूमिका केवल औपचारिक उपस्थिति भर की नहीं, बल्कि निर्णायक भागीदारी की है, तो बदलाव की गति और प्रभाव दोनों बढ़ सकते हैं। राजनीति ही वह मंच है, जो लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी को संतुलित और संवेदनशील बनाएगी।

ऐसे में यह कानून एक अहम पहल है, हालांकि अंतिम समाधान नहीं। असली सत्ता तभी होगी जब स्त्री केवल बैठे नहीं बल्कि निर्णय ले, दिशा तय करे और अपनी शर्तों पर नेतृत्व करे। दरवाजा खुल चुका है; अब असली परीक्षा यह है कि भीतर की कुर्सी पर हक भी स्त्री का होगा, या वह अब भी किसी और के नाम दर्ज रहेगी।