लेख में ‘लोक’ को भारत की सांस्कृतिक आत्मा बताते हुए राजस्थान की लोककला, लोकनृत्य, लोकदेवता और लोकभाषा की भूमिका स्पष्ट की गई है। तुलसीदास की रामचरितमानस से लेकर खाटू श्याम और छठ पर्व तक उदाहरण देते हुए कहा गया है कि लोकमंगल की रक्षा ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति है।
भारत की आत्मा को यदि किसी एक शब्द में समझना हो तो वह शब्द है 'लोक'। लोक केवल ग्रामीण जीवन या परंपरागत कलाओं तक सीमित अवधारणा नहीं है, बल्कि वह चेतना है जिसमें समाज, संस्कृति, आस्था और जीवन-मूल्य एक साथ गुंथे होते हैं। राजस्थान की लोकपरंपरा इस लोकबोध की अत्यंत समृद्ध अभिव्यक्ति है, जहां लोककला, लोकनृत्य, लोकसाहित्य और लोकदेवता सभी मिलकर लोकमंगल का सांस्कृतिक दर्शन रचते हैं।
लोककला: राजस्थान की लोककलाएं- फड़ चित्रकला, मांडणा, कठपुतली, कढ़ाई, वाद्य-निर्माण आदि- केवल सौंदर्य का विधान नहीं करतीं, बल्कि जीवन के संघर्ष, आस्था और श्रम का दृश्य रूप हैं। यहां कला 'प्रदर्शन' नहीं, सहज कर्म है। लोक कलाकार किसी कला विद्यालय का प्रशिक्षित शिष्य नहीं, बल्कि जीवन-विद्यालय का दीक्षित साधक होता है।
लोकनृत्य: घूमर, कालबेलिया, गैर, भवाई और तेरहताली जैसे नृत्य केवल मंचीय कलाएं नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन और सामूहिकता के प्रतीक हैं। भवाई में सिर पर अनेक घड़े रखकर नृत्य करती नारी केवल कौशल नहीं दिखाती, वह जीवन के संतुलन का संदेश देती है। यह नृत्य-परंपरा बताती है कि भारत की संस्कृति में देह भोग का साधन नहीं, साधना का माध्यम है- यही भारत बोध की विशिष्टता है।
लोकदेवता: हाल ही में दक्षिण भारत में बनी फिल्म 'कांतारा', पूर्वी भारत में मनाई जाने वाली सूर्य पूजा-छठ पर्व की सर्व स्वीकार्यता और राजस्थान के खाटू श्याम जी की यात्रा आदि की अभूतपूर्व सफलता इस बात का प्रमाण है कि लोकदेवता और लोक आस्था आज भी समाज की चेतना में जीवित हैं।
लोकसाहित्य और भाषा: भारत बोध का एक अत्यंत सशक्त उदाहरण लोकभाषा में रचित रामचरितमानस है। गोस्वामी तुलसीदास ने संस्कृत के स्थान पर अवधी जैसी लोकभाषा में रामकथा को प्रस्तुत कर, विदेशी आक्रमणों और सांस्कृतिक संकट के दौर में जन-जन के हृदय में राम को स्थापित किया। यह केवल साहित्यिक निर्णय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतिरोध था। लोकभाषा के माध्यम से तुलसीदास ने भारत की सांस्कृतिक एकता को बचाए रखा। यह सिद्ध करता है कि जब भी भारत पर संकट आया, लोक और लोकभाषा ही उसकी ढाल बने; यही भारत बोध का सत्य है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि लोक को केवल 'फोक शो' या पर्यटन सामग्री न बनाकर, जीवन-दृष्टि के रूप में समझा जाए। भारत की संस्कृति का लक्ष्य व्यक्तिगत वैभव नहीं, बल्कि लोकमंगल रहा है। जब लोक सुरक्षित रहता है, तभी राष्ट्र सशक्त होता है। लोक के आलोक में ही भारत का भविष्य उज्ज्वल है और यही भारत बोध की मूल चेतना है।