
- वेद माथुर, बैंकिंग मामलों के जानकार
बैंकों के विलय की चर्चा लगभग तीस वर्ष पूर्व नरसिम्हन कमेटी की सिफारिशों के बाद से अब तक जारी है। इस कमेटी ने देश में तीन स्तरीय बैंकिंग ढांचा बनाने की सिफारिश की थी। इसमें तीन बड़े बैंकों के परस्पर विलय और इस तरह बनने वाली बैंकिंग संस्था की अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति पर जोर दिया गया था। कहा गया था कि आठ से दस राष्ट्रीय स्तर के बैंक और बड़ी संख्या में स्थानीय व क्षेत्रीय बैंक हों। कमेटी ने यह भी चेताया था कि बड़े बैंकों का विलय उनके समकक्ष बड़े बैंकों में ही हो न कि कमजोर बैंकों के साथ। कमजोर बैंक यदि स्वस्थ नहीं हो पाते तो उनका विलय मजबूत बैंकों में करने के बजाय उन्हें बंद कर दिया जाए।
नरसिम्हन कमेटी की सिफारिशों के विपरीत आज सरकार कमजोर व बीमार बैंकों की समस्या से निपटने के लिए इनका बड़े बैंकों में विलय करने पर विचार कर रही है जबकि कोई बड़ा बैंक भी इतनी मजबूत स्थिति में नहीं है कि इन कमजोर बैंकों का बोझ सहन कर सके।
सरकार ने मोटे तौर पर नरसिम्हन कमेटी की सिफारिशें स्वीकार कर लीं, लेकिन समय पर क्रियान्वयन नहीं होने का नतीजा यह हुआ कि तीन दशक पहले बाहर से ‘स्वस्थ’ नजर आने वाले बैंक आज न केवल ‘आंतरिक बीमारियों’ से ग्रस्त हैं बल्कि बाहर से भी जीर्ण अवस्था में नजर आ रहे हैं। इसके बावजूद इन ‘रोगियों’ को सघन चिकित्सा इकाई में भर्ती कर इलाज के बजाय इन्हें घरेलू नुस्खों से ही ठीक करने का प्रयास किया जा रहा है। संभव है कि बैंकों का परस्पर विलय अनेक समस्याओं का समाधान साबित हो, लेकिन इससे कई नई तरह की समस्याएं पैदा नहीं होंगी यह भी विचारणीय है।
सरकारी बैंकों में शाखा स्तर पर कर्मचारी काम के बोझ से त्रस्त हैं और इसका मुख्य कारण बैंकों के प्रधान व नियंत्रक कार्यालयों में आयोजना एवं विकास, निरीक्षण एवं अंकेक्षण, नीति निर्धारण व प्रशासनिक व्यवस्था के नाम पर बड़ी संख्या में कर्मचारियों का तैनात होना है। बैंकों के विलय का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि प्रधान व नियंत्रक कार्यालयों की इस श्रमशक्ति का इस्तेमाल ग्राहक सेवा, माकेर्टिंग और ऋण वसूली जैसे उत्पादक कार्यों के लिए हो सकेगा।
इस दृष्टि से विलय से कर्मचारियों का कार्यभार कम होने की उम्मीद है। लेकिन कर्मचारी, उनके नेता एवं यूनियन विलय का विरोध करते हैं। छोटे बैंकों के कर्मचारियों को लगता है कि बड़े बैंक में विलय के बाद उनके साथ सौतेला व्यवहार होगा।
सरकारी और गैर-सरकारी बैंकों की बड़ी संख्या के चलते उनके मध्य गलाकाट प्रतिस्पर्धा है। बड़े औद्योगिक घरानों को इसीलिए अधिकांश बैंक कम ब्याज दर पर कर्ज देने को बाध्य हो जाते हैं। बैंकर व्यवसाय वृद्धि के प्रलोभन में जोखिम वाले ऋण भी दे देते हैं।
छोटे बैंकों की एक और बड़ी समस्या ट्रेजरी एवं जोखिम प्रबंधन, धोखाधड़ी की रोकथाम, नियंत्रण तथा कम्प्यूटरीकरण जैसे क्षेत्रों में कुशल मानव संसाधन का अभाव है। कई शहरों में एक ही सडक़ पर आसपास आठ से दस बैंकों की शाखाएं हैं। इससे न केवल इन शाखाओं को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है बल्कि भवन मालिक को मनमाना किराया भी देना पड़ता है। बैंकों के विलय से ऐसी शाखाओं का भी विलय हो सकेगा।
बैंकों का विलय नि:संदेह कई पुरानी बीमारियों का इलाज करेगा लेकिन इस मार्ग में कुछ बड़ी बाधाएं और चुनौतियां भी हैं। विलय के लिए बैंकों की कम्प्यूटर तकनीक में एकरूपता की जरूरत है। दूसरी बड़ी चुनौती बैंकों की पृथक कार्य संस्कृति है। ऐसे में मानव संसाधन से जुड़ी समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं।
वर्तमान में पच्चीस-तीस हजार करोड़ रुपए की परियोजनाओं को बीस-तीस बैंक समूह मिलकर कर्ज देते हैं। बैंकों की संख्या कम हो जाने पर क्या वे बड़ी परियोजनाओं को कर्ज देने का जोखिम उठा पाएंगे। शायद नहीं। दूसरी ओर, भारतीय बैंकों की ग्राहक सेवा में सुधार का एक बड़ा कारण प्रतिस्पर्धा है। विलय से प्रतिस्पर्धा कम होगी तो सेवा का स्तर भी गिरने का अंदेशा बना रहेगा। इसके अलावा कई बैंक ऐसे हैं जो क्षेत्रीय जनभावनाओं से जुड़ाव रखते हैं। इसी के अनुरूप उन्हें समर्थन मिलता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था नाजुक दौर से गुजर रही है। यह समय प्रयोग का नहीं, अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए कारगर उपाय करने का है। ऐसे में यदि सरकार बैंकों के विलय पर विचार कर रही है तो उसे पहले बैंकों की शीर्ष स्तर पर कार्यप्रणाली पारदर्शी बनाने, बैंकों के निदेशक मंडल को प्रभावी बनाने, धोखाधड़ी की रोकथाम करने तथा ऋणों की वसूली में समान न्याय की व्यवस्था कायम करनी होगी। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के आंदोलनरत कर्मचारियों व अधिकारियों की तर्कसंगत मांगों की भी अनदेखी नहीं होनी चाहिए। जैसे किसी भी बड़े ऑपरेशन से पूर्व रक्तचाप एवं छोटी बीमारियों का निराकरण जरूरी है, बैंकों के विलय पर भी यह लागू होता है।