
खनन माफिया पर लगाम के सरकारी दावे कागजों में ही सिमटते नजर आ रहे हैं। माफिया का इससे ज्यादा दुस्साहस और क्या होगा कि अवैध खनन रोकने गए अफसर-कार्मिकों की जान तक लेने से नहीं डर रहे। राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले के छोटी सादड़ी क्षेत्र में अवैध खनन रोकने गए वन विभाग के रेंजर को डंपर से कुचलने की घटना सीधे-सीधे कानून-व्यवस्था के रखवालों को चुनौती है।यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी वन, खनिज व पुलिस महकमे के अधिकारी-कर्मचारी ऐसे ही बेखौफ माफिया का शिकार बन चुके हैं। जांच की खानापूर्ति, विशेष जांच टीमों का गठन और सजा के सख्त प्रावधान भी खनन माफिया पर लगाम नहीं लगा पा रहे। राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेश में बजरी के अवैध खनन और परिवहन को लेकर दो साल पहले टिप्पणी की थी कि लगता है कि पुलिस और खान विभाग की बजरी माफिया से मिलीभगत है। सरकार माफिया के खिलाफ कागजी अभियान चलाती है और जब कार्रवाई की बारी आती है, तो खानापूर्ति के अलावा कुछ नहीं किया जाता। अभियानों को लेकर विधानसभा तक में मंत्री लाचारी भरा जवाब दें कि कोई भी अभियान दो-दो, तीन-तीन साल थोड़े ही चलता है, तो माफिया के खिलाफ खानापूर्ति के अभियानों की हकीकत भी सामने आ जाती है।
वस्तुत: माफिया के लिए चलाए जाने वाले अभियान तो सतत रूप से चलने चाहिए। तब जाकर ही कानून का डर लोगों के अंदर पैदा किया जा सकता है। सरकारी नियम-कायदों, रॉयल्टी और पर्यावरणीय शर्तों की अनदेखी कर माफिया मालामाल होते जा रहे हैं। राजनीतिक संरक्षण, भ्रष्टाचार और विभागों के बीच समन्वय की कमी भी माफिया को पनपाने के लिए जिम्मेदार हैं। संयुक्त प्रवर्तन दल बनाने, ड्रोन और जीपीएस आधारित निगरानी की व्यवस्था भी तब ही कारगर साबित होगी जब मिलीभगत के खेल को रोका जाएगा। साथ ही कानून को चुनौती देने वालों को ऐसी सजा देनी चाहिए, जिससे अपराधियों के अंदर भय पैदा हो सके।