
देश के तमाम बड़े शहर वाहनों की रेलमपेल व जाम की समस्या से ग्रस्त हैं। शहरों में दर्जनों फ्लाइओवर भी इस समस्या का समाधान नहीं कर पा रहे। इस समस्या के बीच नेशनल स्टेटिस्टिक्स ऑफिस की ओर से देश में पहली बार किए गए नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे के परिणाम चौंकाने वाले और चिंता में डालने वाले भी हैं। सर्वे कहता है कि हमारे देश में सिर्फ 15 प्रतिशत लोग ही काम पर आवागमन के लिए सार्वजनिक परिवहन सेवा का उपयोग करते हैं। बाकी लगभग 50 प्रतिशत कार या दुपहिया वाहन का उपयोग करते हैं और शेष 35 फीसदी पैदल या साइकिल से चलते हैं।
अगर हम दुनिया के दूसरे देशों से हमारी तुलना करें तो इस दौड़ में हम अभी बहुत पीछे हैं। ये किसी से छिपा नहीं कि आज देश के बड़े शहर ट्रैफिक और पार्किंग संकट की लाइलाज बीमारी से जूझ रहे हैं। हर साल वाहनों की तेज गति से बढ़ती रफ्तार हमारे शहरों को ट्रैफिक की समस्या से तो रूबरू करा ही रही है, बढ़ता प्रदूषण भी बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रहा है। भारत की तुलना में अधिक समृद्ध देश जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, हॉलैंड, स्पेन, इटली, जापान और सिंगापुर इस मामले में हमसे बहुत आगे हैं। इन देशों में 90 फीसदी से अधिक लोग काम पर जाने के लिए सार्वजनिक परिवहन सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब दूसरे देश मेट्रो बस अथवा अन्य साधनों का इस्तेमाल करते हैं तो हम क्यों नहीं? क्या हमारी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था सुदृढ़ नहीं है अथवा हमें अपने वाहनों का इस्तेमाल करना अधिक सुविधाजनक लगता है। कारण एक नहीं दोनों है। दूसरे देशों की तुलना में 145 करोड़ जनसंख्या वाले हमारे देश में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं है। ट्रैफिक से जुड़ी प्रदूषण की समस्या से छुटकारा पाने के लिए देश की राजधानी में कुछ समय पहले ऑड एंड ईवन व्यवस्था लागू की गई थी। यानी आधे वाहन एक दिन सड़कों पर उतरें तो शेष अगले दिन। लेकिन यह व्यवस्था भी शीघ्र दम तोड़ गई। जिस गति से वाहनों की संख्या बढ़ रही है, वह भविष्य की तस्वीर को लेकर चिंता पैदा करने वाली है। इससे निपटने के ठोस उपाय अभी तलाशने पड़ेंगे।
सबसे बेहतर विकल्प तो यही है कि शहरों में सार्वजनिक परिवहन के लिए बस सेवाओं को मजबूत बनाया जाए। दूसरा उपाय स्कूलों, दुकानों और सरकारी-निजी कार्यालयों के समय भी शिफ्टों में किए जा सकते हैं। इससे सुबह और शाम के समय लगने वाले जाम से मुक्ति मिल सकती है। इसके साथ-साथ प्रदूषण से भी मुक्ति मिल सकती है। दुनिया के दूसरे देशों की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का अध्ययन करके उससे भी कुछ सीख ली जाए तो देश एक बड़ी समस्या के निदान की तरफ सकारात्मक कदम उठा सकता है।