
घटिया भोजन की शिकायत पर गुना (मध्य प्रदेश) के बजरंगगढ़़ स्थित नवोदय विद्यालय के हॉस्टल में रह रहे विद्यार्थियों का स्कूल प्रबंधन के खिलाफ गुस्सा इस कदर पहुंच जाए कि एक दो नहीं, बल्कि 360 छात्र खुद को हॉस्टल में बंदकर सामूहिक आत्महत्या की धमकी जैसा कदम उठा लें तो शिक्षा केंद्रों में बदइंतजामी पर चिंता होना स्वाभाविक है। नवोदय विद्यालय के प्रिंसिपल पर आरोप है कि हॉस्टल में घटिया भोजन मिलने की शिकायत पर एक छात्र की बेरहमी से पिटाई कर दी गई। खराब भोजन और छात्र की पिटाई से उपजे आक्रोश के चलते विद्यार्थियों को यह कदम उठाने को मजबूर होना पड़ा। समस्या के चरम पर पहुंचने पर ऐसा कदम उठाने की नौबत आती है। नवोदय विद्यालय की यह घटना तो बानगी है। ऐसा आक्रोश देशभर में निजी व सरकारी शिक्षण संस्थाओं से जुड़े छात्रावासों की व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाने वाला है।
चिंता की बात यह है कि माता-पिता अपने बच्चों का हॉस्टल में दाखिला इस उम्मीद से कराते हैं कि उन्हेें यहां पर घर जैसा माहौल मिलेगा। यह प्रकरण तो नवोदय विद्यालय का है जहां अपेक्षाकृत बेहतर व्यवस्थाओं की उम्मीद की जानी चाहिए। लेकिन आमतौर पर यह देखने में आता है कि स्कूल ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भी हॉस्टल के नाम पर मनमानी फीस वसूलने के बावजूद इनमें रहने वालों को उसके अनुरूप सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। बच्चों को भोजन ही गुणवत्ता वाला नहीं मिले तो फिर सेहत से जुड़ी समस्याएं होना स्वाभाविक है। घर से दूर रह रहे बच्चों की मजबूरी यह रहती है कि वे कॅरियर के डर से अव्यवस्थाओं की शिकायत करने में कतराते हैं। गुना की यह घटना भी सामने नहीं आती यदि घटना के तीन दिन बाद जांच टीम यहां नहीं पहुंचती और नवोदय स्कूल के आला अफसर छात्रों के बयान नहीं लेते। ऐसा नहीं है कि सभी शिक्षण संस्थाओं के छात्रावासों में एक जैसा हाल हो, लेकिन जहां भी भोजन व आवास व्यवस्था में कुप्रबंधन की शिकायतें आती है उसमें संस्थानों के लालच के साथ-साथ निगरानी का अभाव भी साफ नजर आता है। देखा जाए तो विद्यार्थियों केे साथ मारपीट व अमानवीय व्यवहार भी माता-पिता के उस भरोसे को तोडऩे वाला है, जिसमें वे अपने बच्चों को घर से दूर रखकर पढऩे भेज देते हैं। शिक्षण संस्थान किसी भी स्तर का हो, यह उम्मीद की जाती है कि वहां बच्चों को अच्छी शिक्षा, छात्रावासों में पौष्टिक भोजन के साथ सुरक्षित वातावरण भी मिलेगा।बच्चों को आखिरकार कठोर कदम उठाने को मजबूर क्यों होना पड़ा? प्रशासनिक स्तर पर उनकी शिकायतों पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया और सजा के रूप में बर्बरता से मारपीट का हक आखिर किसी को क्यों मिले? इन तमाम सवालों के साथ समूचे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई का माहौल व सुरक्षित वातावरण बच्चों को मिलना ही चाहिए।