
राजस्थान में सरकारी शिक्षा का बदहाल ढांचा एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार इसका कारण जयपुर जिले का रामपुरा-कंवरपुरा गांव है। तीन दिन पहले इस गांव के स्कूल का 'निरीक्षण' करने गई कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की एक टोली के साथ मारपीट हो गई। इससे पहले झालावाड़ जिले के एक स्कूल की जर्जर इमारत ढहने से राजस्थान का शिक्षा ढांचा सुर्खियों में आया था। उसके बाद इमारत ढहने, दीवारें और प्लास्टर गिरने की कई घटनाएं हुईं।
सीजेपी की टोली जिस स्कूल में गई, वहां जर्जर भवन वाले स्कूल के बच्चों को तबेले के एक हिस्से में स्थानांतरित किया गया था।
सीजेपी की टीम का किसी गांव के एक स्कूल का इस तरह निरीक्षण पर जाना सही था या उसके राजनीतिक कारण थे, यह एक विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन इस पार्टी ने जैसे ही स्कूलों के निरीक्षण के लिए अभियान की घोषणा की और सरकार ने 'पूर्व अनुमति' का अवरोध लगा दिया, उसने कई तरह के सवाल खड़े कर दिए। विपक्ष का कहना है कि सरकार स्कूलों की जर्जर हालत और अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए ऐसे प्रतिबंध लगा रही है। यदि सब कुछ ठीक है तो ऐसे प्रतिबंधों की क्या आवश्यकता है। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर का यह तर्क गले नहीं उतरता कि इस आदेश का उद्देश्य पढ़ाई में व्यवधान को रोकना और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
किसी भी राज्य की सामाजिक और आर्थिक प्रगति उस राज्य की शिक्षा व्यवस्था और साक्षरता दर पर निर्भर करती है। राजस्थान का दुर्भाग्य है कि इस मामले में प्रदेश की स्थिति बहुत पीछे है। साक्षरता दर के मामले में राजस्थान का देश में 33वां स्थान है। राजकीय प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का ढांचा बुरी तरह चरमराया हुआ है। सरकार के स्वयं के सर्वे के अनुसार 65,308 स्कूलों में से 3,768 पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं, जबकि 611 स्कूलों के पास अपना भवन ही नहीं है। इसी तरह 2,047 स्कूलों में शौचालय नहीं हैं और 1,049 में पेयजल की व्यवस्था नहीं है।
राजस्थान का शिक्षा बजट लगभग 69 हजार करोड़ रुपए है। इसमें 70-75 प्रतिशत हिस्सा वेतन-भत्तों पर खर्च हो जाता है। बुनियादी ढांचे के लिए 5 से 10 प्रतिशत बजट ही उपलब्ध हो पाता है, जिसे ऊंट के मुंह में जीरा ही कहा जाएगा। सरकार ने स्कूल भवनों के निर्माण और मरम्मत के लिए पांच साल में 12,335 करोड़ रुपए खर्च करने की घोषणा की थी, लेकिन पहले दो वर्षों के लिए 610 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष बहुत कम प्रावधान है। इसे देखते हुए आशंका प्रकट की जा रही है कि बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करने में कम से कम एक दशक लग जाएगा। सीजेपी वाली घटना होते ही इस पांच साल की अवधि को घटाकर तीन साल कर दिया गया है।
शिक्षा के महत्व को देखते हुए विभाग किसी दूरगामी सोच वाले और परिणाम दिखाने वाले मंत्री को दिया जाना चाहिए। मौजूदा शिक्षा मंत्री मदन दिलावर जिस तरह के विवादित बयानों और कार्यों से चर्चा में रहते हैं, उसे देखते हुए लगता नहीं है कि ऐसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी वे उतनी गंभीरता से उठा पा रहे हैं। गत वर्ष विधानसभा में उन्होंने दो पंक्ति पढ़ी थीं, 'जो मंजिलों को पाने की चाह रखते हैं, वे समुद्र पर भी पत्थरों का पुल बना देते हैं।' … और कुछ बना पाएं या नहीं, वे बयानों के समुद्र में विवादों के पुल जरूर बना रहे हैं। तबादला नीति तो आज तक नहीं बन पाई। सत्र शुरू हुए काफी समय निकल गया, पर नौवीं दसवीं के बच्चे तक पुस्तकें पहुंची ही नहीं।
पहले स्कूलों में शिक्षकों के मोबाइल रखने पर प्रतिबंध लगाया गया। जब विरोध शुरू हुआ तो कुछ शर्तों के साथ अनुमति दे दी गई। करीब दो साल पहले शिक्षा मंत्री ने आदिवासी समुदाय पर विवादास्पद टिप्पणी की। बाद में उन्हें माफी मांगनी पड़ी। विधानसभा में वे स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि राज्य में शिक्षकों के 86 हजार से ज्यादा पद खाली हैं।
रामपुरा-कंवरपुरा गांव की घटना के बाद स्थानीय लोगों ने दावा किया था कि पंचायत चुनाव को देखते हुए सीजेपी सोची समझी राजनीतिक रणनीति के तहत यह अभियान चला रही है। कारण भले ही कुछ भी रहा हो, इस बहाने राजस्थान के शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली तो सामने आई। शायद इस कवायद से राजस्थान में गर्त में डूबे एक विभाग का कुछ भला हो जाए।