ओपिनियन

पत्रिका में प्रकाशित आलेख: मदहोश विभाग

हमारा प्रशासनिक तंत्र ढीठ हो चुका है। जब तक आठ-दस लोगों की मौत न हो जाए, उसकी नींद ही नहीं खुलती। सुविधाओं के नाम पर मोटा वेतन चाहिए, पर जिम्मेदारी निभाने में शून्य।
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Jul 08, 2026
pravah article
फोटो: पत्रिका

हमारा प्रशासनिक तंत्र ढीठ हो चुका है। जब तक आठ-दस लोगों की मौत न हो जाए, उसकी नींद ही नहीं खुलती। सुविधाओं के नाम पर मोटा वेतन चाहिए, पर जिम्मेदारी निभाने में शून्य। सोमवार को जयपुर जिले के चंदवाजी में खेत में करंट लगने से दो भाइयों की मौत हो गई। मनोहरपुर में दिल्ली की लाइन दुरुस्त करते समय एक ठेका कर्मचारी मारा गया। पिछले सप्ताह करौली जिले में हाईटेंशन लाइन के तार टूटने से तीन जनों की मौत हो गई। लगता है राजस्थान का ऊर्जा मंत्रालय और बिजली निगम के अफसर-इंजीनियर अफीम खाकर सोए हुए हैं। प्रदेशवासियों को कीड़े-मकोड़े समझने लगे हैं।

बिजली के नाम पर यूं तो स्वर्णिम माहौल बनाया जा रहा है। सौर ऊर्जा, बड़े-बड़े बिजलीघर, हाइटेंशन लाइनों का जाल, हाइटेक मीटर, बिलिंग की डिजिटल व्यवस्था… और भी न जाने क्या-क्या। 'इन्फ्रास्ट्रक्चर' विकास ही मानो सब कुछ हो गया है। सेवा के मामले में ठन-ठन गोपाल ! 'इन्फ्रास्ट्रक्चर' में मोटा कमीशन मिलता है-सेवा में कुछ नहीं मिलता। बिजली वितरण कंपनियां कर्ज ले कर घी पीने में लगी हैं। वितरण कंपनियों के आलीशान एयरकंडीशंड दफ्तरों में बैठकर अफसरों-इंजीनियरों ने राजस्थान की जनता के सिर पर 88,700 करोड़ रुपए का बोझ डाल दिया, पर उपभोक्ताओं को भगवान भरोसे छोड़ दिया। जगह-जगह झूलते, पेड़ों की टहनियों में उलझे तार, खम्भों में दौड़ता करंट, तार टूटने के बाद भी ऑटो-ट्रिप न होना- ये सब अफसरों की घोर लापरवाही को दर्शाते हैं। जरा सा मौसम खराब होते ही बिजली गुल होना, कम वोल्टेज आना, आए दिन घरेलू उपकरणों का फुंकना रोज की बात हो गई है। यह तब है जब उपभोक्ताओं से कई तरह के शुल्क बिल में जोड़ कर वसूले जाते हैं।

पिछले साल करंट से पिता-पुत्र की मौत के एक मामले में अदालत ने जयपुर विद्युत वितरण निगम को जिम्मेदार ठहराते हुए परिजन को करीब सवा करोड़ रुपए का मुआवजा ब्याज सहित देने का आदेश दिया था। फिर भी अफसरों को शर्म नहीं आई। भूमिगत तारों में करंट की शिकायतें भी बढ़ रही है। निर्धारित गहराई की बजाय एक-दो फीट पर ही ठेकेदार लाइन डाल देते हैं। जेबें गर्म तो आंख बंद ! फिर कोई मरे या घायल हो, अफसरों को क्या फर्क पड़ता है। उनके बच्चों के लिए सुख-सुविधाएं जुट ही रही हैं! मौत होती है तो जनता को ही सुरक्षा के उपाय करने के उपदेश दे दिए जाते हैं। रखरखाव के कर्मचारी संविदा पर रखे जाते हैं। उन्हें पर्याप्त सुरक्षा साधन उपलब्ध नहीं कराए जाते। मरम्मत के समय शटडाउन में लापरवाही बरती जाती है। दूसरे विभागों के साथ भी पर्याप्त समन्वय नहीं होता।

बिजली विभाग को जनता के जीवन से खेलने की अनुमति क्यों दी जा रही है? लापरवाही और अकर्मण्यता के लिए हर स्तर पर जिम्मेदारी तय करनी होगी। मंत्री और सचिव से लेकर इंजीनियरों और लाइनमैन तक। अदालत जुर्माना लगाए तो अफसरों के वेतन से काटना चाहिए और लापरवाही से हुई मौतों के लिए अफसरों व इंजीनियरों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए। तभी जाकर नींद में सोए इस विभाग की आंखें खुलेंगी।
bhuwan.jain@in.patrika.com

Updated on:
08 Jul 2026 11:23 am
Published on:
08 Jul 2026 11:23 am