ओपिनियन

शरीर ही ब्रह्माण्ड: माया और मैं

प्रारब्ध कर्म जीवात्मा से जुड़े होते हैं, शरीर से नहीं। शरीर तो सदा माध्यम ही रहता है। जीव की इच्छा जिसे न रोका जा सके, न बदला जा सके वही प्रारब्ध की प्रतिनिधि है।

4 min read
Apr 11, 2026
फोटो: पत्रिका

मैं यानी आत्मा और महामाया। बाहर आत्म-पुरुष, भीतर महामाया। महामाया मेरी कामना है। मैं षोडश कल जीवात्मा हूं। देह मेरी क्षर पुरुष (अपरा) है। मैं अव्यय मन हूं। महन्मन जीवात्मा का मन है। यह मन कामना के साथ हृदय में उत्पन्न होता है। यही महामाया का भी आश्रय स्थल है। महन्मन का केन्द्र ही अव्यय मन है। यहां संचित कर्म रहते हैं। प्रारब्ध अलग होकर महन्मन से जुड़ जाता है।

क्षर पुरुष में अपरा प्रकृति के रूप में शरीर-मन-बुद्धि-अहंकार होते हैं। यहां मन के दो रूप होते हैं-इन्द्रिय मन और सर्वेन्द्रिय मन। विषय इन्द्रिय मन पर आते हैं और वहां से वे सर्वेन्द्रिय मन के बुद्धि के क्षेत्र में जाते हैं। अहंकार स्वयं को महत्त्व देता है, माया उसे दिखाई नहीं देती। माया और मैं जीते साथ-साथ हैं। माया अति सूक्ष्म है। बुद्धि को आसानी से भ्रमित कर सकती है-भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया (गीता 18.61)

ये भी पढ़ें

शरीर ही ब्रह्माण्ड : विवर्त भाव में मौन माया

सूक्ष्म में मैं अकेला जीवात्मा हूं। स्थूल में चारों ओर स्वजनों और परिजनों का बड़ा संसार खड़ा है। इनके साथ मेरा आदान-प्रदान भी स्थूल मन-बुद्धि से होता है, अतः संवादों का सूक्ष्म स्तर प्रकट ही नहीं हो पाता। क्या मां से बातचीत में यह याद आता है कि इसी ने मुझे जन्म दिया है? मेरी इस देह का निर्माण इसी मां ने अपनी देह से किया है। इसी के पेट में मैं 9-10 माह बन्द रहा हूं। यही जीवन का बड़ा सत्य है।

यही बात भाई-बहनों से बातचीत पर लागू होती है। कहां याद रहता है कि इनको भी इसी मां ने पेट में रखा है, पोषित किया है और जन्म दिया है। इस घर में दोनों बाहर से आए हैं और आपस में झगड़ रहे हैं कि मानो यह हमारा है। जब अपना शरीर ही अपना नहीं मां का है तब कोई भी दूसरी चीज अपनी कैसे हो सकती है? बड़ों को भी कहां याद रहता है अपने मूल अस्तित्व का? शायद ही किसी को यह भान रहता होगा कि हम तो मोहरे हैं, प्रकृति के हाथों में।

मां-बाप शरीर देते हैं। आत्मा आकर रहता है इसमें। यह भी माया का ही खेल है। माता-पिता मिलते हैं अपने-अपने कर्म फलों से। लक्ष्य उनका भी ब्रह्म का विवर्त ही होता है। किन्तु भाग्य भिन्न-भिन्न होता है। आने वाला आत्मा भी भाग्य लेकर आएगा। जीव को लाने में माता-पिता की प्रार्थना उसी प्रकार के जीव को आकर्षित करती है। जीव भी अपना निर्णय करके मां की कोख का चयन करता है। महामाया की इसमें बड़ी भूमिका रहती है। योनि का निर्धारण कर्मों के आधार पर होता है। मानव योनि में ही ब्रह्मांश अधिकांशतः जाग्रत अवस्था में रहता है। पत्नी जब पति के अवयवांश एकत्र कर रही होती है, तभी दोनों के मायाभाव भी मिलते हैं।

माया का स्थान इतना गूढ़ होता है कि उसकी भूमिका का आभास तक नहीं हो पाता। पुरुष को तो अत्यल्प-सी समझ हो पाती है माया की। उसे परोक्ष भाषा (देवों की) भी नहीं आती है और न ही शब्द के साथ ध्वनि को ही पकड़ पाता है। स्त्री जहां अपरा के स्तर पर संवाद करती है, वहीं एक पत्नी परा के धरातल पर भी जीती है। इसी से अन्तर्ज्ञान में भी पत्नी भारी पड़ती है। यह सूक्ष्म धरातल ही उसका मायाभाव कहलाता है।

पूरी उम्र स्त्री-पुरुषों के मध्य आदान-प्रदान होता रहता है। क्या यह सामान्य-सी बात है? इसमें कुछ तो प्रारब्ध से जुड़े विषय रहते हैं, कुछ मायाजाल का चक्र काम करता है, कुछ जीवेच्छा होती है। माया पुरुष के भीतर और स्त्री के स्थूल भाग में प्रकृति रूप ही कार्य करती जान पड़ती है। माया में कर्ता भाव नहीं है। प्रारब्ध में क्रिया-प्रतिक्रिया होती है। दोनों को कर्मफल भोगने का तथा मुक्त हो जाने का समान अधिकार होता है। ये कर्म पशुवत भोगरूप भी हो सकते हैं जिनकी स्मृतियां भी शेष नहीं रहतीं।

प्रारब्ध कर्म जीवात्मा से जुड़े होते हैं, शरीर से नहीं। शरीर तो सदा माध्यम ही रहता है। जीव की इच्छा जिसे न रोका जा सके, न बदला जा सके वही प्रारब्ध की प्रतिनिधि है। इच्छा में क्रिया नहीं होती। क्रिया को रोका जा सकता है ताकि नए कर्म शुरू ही न हों। इसके लिए जागरूकता चाहिए। आरंभिक वर्षों में हम अनेक प्रकार के अनायास कर्मों को कर गुजरते हैं, जो प्रकृति का ही कार्य होता है।

प्रारब्ध कर्म की इच्छा भावना या वासना के आधार पर दिशा पकड़ती है। व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन के मानचित्र की भी भूमिका महत्वपूर्ण है, जो व्यक्ति की समझ से बाहर होती है। अनेक स्थूल क्रियाएं इस अज्ञान के भटकाव से भी होती हैं। यह अज्ञान अहंकार को स्फीत करता है। लड़के में भी, और नए परिवेश की लड़की में भी यह अहंकार समान होता है। ऐसी लड़की का व्यवहार भी लड़के के समकक्ष ही होता है।

एक होता है माया का फन्दा जो हर मोड़ पर जकड़ने को उपस्थित रहता है। हर स्थान पर, हर समय, हर उम्र के मोड़ पर। यह माया का स्वतंत्र कार्य है। कर्मों की नई फाइलें खोलने जैसा। यहां स्वच्छन्द अहंकार का शिकार करती है। आपका सात्विक रूप भी माया का शत्रु होता है। व्यक्ति अनभिज्ञ भी हो सकता है। चंचलता कुछ जिज्ञासा भी उत्पन्न करती है। आपकी मृदुता ही मानो मक्खी को निमंत्रण दे रही है। गुरु कृपा भी, प्रारब्ध का भावी स्वरूप भी रक्षक के रूप में आपके साथ रहते हैं। आप मानो पानी में डुबकी लगाकर सूखे ही बाहर निकल आये।

उर्वशी भी इसी श्रेणी में आती है। माया है, मोहिनी भी है और शक्ति सम्पन्न भी। बड़ी परीक्षा की घड़ी होती है। अर्जुन की तरह बारह मास तक बृहन्नला बनकर रहने की तैयारी बड़ा साहस मांगती है। यह स्त्री-दोष भी जीवन में व्यक्ति का पीछा करता है।

आसुरी भाव कुछ और होता है। वहां बलात्कार, हत्या एक सहज परिणाम है। अहंकार, क्रोध, कामोत्तेजना का सामूहिक आक्रमण भी डालना तो माया के खाते में ही पड़ेगा, भले ही वह मां क्यों न हो।

क्रमश: gulabkothari@epatrika.com

ये भी पढ़ें

शरीर ही ब्रह्माण्ड: प्रारब्ध भोग में सहायक माया

Also Read
View All