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पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख – न्याय का हो नवसूर्योदय

जस्टिस सूर्यकांत जी माननीय मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट
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Aug 01, 2026
Gulab Kothari Article
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी (फोटो: पत्रिका)

जस्टिस सूर्यकांत जी
माननीय मुख्य न्यायाधीश,
सुप्रीम कोर्ट

महोदय, वैश्विक स्तर पर कानून के शासन को मजबूत करने के लगातार प्रयास हो रहे हैं। देश की शीर्ष अदालत के मुखिया के रूप में आप भी इस दिशा में सदैव प्रयासरत रहे हैं। खुशी की बात यह है कि शांति, मध्यस्थता और कानून के शासन विषय चर्चा के लिए कॉमनवेल्थ देशों के प्रतिनिधियों के जयपुर में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुक्रवार को ही आपने उद्घाटन भी किया है। इस सम्मेलन के मंथन से निश्चित ही अमृत निकलकर आएगा यह उम्मीद करता हूं।

माननीय, लंबे समय से मैं न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित करने का प्रयास कर रहा हूं कि उसके सभी आदेशों की पालना हो। अपने आलेखों में भी समय-समय पर मैंने न्याय प्रक्रिया को लेकर अपनी बात सबके सामने रखी है। इससे जुड़े आलेखों से समय-समय पर आपको भी अवगत कराया है। मैंने सुप्रीम कोर्ट के पिछले माननीय मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ कुछ माननीय न्यायाधीशों से भी इस बारे में चर्चा की है। मेरी चिंता यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट कोई आदेश पारित करता है और वह पीढ़ियों तक लंबित रहता है, तब उस याचिकाकर्ता के लिए न्याय का क्या अर्थ रह जाता है? वस्तुतः इस स्थिति ने न केवल न्यायपालिका की गरिमा को प्रभावित किया है बल्कि जनमानस में उसकी छवि पर भी विपरीत असर डाला है।

आप से बेहतर भला इस बात को कौन जान सकता है कि लोकतंत्र में न्याय की भूमिका सर्वोपरि है। अदालतों के डर से ही बहुत सा कार्य सही चलता है। देखा जाए तो लोकतंत्र के तीन पायों में न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों की निगरानी का काम करती है। वह अपने फैसलों से दोनों पायों के गलत निर्णयों को दुरुस्त करने और दोषियों को सजा देने का काम भी करती है। लेकिन सवाल इस बात का है कि यदि न्यायपालिका की, विधायिका और कार्यपालिका अनदेखी और अनादर करना शुरू कर दें तो भला उसके फैसलों का महत्व ही क्या रह जाएगा? आजकल यह काफी हो रहा है कि सरकारें खुद अदालतों के फैसलों को लागू कराने में रुचि नहीं लेती। ऐसे में यह तो यह मान ही लेना चाहिए कि कहीं न कहीं उसका या उसके चहेतों का स्वार्थ इन फैसलों में आड़े आ रहा है।

आम तौर पर देखने में आता है कि अदालतों के फैसले जन-जन के दिल को छूने वाले और उनकी समस्याओं का समाधान करने वाले होते हैं, पर ये लागू नहीं हो पा रहे। इसकी जानकारी भी अदालत तक वापस तभी पहुंचती है जब कोई अवमानना की शिकायत लेकर उसके पास जाए। यदि वह चुप रह गया तो न तो पीड़ित को राहत मिल पाती और न ही अदालत की प्रतिष्ठा रह पाती है।

अधिकांश मामलों में यदि मुकदमा जीतने वाला कमजोर वर्ग का हुआ तो वह फैसले की पालना न होने पर भी अवमानना याचिका नहीं लगा पाता। ऐसे में न्याय होते हुए भी लागू न हो पाता और पैसे वाला, हारकर भी जीत जाता है।

महोदय, प्रश्न यह है कि न्यायालय की दृष्टि में क्या सभी फैसलों को समान रूप से लागू होने की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए? फैसला लागू न होना क्या अन्याय नहीं है? आज तो ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां न्यायालय के आदेशों की अनदेखी न हो रही हो। इसकी वजह यह है कि न तो न्याय पाने की समय सीमा है और न ही फैसलों को लागू करने की। जो फैसले सरकार या सरकारी विभागों के खिलाफ होते हैं उसका तो कोई अर्थ नहीं निकलता। क्योंकि जिस अफसर से गलत कार्य हुआ उसका नाम फैसले में आता ही नहीं।

होना तो यह चाहिए कि हर फैसले के साथ उसे लागू करने की अधिकतम सीमा रखी जाए। सुप्रीम कोर्ट और प्रत्येक उच्च न्यायालय विशेष विभाग होना चाहिए जहां आवश्यकता के अनुरूप एक-न्यायाधीश व दूसरा स्टाफ हो। मेरा आग्रह है कि आपके निर्देश पर इस तरह से एक विशेष प्रकोष्ठ बनाया जाए, जो आदेशों की पालना की समीक्षा करे और उन्हें लागू करवाए। उनका काम हर फैसले के जारी होने से उनके लागू होने तक का रिकार्ड रखने का हो। इससे आम नागरिक के मन में कानून का सम्मान बढ़ेगा और समाज में सुधार होगा।

महोदय, इसी तरह पुराने फैसलों की क्रियान्विति रिपोर्ट जानने के लिए वरिष्ठ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की एक राज्यस्तरीय समिति बनाई जा सकती है। यह समिति यह देखे कि संबंधित प्रदेश में सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय के ऐसे कौन-कौन से फैसले हैं जो आज तक लागू नहीं हो पाए या फिर आधे-अधूरे ही लागू हो पाए हैं। यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में भी जाए और राज्यों में फुल कोर्ट के सामने भी रखी जाए।

माननीय यह बात सच है कि अदालतों में मुकदमों का जो अम्बार लगा रहता है उसे कम करने के लिए मध्यस्थता सबसे आसान तरीका है। अदालती भागदौड़ और वकीलों को भारी फीस की चिंता भी ऐसे प्रयासों से दूर हो सकती है। देश की न्यायपालिकाओं में पांच करोड़ से ज्यादा लम्बित मामले सचमुच चिंता का विषय है।

वैसे तो अदालत के फैसलों की पालना के मामले में जहां हाथ रखो वहीं दर्द वाली हालत है। लेकिन कुछ ऐसे मामले आपके सामने लाना चाहूंगा जिनमें सुप्रीम कोर्ट तक के निर्देशों की अनदेखी साफ नजर आती है। जयपुर का रामगढ़ बांध इसका जीता-जागता उदाहरण है। वैसे तो शहर-कस्बों की जीवन रेखा बने बांध-तालाबों में से अधिकांश का अस्तित्व ही खत्म होता जा रहा है। लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट के बार-बार निर्देश देने के बावजूद रामगढ़ बांध में पानी की आवक के रास्तों को खोला नहीं जा रहा है। कई ऐसे उदाहरण हैं, जहां राजनेता, खनन माफिया का पोषण कर रहे हैं। अरावली की पर्वत श्रृंखलाएं भी खनन माफिया की गिद्ध दृष्टि से बची नहीं हैं। कई जगह तो अरावली की पहाड़ियों को ही माफिया खा गया, अब वहां अवशेष भी नजर नहीं आते। अरावली पर्वत श्रृंखला राजस्थान, दिल्ली और गुजरात सहित कई राज्यों से गुजरती है, अरावली को नहीं बचाया तो इन राज्यों की जलवायु पर बुरा असर होगा।

शहरों के मास्टर प्लान बना तो लिए जाते हैं लेकिन उनकी पालना होती ही नहीं। शहरों व खास तौर से जयपुर के मास्टर प्लान की अवहेलना को लेकर मैंने राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा था। जिस पर संज्ञान लेते कोर्ट ने सरकार को मास्टर प्लान के प्रावधान लागू करने को कहा। आपकी जानकारी में लाना चाहूंगा कि राजस्थान सरकार राहत के लिए सुप्रीम कोर्ट गई तो वहां भी कोर्ट ने राहत देने से इनकार कर दिया। इसके बावजूद मास्टर प्लान की लगातार अवहेलना जारी है।

आज संसद व विधानसभाओं में एक तिहाई सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित करने की बात हो रही है। कानून भी पारित कर दिया गया है। लेकिन अभी आरक्षित सीटों की स्थिति यह है कि कानून की पालना में ये स्थायी रूप से आरक्षित कर दी गईं। यानी इन क्षेत्रों का प्रतिनिधि आरक्षित वर्ग का ही बनेगा कोई और नहीं। जबकि आरक्षित सीटें बदलती रहनी चाहिए ताकि मौका सबको मिले। एक तरीका यह हो सकता है कि सभी राजनीतिक दलों को कहा जाए कि वे अपनी प्रत्याशी सूची में आरक्षण के अनुपात में विभिन्न समूहों के प्रत्याशियों की संख्या निश्चित रखें। मुझे विश्वास है कि ऐसा करने से मामूली अंतर के साथ आरक्षण का लक्ष्य पूरा हो जाएगा। इसी तरह के कोई न कोई सूत्र निर्दलीयों व छोटे दलों के मामले में भी बनाए जा सकते हैं। इससे प्रत्येक नागरिक का मनपसंद स्थान से चुनाव लड़ने का संवैधानिक अधिकार भी नहीं छिनेगा।

इतना ही नहीं, व्यापक चुनाव सुधारों की जरूरत भी है। जिस व्यक्ति पर हत्या व बलात्कार को लेकर आपराधिक मुकदमा चल रहा है उसे चुनाव लड़ने की छूट नहीं मिलनी चाहिए। ये उसकी ही जिम्मेदारी होनी चाहिए कि खुद को निर्दोष साबित करे। आज तो संसद व विधानसभाओं में दागियों की भरमार होती जा रही है।

कॉमनवेल्थ देशों के प्रतिनिधियों को इस तीन दिवसीय सम्मेलन में आमंत्रित करना अच्छी बात है। लेकिन आज जब हमारा देश न केवल स्वतंत्र है बल्कि दुनिया की तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था बन गया है, गुलाम मानसिकता से जुड़े इस नाम का मोह भी हमें त्यागना होगा। ये देश वे हैं जो कभी न कभी ब्रिटिश राज का हिस्सा रहे। बदले हुए समय में हम इस गुलामी के चिन्ह से भी मुक्ति पाने का प्रयास करें तो अच्छा रहेगा।

यह उम्मीद की जानी चाहिए कि जिस तेजी से समय बदल रहा है उस तेजी से लोकतंत्र भी अवश्य बदलेगा। न्यायपालिका के नवसूर्योदय के लिए अब आवश्यकता हो गई है कि वह फैसला भी करे और साथ ही साथ उसकी क्रियान्विति की समय सीमा भी तय करे। एक और तारीख उस फैसले के साथ जोड़े जिसमें सरकार हो या संबंधित पक्ष, उस निर्णय को लागू करने की रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करे। ऐसा होने पर कम से कम भविष्य में होने वाले निर्णय तो समयबद्ध रूप से लागू हो पाएंगे। आम आदमी का न्यायपालिका के प्रति उतना ही विश्वास बना रहेगा जितना ईश्वर के न्याय के प्रति होता है।
शुभकामनाओं सहित

gulabkothari@epatrika.com