
आजादी की 80 वर्ष की यात्रा के लिए देश-प्रदेश के सभी नागरिकों को हार्दिक बधाई! देश बदल रहा है। हमारे यहां 44 प्रतिशत युवा आबादी है। आज का युवा चाहता है कि उसकी आवाज सुनी जाए। उसकी सोच और आवश्यकता दोनों बदल रहीं है। पिछले दिनों हुए युवा जनआन्दोलन ने देश को पुनः आश्वस्त किया है कि समय करवट बदल रहा है। आन्दोलन ने जिस प्रकार सरकारों को झुकने पर मजबूर किया है, उससे जेन-जेड का हौसला भी बुलन्दी पर है। उसका तेवर बना रहा तो हर स्तर पर और हर जगह बदलाव आकर रहेगा।
आज तो स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि राजनेताओं का बर्ताव चुनाव के बाद सामन्तों जैसा हो जाता है। लोकतंत्र की बात उन्हें सुहाती तक नहीं है। यहां तक कि उनका 'पूर्व' तमगा भी प्रशासन पर हावी रहता है। वोट मांगते समय तो गिड़गिड़ाते हैं। चुनाव जीतने के बाद बगुला भगत कहो या दोहरे आचरण वाले, ये किसी के काम नहीं आते। आप अपने चारों ओर नजर डालें। कहां जनता का काम होता नजर आ रहा है?
अतिक्रमण की तेज गति शहरों को लील रही है। शिक्षा-स्वास्थ्य-सड़कें-यातायात जैसे महत्वपूर्ण सरकारी विभाग तो मानो बन्द ही हो गए। जयपुर के रामगढ़ बांध का उदाहरण तो लापरवाही व अनदेखी की सारी सीमाएं पार कर चुका। बांध को पुराना स्वरूप दिलाने की उच्च न्यायालय की मंशा को बड़े-बड़े अधिकारी भी हवा में उड़ा देते हैं। क्या सरकार को यह सब दिखाई नहीं देता? रामगढ़ अभियान के पुनरुद्धार के काम को तो स्वयं मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने ही हाथ में लिया था। ढिलाई देखकर लगता तो यही है कि अधिकारी मुख्यमंत्री का भी सम्मान नहीं करते।
राजस्थान में पंचायत राज और स्थानीय निकायों के चुनाव आ गए हैं। पूरे पांच साल भूमिगत रहे नेता फिर वोट मांगने आएंगे। अपने घरवालों को, चहेतों को भेजेंगे। बेशर्मी के साथ नए वादे करेंगे। इस बार हमें अपनी-अपनी सड़कों के गड्ढे गिन लेने हैं। युवा पीढ़ी की मदद से दोहरे आचरण वाले नेताओं को बाहर कर देना है।
आज क्या दुर्दशा हो गई है हमारे लोकतंत्र की ! हर विभाग माफिया के हवाले हो गया लगता है। ठेके पर कर्मचारी, ठेके पर अधिकांश सरकारी कामकाज, भ्रष्टाचार की सीमा नहीं और फिर भी सीनाजोरी। पिछले करीब एक साल से तो पंचायतीराज प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों सौंप दिया ताकि सरकार के कामकाज की प्रशंसा का मार्ग ही बन्द हो जाए। कानून का डर किसको? उल्टा न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार और राजनीति के आरोप-वाह! ये सारी समस्याएं युवा पीढ़ी एक झोंके के साथ हल कर सकती है।
भामाशाहों की भूमि, मीरा के कृष्ण के स्पन्दन और शूरवीरों की धरती पर आज तो लगता है कोई भला मानस बचा ही नहीं। चारों ओर आपराधिक प्रवृत्ति के लोग ही फैले पड़े हैं। ये ही सरकार की परिभाषा तय करते हैं। ये न लोकतंत्र है, न गणतंत्र है और न ही स्वतंत्र है।
आजादी धूल धूसरित जान पड़ती है। धूल की परतों को झाड़ने का सही समय है। निकाय व पंचायत चुनावों में सभी अच्छे लोग- चाहे किसी भी जाति-धर्म-सम्प्रदाय से हों-अच्छे जनप्रतिनिधि चुनने का संकल्प लेकर खड़े हो जाएं। साफ-सुथरे चुनावों के लिए लड़ना पड़े तो सबको एकजुट होना पड़ेगा-प्रशासन, न्यायपालिका और मीडिया को भी।
आज तो कोई भी दूध का धुला नजर नहीं आता। न तो नेता, न ही अफसर। कार्यकर्ता भी आज खुद को नेता से कम नहीं मानता। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे दिखाई देते हैं। चुनावों में भी कार्यकर्ता कम, पैसा ज्यादा काम आता है। उसका भी सारा हिसाब नकली। तब सही आचरण लोकतंत्र में कहां से आएगा?
राजनीति लोगों को उलझा रही है। एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर रही है। पांच साल के लिए कोई भी कुर्सी मिल जाए, केवल कमाना है। ये कैसा लक्ष्य है? उसे आप वापस बुला भी नहीं सकते।
चुनाव भी माफिया के जाल में फंसता जा रहा है। मतदाता सूचियों से नाम तो क्या सूचियां ही गायब हो जाती है। इसी के दम पर और साहबजादे जीतते रहते हैं। क्योंकि जनता मौन है। अब युवा उठ खड़ा हुआ है। आगे ऐसा नहीं हो पाएगा। न सड़कें ऐसी रहेंगी, न ही यातायात।
पत्रिका का जनप्रहरी अभियान राजनीति को स्वच्छ करने का अभियान ही है। यदि राजनीति में अच्छे लोग आने लगें तो गंदगी स्वतः ही दूर हो जाएगी। उम्मीदवार भी सामाजिक पहचान वाले हों, शिक्षित एवं संस्कारवान हों। आपने भी कई सामाजिक सरोकारों में पत्रिका के साथ भागीदारी की है। अमृतं जलम्, हरयाळो राजस्थान तो जन भागीदारी की अनूठी पहचान बन चुके हैं। जनप्रहरी अभियान ऐसा ही जन-जन का हितकारी अभियान है, जिसमें अच्छे नेतृत्व को आगे लाने का प्रयास है।
एक छोटा दीपक भी अंधकार को भगा देता है। हमें नए दीए जलाने हैं। नाम नहीं काम करने वाला- कर्ता-दृढ़ संकल्पवान चाहिए। जो बीज के रूप में जमीन में गड़कर पेड़ बनने की क्षमता रखता हो। जनता धरती माता है। फल भी समाज को मिलेंगे। हमारे सपने गांव-प्रदेश के लिए हों। वरना हम अपने ही जन प्रतिनिधियों के लिए बद्दुआ मांगते रहेंगे। हमें स्वयं का सपना पूरा करने के लिए भी आगे आना है। तभी भ्रष्टाचार मुक्त शासन स्थापित होगा। संकल्प नेक हो तो ईश्वर भी साथ देता है। वरना असुर तो सब-कुछ उजाड़ देते हैं।
आप हर व्यक्ति को, उसके परिवार को नजदीक से और लम्बे समय से भी जानते हैं। गांव-शहर में कौन क्या करता है, आपसे छुप नहीं सकता। उठो! संकल्प करो कि न गांव में और न शहर में कोई भ्रष्टाचारी बचेगा नहीं। हर एक भ्रष्ट पर जेन-जी टूट पड़ेगी। भावी चुनावों में भी कोई भ्रष्ट नहीं जीत पाएगा। आपके पहरे से। कोई धांधली नहीं ठहर पाएगी। पत्रिका के जनप्रहरी अभियान से चुने गए जनप्रतिनिधियों का कार्यकाल आप पहले भी देख चुके हैं। ये राजनीतिक दलों के एवं अन्य भ्रष्टों को हराकर जीते हैं। आगे की कमान अब पत्रिका आपको सौंपता है। आप ही नए कर्णधार तक तय करें। इस उम्मीद के साथ कि काठ की हाण्डी दुबारा चढ़ने का युग समाप्त करेंगे।
वंदे मातरम् !