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पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख – जनहित के विरुद्ध विकास

पत्रिका लगभग तीन दशक से कृषि क्षेत्र में हो रहे 'मृत्यु सूचक विकास' पर लिख रहा है। हमने रसायन के उपयोग पर सर्वेक्षण करवाकर रिपोर्ट छापी है। कैंसर ट्रेन की चर्चा बार-बार की है। सरकार में बैठे स्वार्थी तत्वों के कानों में जूं तक नहीं रेंगी।

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जयपुर

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Gulab Kothari

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गुलाब कोठारी

Jun 07, 2026

Gulab Kothari

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी

जीवन में ब्रह्म दो ही रूप में कार्य करता है। एक अन्न रूप और दूसरा नाद ब्रह्म (स्पन्दन) रूप में। अन्न ब्रह्म को विकास ने यमदूत बना डाला। आज पत्रिका में प्रकाशित समाचार 'खेतों तक जहर' इसका स्पष्ट उदाहरण है। चार दशक से हम अंग्रेजों की झूठन -मानसिकता- को ढो रहे हैं। विकास की जो परिभाषा आज देश में लागू है, उसकी शैली देश की परंपरा और प्रकृति के विरुद्ध है। भारतीयता से दूर भागना विकास है!

पत्रिका लगभग तीन दशक से कृषि क्षेत्र में हो रहे 'मृत्यु सूचक विकास' पर लिख रहा है। हमने रसायन के उपयोग पर सर्वेक्षण करवाकर रिपोर्ट छापी है। कैंसर ट्रेन की चर्चा बार-बार की है। सरकार में बैठे स्वार्थी तत्वों के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। आज हमने वो समाचार पढ़ ही लिया, जिसका डर था। 'दो साल में 535 किसानों की गई जान।' कैंसर और आत्महत्या से कितने किसान मर चुके हैं-कौन स्वीकारेगा!

हजारों साल से खेती हो रही है, इस देश में। आज तक न जमीन मरी, न ही किसान मरा। आज तेज गति से जमीन-जल-जीवन (किसान) मौत से जूझ रहे हैं-विकास के मकड़जाल में। सबसे वीभत्स दृश्य तो यह है कि अभी तक देशवासियों को शुद्ध जल पीने को उपलब्ध नहीं है।

जो जल पीने को दिया जा रहा है, उसका भी श्रेष्ठ उदाहरण इंदौर के भागीरथपुरा में देख चुके हैं, जहां दूषित पानी पीने से 33 लोग मर गए। जनप्रतिनिधि, 'दुःख के मारे' अभद्रता भरे जवाब दे रहे थे। जल जीवन मिशन, विकास का दूसरा उदाहरण है, जहां हर प्रदेश में जनप्रतिनिधि ही 'मर्शनरी' साबित हो गए।

खेतों में बी.टी. बीज, रासायनिक खाद और कीटनाशक सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ विकास की मशाल थामे हैं। वर्ष 1960 में देश में उर्वरक का उपयोग लगभग 10 लाख टन था। 2014-15 तक यह 256 लाख टन तक पहुंच गया। 2023-24 में यह 601 लाख मीट्रिक टन के आसपास जा पहुंचा। कीटनाशक का उपयोग 1960 के दशक से सौ गुना बढ़ा। वर्ष 2020 में ही 61,702 टन कीटनाशक इस्तेमाल हुए।

भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता और तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। यह उपलब्धि नहीं, चेतावनी है। ये जो आंकड़े किसानों के मरने के बढ़ रहे हैं, वे तो अन्न पैदा करने वाले थे, खाने वाले नहीं थे। इनके लिए पांच करोड़ रुपए की सहायता दी गई। खाने वाले तो ट्रेनों में भर-भरकर कैंसर का इलाज ढूंढ रहे हैं। घर बिक रहे हैं, जीवन नारकीय हो रहा है। लोग मर रहे हैं। आय से अधिक खर्च हो रहा है।

आजादी के समय कैंसर के मामले नगण्य थे। अब हर साल 14 से 15 लाख नए मरीज सामने आ रहे हैं। देश में लगभग 25 लाख लोग कैंसर से जूझ रहे हैं। हर साल करीब साढ़े पांच लाख मौतें हो रही हैं। भारत में दुनिया के एक तिहाई ओरल कैंसर के मामले हैं।

यह उपलब्धि नहीं, चेतावनी है

सिर्फ तंबाकू सेवन का परिणाम बताना अधूरा सच है। रसायनों का अपना जहर है। सब्जियों व दूध तक में है। वही जहर आमजन की थाली तक पहुंच रहा है। कृष्ण कह गए कि अंत समय जो मेरा ध्यान करेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा। विकास की मार खाने वालों से कोई पूछे कि उनको कौन सा 'कमबख्त' याद आता है-अन्त समय में? कीटनाशक कृषि अधिकारी-बीमा एजेंट?

वैसे तो इनका जीवन भी अधमरा ही होता है। जैसा खावे अन्न-वैसा होवे मन। भ्रष्टाचार का अन्न सात पीढ़ियों को उजाड़ता है या तो पीछे खाने वाले ही नहीं रहते या फिर आसुरी वातावरण बन जाएगा। सोने की लंका तो रावण ही बना सकता है। अंत में उसे भी जल जाना पड़ता है।

राजस्थान अपराधों में देश के महानगरों से भी आगे है। यहां हर क्षेत्र एक माफिया की गिरफ्त में है। कार्यपालिका-विधायिका की भागीदारी ने हमारे अन्न को सड़ाने की कसम खा रखी है। प्रत्येक वर्ष में लगभग पचास हजार टन अनाज सड़ता है। सड़ा हुआ अनाज कई क्षेत्रों में जबरन बेचा जाता है।

कोई जीवित बच कैसे जाए! दूध में विष के अलावा क्या रह गया? विषाक्त दूध, नकली सिन्थेटिक दूध, पाउडर का दूध, बीमार मवेशियों का दूध। प्रातः यही प्रसाद सरकारी देवता के घरों में भी चढ़ाया जाता है (जहां मुफ्त बंटता है)। पहले बीमार होने का अधिकार उन्हीं का है।

जिस प्रकार स्वास्थ्य के नाम पर अस्पताल लूट रहे हैं, मिलावट ने विकास के सपने तार-तार कर रखे हैं, भू-माफिया/सरकार मिलकर जनता को हरा रहे हैं, माई लॉर्ड सालभर में गंभीर मुद्दों पर भी प्रसंज्ञान नहीं ले रहे, सरकार का भय नहीं रहा; ऐसे में प्रदेश में बचेगा ही क्या? ट्रैफिक वाले सुरक्षा की चिंता कम करते हैं। वे उगाही पर केन्द्रित हो गए। अतिक्रमण-पार्किंग-बेरिकेडिंग, सब मनमानी होती है। जनता सुखी हो-दुःखी हो उनकी बला से। जबकि हर गली का माफिया उनकी नजर में होता है।

विकास ने लोकतंत्र को जनहित के विरुद्ध खड़ा कर दिया। सब कुछ धर्मनिरपेक्ष हो गया। दूसरों का अहित करके अपना पेट भरना ही विकास का मार्ग बन गया। विकास का यमदूत एक-एक करके सबको मारेगा। पहले किसान।