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शरीर ही ब्रह्माण्ड : माया भीतर द्रष्टा, बाहर विश्व

जीवन की सारी क्रिया-प्रतिक्रियाओं का केन्द्र सूक्ष्म शरीर- सूक्ष्म मन (महन्मन) होता है। महामाया रूप में प्रकृति- महालक्ष्मी- महासरस्वती- महाकाली- हृदय में प्रतिष्ठित रहकर जीवन का निमित्त कारण बनती हैं।

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Apr 25, 2026
फोटो: पत्रिका

ब्रह्म और माया दोनों निष्कर्म तत्त्व हैं। कर्म भार सारा परा-अपरा प्रकृति के पास रहता है। माया और ब्रह्म साथ रहते हैं। ब्रह्म माया से सदा आवरित रहता है। माया ही आकृति रूप-प्रकृतिदत्त- दिखाई पड़ती है। प्रकृति ही विश्व का निर्माण करती है। विश्व बाहर का संसार है। माया भीतर द्रष्टा है। विश्व भीतर से बाहर आता है। बाहर भी पहले सूक्ष्म स्तर पर अदृश्य आता है। प्राण रूप में आता है। तब स्थूल भाव ग्रहण करता है। ब्रह्म विवर्त की यह यात्रा कर्म और कर्मफल के आधार पर आगे बढ़ती है। यही संसार की इतनी विभिन्नताओं का आधार है। आयु एक बड़ा साधन बन पाता है, भिन्नता का। अल्पायु और दीर्घायु के कारण ही इतनी प्रकार की योनियां एक साथ दिखाई पड़ सकती हैं। जल-थल-नभ के प्राणी अपना विशिष्ट आकर्षण भी लिए रहते हैं। यह सारा खेल है बाहरी विश्व का। परा-अपरा प्रकृति का है।


गीता में बाहरी विश्व, इन्द्रियां और इनके विषय, इच्छा-आसक्ति-सुख-दु:ख के भाव और यहां तक कि धृति और चेतना को भी कर्म का क्षेत्र माना है। अर्थात् ब्रह्म और माया के सिवाय सब कुछ क्षेत्र है। ब्रह्म आत्मा रूप में क्षेत्रज्ञ रूप में कार्य करता है। क्षेत्रज्ञ कालातीत है, कर्म सारा काल सापेक्ष है। सम्पूर्ण जगत माया के गर्भ में होने से वह सम्पूर्ण जगत् पर दृष्टिपात कर सकती है। प्राणियों के तीनों काल उसके समक्ष होते हैं। उसी के लिए कहा है—
सर्वत: पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वत: श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।। (गीता 13.13)

माया के द्वारा ब्रह्म ही संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। ब्रह्म की कामना ही माया है। कामना को मन का बीज कहा है। इसी से प्राणों में हलचल होती है और सृष्टि होती है। यह भी सच है कि कामना में क्रिया नहीं होती। क्रिया के लिए प्राणों की गति चाहिए।

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कामना मन के अनुरूप दोनों ओर चलती है प्राणों के माध्यम से। मन एक ओर विद्या से, दूसरी ओर अविद्या से ऊध्र्व गति और अध: गति करता है। कामना की अमृत अवस्था भावना है और मत्र्य अवस्था वासना कही गयी है। भावना को महामाया का साहचर्य प्राप्त होता है, वासना को योगमाया का। भावना प्राकृतिक स्वरूप में कार्य करती है। इसमें दिव्यता रहती है। वासना अविद्या का आसुरी क्षेत्र है। सभी प्रकार के अनैतिक प्रयास अविद्या के कारण- पशुभाव में- किए जाते हैं। अनेक समाजों में ऐसी स्थायी परम्पराएं भी होती हैं। इसी कारण माया अपनी विभिन्न योनियों का सृजन करती जाती है। माया की उत्पत्ति ब्रह्म के विवर्त के लिए ही हुई है। अत: माया को इन सभी भूमिकाओं में देखा जा सकता है। पुरुष ब्रह्मांश है। माया मृत्युपर्यन्त साथ रहती है। स्त्री ही पुरुष का विवर्त बनाती है। प्रकृति में ब्रह्म और माया के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। सभी योनियों के शरीर माया है, जीवात्मा पिता है।


जीवन के दो भाग हैं—एक भीतर, एक बाहर। ब्रह्म भीतर केन्द्र में प्रतिष्ठित रहता है। पुरुष शरीर में रहता है। उसे समझने के लिए भीतर जाना पड़ता है। वहां भी माया का आवरण (शरीर रूपी) रहता है। उसी ब्रह्म को बाहर लाने और विश्व रूप में बदलने का कार्य भी माया का ही है। प्रत्येक प्राणी भीतर जा भी नहीं सकता। किन्तु जीवन-चक्र के अन्त में उसे भीतर के ब्रह्म में लीन भी हो जाना है। इसी के लिए अव्यक्त ब्रह्म को व्यक्त रूप में लाकर पुन: अव्यक्त भाव में प्रतिष्ठा देना माया का कार्य है।


चूंकि जीवन के तीन स्तर हैं—स्थूल, सूक्ष्म और कारण, माया के भी तीन ही स्वरूप है। पुरुष (आत्मा) और प्रकृति (स्त्री) स्थूल रूप में विश्व का निर्माण करते हैं। पुरुष अग्नि और स्त्री सौम्या है। अग्नि में सोम की आहुति ही यज्ञ कहलाती है। 'यज्ञ: कर्मसमुद्भव’ (गीता 3.14)। स्त्री ही पुरुष में आहुत होती है, स्त्री ही माया रूप में पुरुष को आवृत्त भी रखती है। पुरुष का स्वरूप नहीं बदलता, बीज रूप वह सदा एक ही है—
गतिर्भर्ता प्रभु: साक्षी निवास: शरणं सुहृत्।
प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।। (गीता 9.18)
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या:।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता।। (गीता 14.4)

अर्थात् योनि कोई भी हो, बीज वही है। योनि बदलती रहती है। वैसे तो यह भी दृष्टि भेद ही है। योनि का अर्थ आकृति भेद ही है। सभी तो एक ही माया द्वारा, पंचमहाभूतों से ही निर्मित हैं। भिन्न है नहीं। कैसे?


ब्रह्म निष्क्रिय है, निराकार है। केवल कामना करता है। कब? जब आकार ले लेता है। आकृति का केन्द्र ही मन कहलाता है। इसी मन में कामना पैदा होती है। कामना की दिशा का आधार मन होता है- अन्न होता है। अन्न भी सत्व-रज-तम तीन प्रकार होता है- मन की दिशा भी बदल जाती है। तीनों गुण प्रकृति-माया के ही है।

कामना और मन साथ-साथ पैदा होते हैं और कामना पूर्ति के साथ दोनों ही सिमट जाते हैं। स्त्री रूप में माया ही कामना भी है। चूंकि हमारे तीन शरीर होते हैं, तीन ही मन होते हैं, तीन ही प्रकार की कामनाएं भी होती हैं। स्त्री-पुरुष दोनों में कामना का समान रूप से व्यवहार होता है। पुरुष मन में कामना क्षुधा रूप प्रकट होती है।


स्त्री कामना में भेद है। वह भी स्वयं माया ही है और ब्रह्म के मन में कामना बनकर ही रहती है। किन्तु उसकी कामना में शरीर गौण रहता है। पत्नी रूप में वह विवर्त के लिए सूक्ष्म मन से याचक बनकर आती है। उसे अपने जीवन का लक्ष्य मालूम है।
अग्निर्जागार तमृच: कामयन्ते अग्निर्जागर तमु सामानि यन्ति।
अग्निर्जागार तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योका:।। (ऋग्वेद 5.44.15)

अग्नि की जीवनरेखा-अन्न-सोम है। अन्न के अभाव में अग्नि का जीवन संभव नहीं है। सोम ऋत है, निराकार है। उसे स्वरूप के लिए सत्य चाहिए। दोनों मिलकर ही पूर्ण होते हैं। यज्ञ होता है- निर्माण होता है। यह सूक्ष्म आत्मा का स्तर है। जीवात्मा सूक्ष्म शरीर में रहता है। अत: मात्र स्थूल शरीर का आकर्षण वासना रूप है। यहां की कामना सीधे कारण शरीर की सीमा तक नहीं पहुंच सकती। वह माया का- निष्काम भाव का- क्षेत्र है।


विश्व में प्रत्येक स्त्री स्थूल रूप में कामना का निमित्त है। अभ्यास-संग दोष से यही कामना सूक्ष्म को छूती है। यहां प्रारब्ध-पूर्व कर्म- भी कार्य करते हैं। अनेक जन्मों के अनेक सम्बन्ध संकल्पहीन मन को प्रवाह पतित कर देते हैं। शायद इसी संकल्प का नाम विवाह है। इस कारण स्थूल कामना से पार पाने का साहस पैदा हो जाता है। कामना सूक्ष्म रूप में- परा प्रकृति के क्षेत्र में आत्मरूप में स्थायी भाव ग्रहण करती है।


जीवन की सारी क्रिया-प्रतिक्रियाओं का केन्द्र सूक्ष्म शरीर- सूक्ष्म मन (महन्मन) होता है। महामाया रूप में प्रकृति- महालक्ष्मी- महासरस्वती- महाकाली- हृदय में प्रतिष्ठित रहकर जीवन का निमित्त कारण बनती हैं। कारण के गुण ही कार्य रूप (स्थूल) शरीर में प्रकट होते हैं। सूक्ष्म शरीर चूंकि कारण शरीर से युक्त रहता है, अत: सारे कर्म अव्यय मन से अंकित होते जाते हैं। इसी को साक्षी ईश्वर आत्मा कहा है।


कुम्हार एक है, माटी एक है, भीतर जीवात्मा एक है, तो विश्व में भेद क्या है? सभी योनियों का ब्रह्म भी एक ही है। सूर्य ही प्रत्येक योनि का आत्मा भी है। यही माया के द्वारा ही एक से दूसरे शरीर में स्थानान्तरित किया जाता है। वैसी ही आकृति बना देती है। बीज को माया पेड़ बना देती है। बीज पेड़ में प्रवाहित रहता है। फलपर्यन्त। फल में पुन: नया बीज तैयार हो जाता है। यही तो ब्रह्म का विवर्त है।

क्रमश: gulabkothari@epatrika.com

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