
वहां दूसरे के आत्मा का सहारा लेकर रहता है। वहीं रहकर प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। आत्मा का वह अंश श्रित कहलाता है। जिस सूत्र से वह दूसरे के आत्मा से बंधा रहता है, उसे श्रत-सूत्र कहते हैं। इसी सूत्र को श्रद्धा कहते हैं। सूर्य किरणों का एक पुंज सोम तत्त्व का निर्माण करता रहता है। इस किरण समूह को भी श्रद्धा-सोम-तत्त्व कहते हैं। श्रद्धा वै आप: अर्थात् जल का ही नाम आप है।
यह अम्भस-रूप आपोमयी श्रद्धा सूर्य से निकलकर चंद्रमा में एकत्र होती रहती है। चन्द्रमा मन का स्वामी है। श्रद्धा तत्त्व का संग्रहालय भी है। अत:, मन में श्रद्धा तत्त्व का भरपूर पोषण करने वाला भी है। वह 'श्रद्धा’ हृदयस्थ मन में प्रतिष्ठित होती हुई सर्वविध कामनाओं की जननी है। श्रद्धा के धरातल पर शरीर और बुद्धि के विषय गौण रहते हैं। इन्द्रियां बाहरी विषयों में लिप्त नहीं हो पातीं। बुद्धि के तर्क-वितर्क-कुतर्क कार्य नहीं कर सकते। इन्द्रियां मन के साथ सिमटकर आत्मा की ओर मुड़ जाती हैं। इस मन को साथ लेकर आत्मा ईश्वर की ओर उन्मुख हो जाता है।
श्रद्धा एक शब्द है जिसका अर्थ है एक ही सूत्रभाव। हम श्रद्धा को भक्ति का आधार मानते हैं। मन का श्रेष्ठतम-मधुरतम भाव है श्रद्धा। श्रद्धा तत्त्व भी है जिससे जगत् का निर्माता सोम राजा उत्पन्न होता है। श्रद्धा सृष्टि का मूल है- सौम्य तत्त्व है। चन्द्रमा के तीन मनोता—श्रद्धा-रेत-यश में श्रद्धा प्रमुख है। यही पितरों के लिए प्रतिष्ठित श्राद्ध परम्परा का आधार है। पितर भी तो सृष्टि के कारक तत्त्व हैं।
श्रद्धा एकात्म भाव- अद्वैत को द्वैत में पिरोने का धागा है। श्रुति कहती है कि श्रद्धा सत्य में रहती है। सत्य एक ही होता है। अनेक होते ही असत्य हो जाता है। श्रद्धा से एकात्म भाव परिलक्षित होता है। वैसे तो श्रद्धा भी भाववाचक शब्द है, किन्तु भावना-वासना भी श्रद्धा के अभाव मे पूर्ण प्रभावी नहीं हो सकती। श्रद्धा माया का प्रतिबिंब है। श्रद्धा ही माया है। माया ही श्रद्धारूप सोम तत्त्व से सारे संसार का संचालन करती रहती है। ब्रह्म की शक्ति है।
श्रद्धा ही पंचाग्नि द्वारा ब्रह्म को पृथ्वी तक सुसूक्ष्म से स्थूल रूप तक प्रकट करती है। वसु-रुद्र-आदित्य तीनों अग्नियों द्वारा नई-नई योनियों से गुजरती है। इसीलिए कहा जाता है कि कन्या को ये तीनों तत्त्व पहले भोगते हुए (सोम-गंधर्व-अग्नि) चौथे स्तर पर मनुष्य में आहुत करते हैं। यह मंत्र ऋग्वेद के विवाहसूक्त में वर्णित है जहां वर वधू से कहता है—हे कन्ये! तुम्हें सर्वप्रथम सोम ने प्राप्त किया। उसके बाद गंधर्व (सूर्य) ने प्राप्त किया। तुम्हारा तीसरा पति अग्नि था। और अब मनुष्य योनि में मैं तुम्हारा चौथा पति हूं—
सोम: प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तर:।
तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजा: ॥ (ऋग्वेद १०.८५.४०)
सृष्टि पूर्व भी आकाश में सोम तत्त्व तो था ही- ऋत सोम था। ब्रह्माग्नि में इसकी आहुति से ही अव्यक्त उत्पन्न होता है। कार्य कुछ भी हो, जब तक उसके साथ कर्ता के प्राण नहीं जुड़ते, परिणाम नहीं आता। प्राण का प्राण के साथ, अथवा प्राण का भूत के साथ सम्बन्ध अप् तत्त्व से ही संभव है। इसी अप् तत्त्व को श्रद्धा कहते हैं। परमेष्ठी का अप् तत्त्व ही भृगु-अंगिरा रूप बंटता है। भृगुमय आप: पितृ सृष्टि का मूल बनता है। अंगिरामय आप: देव (प्राण) सृष्टि की प्रतिष्ठा बनता है। स्नेहमयी श्रद्धानाड़ी का चन्द्रमा से तथा तेजोमयी श्रद्धा नाड़ी का सौर मण्डल से सम्बन्ध हो जाता है। तेजोमयी श्रद्धा नाड़ी का मनोगर्भित बुद्धि से, तथा स्नेहमयी श्रद्धा नाड़ी का बुद्धिगर्भित मन से सम्बन्ध रहता है। इस प्रकार सौर श्रद्धासूत्र देवयज्ञ की प्रतिष्ठा तथा चान्द्र श्रद्धासूत्र पितृ यज्ञ का प्रवर्तक है।
चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित पूर्वज ही प्रेत पितर कहलाते हैं। इन मृत-पितरों के लिए इनके वंशज द्वारा प्रदत्त पिण्ड रस इन्द्रियातीत श्रद्धा-सूत्र द्वारा पितरों की तृप्ति का कारण बनता है। इस प्रकार से तृप्त पितर श्रद्धा-सूत्र द्वारा (भूपिण्ड स्थित) वंशजों के शुक्र में स्थित पितर सन्तति में पितृ रस का आधान करते हैं। इससे वंशोच्छेद का अवसर नहीं आ पाता।
श्रद्धा का आगमन अन्न के द्वारा होता है। अन्न द्वारा आया हुआ आप्य श्रद्धा तत्त्व अन्नमय मन में प्रतिष्ठित होता है। मनोमयी श्रद्धा ही भूत के साथ प्राण बन्धन का कारण बनती है। कर्ता के मन की श्रद्धा ही देवताओं का आहुति भूत से सम्बन्ध कराती है। श्रद्धायुक्त आहुति बन्धन ही आध्यात्मिक स्वप्राण की प्रतिष्ठा करता है। कर्ता के हृद्य प्राण से सूर्य केन्द्रपर्यन्त श्रद्धासूत्र होता है। इसी आधार पर यजमान आहुति देता है। इसी आधार से प्राणाग्नि आहुति प्राण ले जाता है। इसी पर लोक देवता रहते हैं जो आहुति प्राण से तृप्त होते हैं और कर्म (यज्ञ) कर्ता पर अनुग्रह करते हैं। सम्पूर्ण भूतवर्ग श्रद्धामय हो जाता है—
श्रद्धयाग्नि: समिध्यते श्रद्धया हूयते हवि:।
श्रद्धां भगस्य मूर्धनि वचसा वेदयामसि ॥ (ऋग्वेद १०.१५१.१)
चान्द्ररस की तरलावस्था श्रद्धा है। चन्द्रमा का यही श्रद्धायुक्त आप: आदित्याग्नि से सोम रूप बन जाता है। पर्जन्याग्नि के योग से सोम ही वर्षा रूप लेता है। पार्थिव अग्नि में आहुत सोम औषधि रूप ले लेता है। पुरुषाग्नि में आहुत होकर शुक्र रूप में परिणत हो जाता है। योषाग्नि में आहुत होकर शुक्र ही पुरुष रूप में उत्पन्न होता है। चान्द्र श्रद्धा तत्त्व ही पांचवी आहुति में पुरुष रूप में आ जाता है।
शुक्र में प्रतिष्ठित चान्द्र श्रद्धा तत्त्व मन का आधार बनता है। अन्नमय प्रज्ञानमन श्रद्धा रसमय है। सत्व गुण युक्त (अन्न प्रभावित) श्रद्धा ही वास्तव में श्रद्धा है। श्रतो हीदं धानम्- सत्य तत्त्व है, श्रत् है। जिस सत्तारस (आत्म प्रतिष्ठात्मक) के आधार पर आत्मगत सत्यभाव अन्यत्र (पदार्थों में) समन्वित होता है, श्रत् को धारण करने वाला वह रससूत्र ही श्रद्धा है। श्रद्धा-सूत्र के प्रभाव से उस पुरुष का आत्मा श्रद्धेय के साथ युक्त हो जाता है। श्रद्धामय मन जिसके साथ जुड़ जाता है, तन्मय हो जाता है। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्ध: स एव स:- (गीता १७.३)। तब श्रद्धेय दोषमुक्त लगता है।
दूर स्थित सम्बन्धी के रोगग्रस्त होने पर यहां रहने वाले के हृदय पर आघात हो जाता है। यह अदृश्य श्रद्धासूत्र के कारण ही है। आहत हृदय मन पर, मन कायाग्नि पर, कायाग्नि श्वास पर, श्वास वायु पर आघात करता है। कम्पित श्रद्धा सूत्र एक लहर पैदा कर देता है। इसी को 'हिचकी' के नाम से जाना जाता है।
श्रद्धा सूत्र का उच्छेद यूं तो संभव नहीं है, किन्तु स्वयं के पुत्र का मानस क्षेत्र कुसंग, अन्नदोष, कालदोष आदि के कारण आवृत्त हो जाता है। उसका क्षेत्र पितृ-अनुगत श्रद्धा-सूत्र से वंचित हो जाता है। विजातीय अन्तराय (विघ्न) श्रद्धासूत्र को बाधित कर डालते हैं। यही श्रद्धोच्छेद (श्रद्धा का अन्त) है। तब व्यक्ति की किसी देव-पितर आदि पर श्रद्धा नहीं रहती।
स्थूल शरीर परित्याग करके अंगुष्ठमात्र सूक्ष्म शरीर धारण कर भोक्तात्मा कर्मफल भोगने से पहले एक बार चान्द्र १३ माह में चन्द्रलोक पहुंचता है। साथ ही आकृति-प्रकृति-अहंकृति का अधिष्ठाता महानात्मा भी अपने जन्म स्थल चन्द्रमा के ऊर्ध्व भाग में (उसी चान्द्र संवत्सर में) प्रतिष्ठित हो जाता है। वहीं से जीवात्मा कर्मफल भोग के लिए उत्तर या दक्षिण मार्ग पर चला जाता है। श्रद्धा के अभाव में कोई कर्म पूर्ण फल नहीं दे सकता। यहां तक कि हमारे संकल्प में भी यदि श्रद्धा नहीं है तो संकल्प निरर्थक जाएगा। श्रद्धा ही ब्रह्म का आश्रय है। श्रद्धा ही नीयत है।
क्रमश: gulabkothari@epatrika.com