प्रकृति की प्रबन्धन शक्ति विस्मयकारी है और त्रिकालदर्शी भी। सभी प्राणी अद्र्धनारीश्वर रूप में तीन-तीन स्तरों पर कार्य करते हैं। अव्यय, अक्षर और क्षर पुरुष रूप में तथा माया, परा और अपरा प्रकृति रूप में कार्य करती है।
प्रकृति की प्रबन्धन शक्ति विस्मयकारी है और त्रिकालदर्शी भी। सभी प्राणी अद्र्धनारीश्वर रूप में तीन-तीन स्तरों पर कार्य करते हैं। अव्यय, अक्षर और क्षर पुरुष रूप में तथा माया, परा और अपरा प्रकृति रूप में कार्य करती है। अहंकृति के अनुरूप ही आकृति और प्रकृति होती है। तीनों के धरातल भिन्न-भिन्न होते हैं। इनके कार्य स्वतंत्र भी होते हैं, मिश्रित भी। वैसे कर्ता भाव अव्यय और अक्षर में होता नहीं है, किन्तु सूक्ष्म स्तर की गतिविधियां ही स्थूल कर्मों की निमित्त बनती हैं। यह भी स्पष्ट है कि कर्म में ब्रह्म और माया साथ नजर आते हैं। अक्षर पुरुष के स्तर पर परा प्रकृति गतिमान रहती है। शरीर के स्थूल स्तर पर अष्टधा प्रकृति-शरीर-मन-बुद्धि-अहंकार ही स्थूल कर्मों के उपकरण बनते हैं।
उपकरण निर्जीव अथवा सुप्त चेतना वाले होते हैं। जैसे पृथ्वी लक्ष्मी तो है किन्तु जो कुछ इसमें पैदा होता है (धरती को माता कहते हैं), सभी तो सुप्त चैतन्य पदार्थ हैं—चाहे अन्न हो, सम्पदा हो (स्वर्णादि, खनिज)। अन्न से शरीर बनता है। माता के शरीर से सन्तान का शरीर बनता है। शरीर स्वत: कार्य नहीं कर सकता। यह मन की इच्छा और प्राणों की गति से चलायमान नजर आता है। जैसे कार को ड्राइवर चलाता है।
शरीर आकृति का नाम है। इसको अहंकृति और प्रकृति चलाते हैं। अहंकृति सूर्य से तथा प्रकृति चन्द्रमा से निष्पन्न होती है। दोनों ही चैतन्य से संचालित रहते हैं। सूर्य तो जगत का आत्मा ही है। चन्द्रमा का पति रूप है। चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है। अहंकृति-प्रकृति दोनों ही सूक्ष्म भाव में कार्य करते हैं। आकृति में स्वतंत्र चिन्तन नहीं है। भूगोल आकृति को प्रभावित करता है। स्थानीय अन्न से ही शरीर का निर्माण होता है। अत: शरीर अन्न की सन्तान ही है।
जहां तक शरीर का सम्बन्ध है, वहां तक मानव अचेतन-जड़ भूतों की श्रेणी में आता है। जहां तक मन का सम्बन्ध है, वहां तक मानव चेतन-सेन्द्रिय-मन सहित सामान्य पशु आदि की श्रेणी में आता है। जहां तक बुद्धि का सम्बन्ध है, वहां तक चेतन-मन-बुद्धि युक्त विशेष पशु आदि की श्रेणी में आता है। आत्मस्वरूप की पूर्ण अभिव्यक्ति वाला मानव ही पूर्णता का अधिकारी है—
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँ स्वाम् ॥ (कठो. 1.2.22)
मानव के आत्म स्वरूप से सम्बन्ध रखने वाले बौद्धिक-मानसिक-शारीरिक भाव जब जहां जैसी आवश्यकता हो वैसे परिवर्तनशील बने रहते हैं। इन तीनों आचरणों का- आत्मा से जुड़ा स्वरूप ही मानवता है। इन्हीं के लिए पुरुषार्थों की व्यवस्था की है। शरीर से अर्थ का, मन से काम का, बुद्धि से धर्म का तथा मोक्ष से आत्मा का सम्बन्ध है। आज के युग में- 'अर्थ खा गया धर्म को, काम खा गया मोक्ष को।‘
सूक्ष्म शरीर का केन्द्र हृदय होता है। तीन अक्षर प्राणों से निर्मित हृदय—ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र प्राण- सभी प्राणियों में समान रूप से कार्य करता है। अव्यय (कारण शरीर) में संचित कर्म रहते हैं, सूक्ष्म शरीर प्रारब्ध कर्म पर कार्य संचालन करता है। सूक्ष्म शरीर एक ओर कारण से तथा दूसरी ओर स्थूल से जुड़ा रहता है। श्रुति कहती है—
न सती सा नासती सा नोभयात्मा विरोधत:।
काचिद्विलक्षणा माया वस्तुभूता सनातनी।
पुरुष के हृदय में प्रतिष्ठित रसबलात्मक तत्त्व 'मन’ कहलाया—ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। मनोमय पुरुष के अर्क रूप रश्मि भाव ही 'काम’ कहलाते हैं। ये ही 'एकोहं बहुस्याम्’ रूप में सृष्टि बीज बने। कामना मन का रेत है। इसी कारण पुरुष 'कामरेत’ है। रस-बल ही कामना का वास्तविक रूप हैं। रस और बल दोनों ही केन्द्र में हैं, दोनों ही परिधि में हैं। ये दो तत्त्व ही हृदय के स्वरूप का निर्माण करते हैं। इसी में तीनों अक्षर प्राणों के अलावा दो अन्य कलाएं भी होती हैं—अग्नि और सोम। सम्पूर्ण पदार्थ अग्नि-सोम के तारतम्य से ही उत्पन्न होते हैं। स्पर्शरूप सोम से तथा उष्मारूप अग्नि से ही वर्ण और अक्षरों का भी उद्भव होता है।
सूर्य-चन्द्रमा का दाम्पत्य भाव ही सृष्टि का उपादान कारण है। आधे आकाश में सूर्य-दिन के स्वामी हैं। आधे आकाश में चन्द्रमा रात के स्वामी हैं। इनको ही मनु-श्रद्धा कहा जाता है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं- जैसे विधि और निषेध। दोनों से आध्यात्मिक संवत्सर यज्ञ पूर्ण होता है। अक्षर द्वारा क्षर का विस्तार ही (जानना) विज्ञान कहलाता है।
पृथ्वी, सूर्य की परिक्रमा क्रान्तिवृत्त पर करती है। यही संवत्सर कहलाता है। इसमें सूर्य विष्वद्वृत्त वृत्त के दोनों ओर 24 अंश तक उपलब्ध रहता है। जिस ओर दिन रहता (सूर्य) है उस आधे सौर आकाश से पुरुष का तथा दूसरे चन्द्र शासित (रात्रि) आधे सौम्याकाश से स्त्री के स्वरूप का विकास होता है। इसी दाम्पत्य भाव से सृष्टि होती है। पुरुषो वै यज्ञ: कहा है।
अध्यात्म संस्था में संवत्सर का विष्वद् वृत्त ही मेरुदण्ड बनता है। पति-पत्नी जब आमने-सामने खड़े होते हैं तो, तब रीढ़ की हड्डी पूर्ण वृत्त बना देती है। दोनों की 24-24 पसलियां ही क्रान्तिवृत्त का 48 अंश का स्वरूप बनाते हैं। संवत्सर यज्ञ से प्रजा पैदा होती है। इस यज्ञ को इष्ट कामधुक् कहते हैं। गीता में कृष्ण कह रहे हैं कि प्रजापति ने प्रजाओं को कहा कि तुम लोग यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो और यज्ञ तुम्हें इच्छित भोग देने वाला हो—
सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्।। (3.10)
सूक्ष्म शरीर ही जीवन की गतिविधियों का मूल स्थान है। हृदय ही कामना का, ब्रह्म का, देव प्राणों का स्थान है। मन ही मूल अव्यय मन के आश्रय में सृष्टि की ओर अथवा मुक्ति की ओर अग्रसर होता है। इसी में ईश्वर इच्छा एवं जीव की इच्छा पैदा होती है। दाम्पत्य भाव का केन्द्र सूक्ष्म शरीर ही है। स्थूल शरीर उपकरण रूप साधन होता है। पुरुष जीव के साथ पित्रांश भी रहता है। स्त्री का पित्रांश भी इसी के साथ रहता है। इसी से स्त्री का सम्बन्ध सात जन्मों का हो जाता है।
दाम्पत्य भाव चूंकि आत्मा का क्षेत्र है, अत: शरीर-मन-बुद्धि उसके उपकरण रूप अपरा प्रकृति के ही भाग रहते हैं। उनका आदान-प्रदान तो आत्मा से ही होता है। ये माया का भी क्षेत्र है। दाम्पत्य भाव जब सृष्टि साक्षी रहता है, तब शरीर, मन और बुद्धि से सम्बद्ध रहता है। क्षरण की दिशा में अग्रसर होता है। आत्म तत्त्व से रहित कर्म पशु के समान ही माना जाएगा। आत्मभाव से युक्त मानव अतिक्रमण नहीं करता। बुद्धि आग्नेयी है, मन सौम्य है। आग्नेयता पौरुष भाव तथा सौम्यता स्त्रैण भाव है। सोममयी श्रद्धा शक्तितत्त्व है। अग्निमय रुद्र-शिवतत्त्व है। जब दोनों अलग रहते हैं, तब दोनों ही अतिक्रमण करते हैं। अत: शक्ति व शक्तिमान का साहचर्य ही सृष्टि में कल्याणकारी माना गया है। 'सहधर्मं चरताम्’ ही दाम्पत्य का आदर्श स्वरूप है।
दाम्पत्य भाव अक्षर सृष्टि में ही निष्पन्न होता है। इसके स्थूल कर्म शरीर में दिखाई पड़ते हैं। लेकिन प्रजा वृद्धि का मूल तो ब्रह्म है जो अव्यय में प्रतिष्ठित रहता है। यज्ञ के मध्य माया ही ब्रह्म को अक्षर से युक्त करती है। इसके अभाव में सृष्टि नहीं होती है। दम्पति इस ब्रह्म के लिए आश्रय (शरीर) का निर्माण करते हैं।
क्रमश: gulabkothari@epatrika.com