प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सामूहिक प्रयास करने की अपील की है। पश्चिम एशिया में तनाव के चलते बढ़ रहे ऊर्जा संकट से निपटने के लिए उन्होंने यह आह्वान किया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सामूहिक प्रयास करने की अपील की है। पश्चिम एशिया में तनाव के चलते बढ़ रहे ऊर्जा संकट से निपटने के लिए उन्होंने यह आह्वान किया है। उन्होंने देशवासियों से कहा है कि वे एक साल तक सोने की खरीद में संयम बरतें, आवागमन के लिए सार्वजनिक परिवहन सेवा और कारपूलिंग जैसे उपाय अपनाएं, विदेश यात्राओं से बचें, कार्यस्थल पर जाने की बजाय वर्क फ्रॉम होम व ऑनलाइन मीटिंग करें। उन्होंने मेड इन इंडिया उत्पाद खरीदने और आयातित उर्वरकों का उपयोग कम करने की भी अपील की है।
यह सही है कि राष्ट्र पर आने वाले किसी भी संभावित संकट का मुकाबला सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। संकल्प और सहभागिता के माध्यम से ही ऐसे संकटों से निपटा जा सकता है। संकल्प कोई भी हो, उसे अनुष्ठान में बदलने का काम तभी हो सकता है जबकि इसकी शुरुआत ऊपर से हो। राजनीति हो, प्रशासनिक तंत्र हो या फिर न्यायपालिका। इनके शीर्ष और वरिष्ठ लोग इसकी शुरुआत करेंगे तो निश्चित तौर पर समूचा देश उसका अनुसरण करेगा। आज स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है।
मध्यप्रदेश में कल का ही उदाहरण है। वहां पाठ्यपुस्तक मंडल के अध्यक्ष लगभग 700 वाहनों का काफिला लेकर निकले। क्या वे प्रधानमंत्री की भावना का अपमान नहीं कर रहे! यह एक ही अधिकारी या नेता की बात नहीं है। वीआइपी संस्कृति इतनी फल-फूल रही है कि लम्बा-चौड़ा काफिला लेकर चले बिना शीर्ष पर बैठे लोगों के अहंकार की तुष्टि ही नहीं होती। इन काफिलों के वाहनों पर कितने ईंधन की बर्बादी होती होगी, किसी ने हिसाब लगाया है? इन काफिलों के लिए आधे-पौने घंटे तक यातायात रोक दिया जाता है।
चौराहों पर चारों तरफ सैकड़ों वाहन थम जाते हैं। उनमें कितना ईंधन जलता होगा? झूठी शान के दिखावे के लिए आम जनता के जरूरी कार्य रुक जाते हैं। क्या उसकी किसी को चिंता है? देश में कुछ अतिशीर्ष स्तर के पद ऐसे हो सकते हैं, जिनको सुरक्षा व समय की बचत की दृष्टि से सुरक्षा वाहनों के साथ जाना जरूरी हो। लेकिन आज तो विधायक भी चार गाड़ियों के साथ नहीं चले तो उसकी विधायकी की शान पूरी नहीं होती।
प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक परिवहन अपनाने के लिए आह्वान तो किया है, लेकिन क्या हमारे परिवहन मंत्रियों और सचिवों ने सार्वजनिक परिवहन तंत्र को सुधारने की कोई नीति बनाई है! क्या खटारा सिटी बसों और पुराने टेम्पुओं के भरोसे प्रतिदिन ऐसी यात्रा की जा सकती है? क्या हमारे मंत्री या आइ.ए.एस. अफसर ऐसे वाहनों में दफ्तर जा सकते हैं?
कारपूलिंग की सबसे बेहतरीन व्यवस्था तो मंत्रालयों और सचिवालयों में की जा सकती है। सबका गंतव्य समान होता है। क्या हमारे मंत्री और अफसर इसकी पहल करेंगे। कोई बताए कि आम लोग कैसे कारपूलिंग करें? क्या हमने ऐसा कोई ऐप बनाया है, जो हर छोटे-बड़े शहर में उपलब्ध हो। आम लोग क्यों नहीं कारपूलिंग करना चाहेंगे। उनका पैसा भी बचेगा और ऊर्जा भी। जहां तक विदेश यात्राओं की बात है सर्वाधिक विदेश यात्रा मंत्री और अफसर ही करते होंगे। सोना खरीद में भी वे ही लोग आगे हैं, जिनके पास भ्रष्टाचार की कमाई का दो नंबर का पैसा ज्यादा है। आम व्यक्ति कितना सोना खरीद पाता है?
प्रधानमंत्री ने खाद आयात कम करने की भी अपील की है। पर प्रश्न यह है कि हमारे किसानों के समक्ष विकल्प क्या है? क्या हमने जैविक खाद के उपयोग को प्रोत्साहन देने का उस स्तर पर प्रयास किया है, जितना रासायनिक खाद के लिए करते हैं। रासायनिक उर्वरक बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लॉबी इतनी मजबूत है कि बेचारे मंत्री और अफसर उनके 'दबाव' में आ जाते हैं। आज किसी भी नहरी क्षेत्र में चले जाएं, रासायनिक खाद के अनाप-शनाप उपयोग ने जमीनों की उर्वरा शक्ति समाप्त कर दी। कैंसर जैसे जानलेवा रोगों का सर्वाधिक प्रसार ऐसे ही क्षेत्रों में हैं। फिर भी हम उसका उपयोग कम कर जैविक खाद का उपयोग बढ़ाने का कारगर कार्यक्रम नहीं बनाते। बहुराष्ट्रीय कंपनियां नाराज हो जाएंगी तो!
ऐसा कौन नागरिक है जो प्रधानमंत्री के आह्वान से सहमत नहीं होगा। हर कोई ऐसे आसन्न संकट का एकजुट होकर मुकाबला करना चाहता है। पर कुछ ध्यान शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के तौर-तरीकों पर भी देना होगा। बड़े पद का मतलब बड़ी जिम्मेदारी होती है। सबसे बड़ी जिम्मेदारी स्वयं पहल कर के उदाहरण पेश करने की है। उन्हें प्रधानमंत्री के आह्वान की गंभीरता समझनी होगी। वे समझेंगे तो जनता तो समझ ही जाएगी।
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