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पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख: फर्जी डिग्रियां, असली नासूर -माननीय मुख्य न्यायाधीश, भारत

मान्यवर, आपका ध्यान मैं राजस्थान की ऐसी समस्या की ओर दिलाना चाहता हूं, जो साल-दर-साल प्रदेश के प्रतिभाशाली और चरित्रवान युवाओं के हौसले तोड़कर उन्हें घनघोर निराशा की अंधी खाई में धकेल रही है।

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Apr 02, 2026
फोटो: पत्रिका

मान्यवर, आपका ध्यान मैं राजस्थान की ऐसी समस्या की ओर दिलाना चाहता हूं, जो साल-दर-साल प्रदेश के प्रतिभाशाली और चरित्रवान युवाओं के हौसले तोड़कर उन्हें घनघोर निराशा की अंधी खाई में धकेल रही है। यह मामला राजस्थान में हर वर्ष जारी होने वाली हजारों फर्जी डिग्रियों, अंकतालिकाओं और शैक्षणिक प्रमाणपत्रों से संबंधित है। इस फर्जीवाड़े का एक अंतहीन सिलसिला चल रहा है। कुछ गिरफ्तारियां होती हैं। दिखाने की जांच भी होती है। लेकिन फर्जी डिग्रियां शून्य नहीं होती। उनके आधार पर नौकरियां हासिल करने वाले लोग सामान्य छात्रों की बेचारगी पर अट्टहास करते रहते हैं।

दो दिन पहले ही चित्तौड़गढ़ के मेवाड़ विश्वविद्यालय का मामला सामने आया है। विश्वविद्यालय के डीन को गिरफ्तार भी कर लिया गया है। लेकिन क्या गिरफ्तारी पर्याप्त है? चूरू की ओपी जेएस यूनिवर्सिटी का मामला भी कुछ दिन पूर्व प्रकाश में आया था। कुछ वर्ष पहले जोधपुर की जोधपुर नेशनल यूनिवर्सिटी का मामला तो बच्चे-बच्चे की जुबान पर है, जिसने हजारों फर्जी डिग्रियां जारी की थीं। जब इतने पुराने मामलों में आज तक फर्जी डिग्रियां शून्य घोषित नहीं की गई तो नए मामलों की जांच में तो शायद इतने वर्ष लग जाएंगे कि उनके आधार पर नौकरी पाने वाले अपराधी नौकरियों से रिटायर भी हो जाएंगे।

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मान्यवर, हमारी यह कैसी प्रशासनिक व्यवस्था और कैसी न्याय व्यवस्था है। संबंधित विभाग के मंत्री के कान पर तो जूं तक नहीं रेंगती। संबंधित सरकारी अधिकारी भी अपना-अपना कार्यकाल पूरा करके दूसरे पदों पर स्थानांतरित हो जाते हैं। युवा पीढ़ी के नाम पर दिखावा करने वाली किसी भी सरकार को कोई परवाह नहीं है कि युवाओं को कैसे इस मकड़जाल से छुटकारा दिलाया जाए? कैसे विश्वविद्यालयों, दलालों और अपराधी प्रवृत्ति के छात्रों का गठजोड़ तोड़ा जाए, जिन्होंने देश की उच्च शिक्षा को मजाक बना दिया।

न्यायपालिका भी ऐसे गंभीर विषय पर स्वः प्रेरणा से प्रसंज्ञान नहीं ले रही। ऐसे में आम छात्र इस अन्याय के खिलाफ किससे गुहार करे। जब शिक्षा जैसे 'पवित्र' स्थानों को भ्रष्टाचार की दीमक खोखली करने लगे तो अन्य विभागों का क्या हाल होगा? यह सही है कि यह फर्जीवाड़ा पिछली सरकार में भी था और इस सरकार में भी है। लेकिन क्या पिछली सरकार निष्क्रिय थी तो निष्क्रियता की भी नकल की जाएगी? मात्र कुछ गिरफ्तारियों से आंकड़ों में भले ही सफलता बता दी जाए, लेकिन 'सिस्टम' में तो दीमक ज्यों की त्यों है। असली कार्रवाई तो तब ही मानी जाएगी जब फर्जी डिग्रियों को वापस लिया जाए। उनके आधार पर नौकरी हासिल करने वालों से नौकरियों छीनी जाएं। दलालों और विश्वविद्यालयों के भ्रष्ट प्रबंधन के खिलाफ जांच त्वरित गति से पूरी कर सख्त सजा दी जाए। ऐसी करतूतों में लिप्त विश्वविद्यालयों पर ताला लगाया जाए।

आज तकनीकी का युग है। असल और फर्जी डिग्री में अंतर पता लगाने में इसका इस्तेमाल करना होगा। डिजिटल वेरिफिकेशन और अब ब्लॉक चेन पद्धति का उपयोग कर फर्जी डिग्रियों का नासूर जड़ से समाप्त किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए इच्छा शक्ति चाहिए। राजनीतिक नेतृत्व तो अलग बात है, हमारे 'बुद्धिमान' प्रशासनिक अधिकारी भी मौन रह कर तमाशा देखते रहें तो जनता किस की तरफ देखे। उम्मीद केवल न्यायपालिका से है।

bhuwan.jain@in.patrika.com

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