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पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख – जल्लादी फैसले

आजाद भारत में भी अंग्रेजों के जमाने के कानून लागू कर अफसरशाही मनमानी पर उतर रही हो तो मन में स्वत: ही सवाल उठता है क्या यही लोकतंत्र है?

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Sep 18, 2025
फोटो: पत्रिका

आजाद भारत में भी अंग्रेजों के जमाने के कानून लागू कर अफसरशाही मनमानी पर उतर रही हो तो मन में स्वत: ही सवाल उठता है क्या यही लोकतंत्र है? क्या वास्तव में हम लोकतांत्रिक सरकार में जी रहे हैं? क्या वास्तव में सरकार चल भी रही है? कानून और धाराएं क्या आम आदमी के लिए ही है? राजस्थान में जयपुर के समीप नींदड़ आवासीय योजना के लिए अवाप्त की गई जमीन को लेकर किसान पिछले पन्द्रह वर्ष से आंदोलनरत हैं। सरकारें अवाप्ति की पूरी प्रक्रिया डण्डे के जोर से लागू करने पर तुली हुई है। यही लगता है कि सरकार में बैठे लोगों का एक ही उद्देश्य रह गया है-किसानों को परेशान करो। कानून क्या कहता है इसकी परवाह कौन करे? सब मूकदर्शक बने बैठे हैं।

जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) की इस आवासीय योजना के लिए वर्ष 2010 में 1350 बीघा भूमि की अवाप्ति की अधिसूचना जारी हुई थी। तब से ही किसान व दूसरे प्रभावित लोग इसका विरोध कर रहे हैं। लोगों ने मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक गुहार की। सरकारें आईं और चली गईं पर किसी ने इनकी मांगों की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। समय-समय पर जेडीए के अफसर, पुलिस को लेकर वहां धमक जाते हैं और भूमि पर कब्जा करने का प्रयास करते हैं। इतने वर्षों में आंदोलन के दौरान किसानों की होली-दिवाली भी सत्याग्रह के रूप में ही बीती है। पिछले वर्ष 22 नवम्बर से तो किसान लगातार धरना दे रहे हैं। एक ही मुद्दे पर कोई आंदोलन इतना लम्बा खिंच रहा हो और अदालतें संज्ञान लें तो राहत मिलने का काम आसान ही होगा।

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किसानों का कहना है कि उनकी जमीन का अधिग्रहण अंग्रेजों केे जमाने के भूमि अवाप्ति अधिनियम -1894 के तहत किया गया है। वे वर्ष 2013 के अधिनियम में उल्लेखित लैंड पूलिंग स्कीम के तहत मुआवजा मांग रहे हैं। जेडीए ने अपने सर्वे में यहां सिर्फ 52 निर्माण ही बताए थे जबकि आज वहां चार हजार से ज्यादा निर्माण हैं। अवाप्ति भी वर्ष 1970 की जमाबंदी के आधार पर हुई जबकि किसान यह आधार २०१० का रखने की मांग कर रहे हैं।

आंदोलन के बीच ही वर्ष 2017 में जेडीए ने पुन:सर्वे कराया और डण्डे के बल पर जमीन पर कब्जा शुरू करने के साथ ही २०० फीट रोड का काम भी चालू करा दिया। भाजपा सरकार के समय 2017में किसानों ने खुद को जमीन में दबाते हुए जमीन सत्याग्रह शुरू किया तो दिखावे के लिए हुआ यह सर्वे आज तक सार्वजनिक नहीं हुआ। सरकार बदली तो वर्ष 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तक भी गुहार लगाई। साल भर बाद ही 2020 में जेडीए ने यहां फिर काम शुरू कराया तो किसानों का पुन: जमीन समाधि आंदोलन हुआ। बाद में जेडीए ने इस मामले को एम्पावर्ड कमेटी को भेज दिया था।

किसान लगातार आंदोलन कर रहे हैं। प्रभावितों के एक प्रतिनिधिमंडल ने जून, 2025 में जेडीए अधिकारियों के साथ बैठक की थी। उनकी कुल पन्द्रह मांगों में से पांच जेडीए स्तर की थी और 10 पर जेडीए ने राज्य सरकार से मार्गदर्शन चाहा है। अब आंदोलनरत किसान कहते हैं कि उनकी लड़ाई मुआवजे की नहीं बल्कि अपनी जमीन बचाने की है। लेकिन जेडीए का रवैया जस का तस है। पिछले दिनों ही मुख्यमंत्री आवास की तरफ कूच करते किसानों की पुलिस से झड़प हो गई। उनकी मांग अब आवासीय योजना को निरस्त करने की है।

राजस्थान की मूल आय कृषि और पशुपालन है। दोनों को ही विकास की नजर लग गई है। उधर सरकार भी उद्योगपतियों के आगे नतमस्तक दिखाई पड़ती है। सारी रिपोर्ट्स भी एक पक्षीय-सरकारी भाषा में जारी होती हैं। भोपाल किसान आन्दोलन के बाद से मैंने भी किसानों के सम्पर्क में रहकर नियमित जानकारी लेना शुरू किया। कृषि विभाग के अधिकारी भी उतना ही बोलते हैं जितना ऊपर वालों को सुहाता है। उनके ही शब्द दोहराते रहते हैं।

कृषि के नियम राज्य स्तर पर एक जैसे लागू नहीं किए जा सकते। हर तीस मील पर भूगोल बदल जाता है। स्थानीय भाषा तक बदल जाती है। शिक्षा में इस तथ्य का कोई महत्व ही नहीं है। कई कानून और नीतियां देशभर में लागू कर दी जाती हैं। भूगोल तो साधारण ज्ञान का मूल अंश होना चाहिए। आज तो अधिकांश शिक्षित स्थानीय भूगोल से भी अनभिज्ञ हैं। चिकित्सा, कृषि, पशुपालन, खाद्य नियम जैसे विषय तो अंग्रेजी शिक्षा-विदेशी नकल-के भरोसे चल रहे हैं।

इस देश की जलवायु ऋतुओं की भिन्नता और उपज को लेकर जानी जाती है। हमारे कृषक की पहचान ‘अन्न ब्रह्म’ पैदा करने वाले के रूप में पूजनीय रही है। कृषक भी हल-बैल की पूजा करता है। नया अन्न पहले ईश्वर को चढ़ाता है। इस विकास की शिक्षा ने ईश्वर को भी भुला दिया और आदमी को ‘मानव संसाधन’ बनाकर रख दिया। आत्मा को शिक्षा ने गहरी नींद सुला दिया।

पिछले वर्षों में बालोतरा के अधिकारी ने आदेश जारी कर दिया कि इस वर्ष तिलवाड़ा पशु मेला नहीं होगा। उसके लिए जानवर का विकास से क्या लेना-देना। पश्चिम राजस्थान का भूगोल पढ़ा होता तो समझता। आज भी पढ़ा लिखा व्यक्ति इस क्षेत्र को हरा-भरा और उन्नत देखना चाहता है। किसी की समझ में नहीं आता कि देश का सम्पूर्ण पशुधन-गाय-बैल-ऊंट-घोड़े-भेड़-बकरियां-सब तो यहीं पाले जाते हैं। क्षेत्र के विकास के साथ ही प्रदेश की आय का दूसरा बड़ा क्षेत्र सदा के लिए कंगाल हो जाएगा। देश में कहीं भी ऐसा क्षेत्र नहीं है।

ऐसा बार-बार इसलिए होता है कि हमारे अधिकारी विदेशी भाषा में विषय पढ़ते हैं जिसमें भारतीय पारम्परिक ज्ञान का समावेश ही नहीं रहता। भूगोल और सांस्कृतिक धरातल विपरीत हैं। उन्हें अपने ज्ञान के आगे सब कुछ तुच्छ लगता है। आदमी भी। क्या कोई डॉक्टर, आयुर्वेद की दवा लिखने को राजी होगा-असंभव! हमारे किसी बड़े अधिकारी की दृष्टि में भारतीय ज्ञान अंग्रेजी के आगे छोटा है। उनके हाथ में सत्ता है। वे अपनी तुष्टि के लिए गांवों को, खेतों को उजाड़ सकते हैं, विस्थापितों पर उनको दया नहीं आती। एक ओर ‘पेड़ लगाओ’ के नारे पर नेता के पीछे खड़े होते हैं, दूसरी ओर सड़कें बनाने के लिए पेड़ काटने की अनिवार्यता के आगे क्षेत्र के सभी पक्षियों की बलि चढ़ा देते हैं। संवेदना तो इनकी संस्कृति से बाहर हो गई। इन्हीं को विकास का प्रमाण कहा जा सकता है। निजी स्वार्थ के लिए धरती को बेचकर मौज करेंगे।

पिछले सारे रिकार्ड्स देख लें, सारे काम ठेकेदारी के प्राथमिकता से होते हैं। इनमें बिना कुछ किए ही बड़ा कमीशन मिल जाता है। योजना को आगे खिसकाकर लागत भी बढ़ाते जाते हैं। सड़कें और बांध-फ्लाईओवर तो सर्वाधिक बनाए जाते हैं। इन कामों में कितने गांव-घर-खेत उजड़ते हैं, वे सब इनके स्वार्थ के आगे छोटे पड़ जाते हैं। विकास के दलाल बनकर सत्ता पर बैठे ये नीतिकार आमजन से राय लेना, स्वीकृति लेना तो स्वयं का अपमान ही मानते हैं। यमराज के आगे किसी भी नहीं चलती।

नींदड़ के किसानों का आन्दोलन चलते लगभग एक वर्ष होने आया। अभी तक सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। यह लोकतंत्र है। इस मुद्दे का इतिहास पढ़ें तो लगता है कि अंग्रेजी हुकुमत आज भी जिन्दा है। डण्डे के आगे लोकतंत्र कुछ नहीं होता। गांधीजी के सत्याग्रह ने अंग्रेजों को भगा दिया था, किन्तु आज के इन अंग्रेजों के अत्याचार अपनी मनवाने के अलावा कुछ नहीं सुनना चाहते। डण्डा और जेल बस। सरकार हमारी, हमारा फैसला फाइनल, चाहे गलत ही हो। हम तो छीनना भी जानते हैं। जनता के नौकर हैं हम।

gulabkothari@epatrika.com

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