
Womens Day
कल्पना कीजिए, दफ्तर में आपका काम हर रोज बढ़ रहा है। जब भी आप कुछ कहने का सोचते हैं । आपको सुपरमैन का तमगा दे दिया जाता है। परिवार की जिम्मेदारियां हैं, सो अलग। आपका जिगरी दोस्त, आपका सहकर्मी और आपका बॉस, सबको यही लगता है कि आप कुछ भी कर सकते हैं और कितना भी कर सकते हैं। कहने का मतलब है कि सब अपना काम आप पर लाद देते हैं और यह अपेक्षा भी रखते हैं कि आप समय पर सबकुछ पूरा कर देंगे, वो भी बिना किसी गलती के, क्योंकि आप सुपरमैन जो ठहरे। क्या आप ऐसी लाइफ पसंद करेंगे? मतलब आप सुपरमैन कहलाएं, और काम के बोझ से लाद दिए जाएँ? जाहिर तौर पर नहीं, ऐसे सुपरमैन की तुलना में सामान्य आदमी बने रहना ही बेहतर है। तो फिर महिलाओं से ऐसी अपेक्षा क्यों?
आज की आधुनिक नारी को 'सुपरवुमेन' कहा जाता है। तस्वीरों में उन्हें 6 हाथों वाली स्त्री के रूप में दिखाया जाता है- जो एक हाथ से किचन संभालती है, दूसरे से दफ्तर, तीसरे से बच्चे को, चौथे से….क्रमश: क्रमश:। वह बच्चों की परवरिश भी करती है और समाज में भी अपनी भूमिका निभाती है। सुपरवुमेन - सुनने में एक सम्मान जैसा लगता है, लेकिन गहराई से देखने पर यह शब्द कई बार महिलाओं पर अत्यधिक अपेक्षाओं और जिम्मेदारियों का बोझ डाल देता है। अक्सर हम किसी महिला को सुपरवुमेन कहकर यह मान लेते हैं कि वह हर भूमिका को बिना थके और बिना शिकायत के निभा सकती है। उससे उम्मीद की जाती है कि वह घर और बाहर दोनों जगह परफेक्ट साबित हो, क्योंकि वह सुपरवुमेन है। ऐसे में अगर वह कोई चूक कर जाए या थक कर बैठ जाए, तो उसे ही दोषी ठहरा दिया जाता है।
किसी महिला की उपलब्धि का सम्मान करना, उसे पहचानना अच्छी बात है। सराहना के शब्द प्रेरणा देते हैं और आगे बढ़ने का हौसला भी। लेकिन महज इसलिए कि वह घर और बाहर की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं, या अपने पेशेवर करियर में किसी ऊंचे मुकाम पर पहुंच गई हैं, उन्हें सुपरवुमेन करार देकर अपेक्षाओं का अंबार लाद देना कहां तक जायज है? जब आप किसी के नाम के साथ कोई तमगा जोड़ देते हैं, तो वह अनगिनत इच्छाओं की पूर्ति के लिए विवश हो जाता है। यह विवशता उसे मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर करती रहती है। उसके चारों ओर एक ऐसा आभामंडल निर्मित हो जाता है कि वो थकने पर भी रुक नहीं सकता, उसे महज भागना होता है और यह दौड़ अंतहीन हो जाती है।
महिलाओं को सुपरवुमेन कहना अपने आप में गलत नहीं है। गलत है इस शब्द के नाम पर उनका दोहन - चाहे घर में या बाहर। तुम सब कर लोगी, सुपरवुमेन हो - ये शब्द कब तारीफ से विवशता में बदल जाते हैं पता ही नहीं चलता। शुरुआत में खुशी होती है कि कोई उनकी क्षमता को पहचान रहा है, उसके कार्यों को सराह रहा है, लेकिन समय के साथ-साथ यह खुशी बनावटी हो जाती है। वो इसलिए कि खुशी का अहसास न होने पर भी खुश दिखना होगा, क्योंकि सुपरवुमेन झुंझला नहीं सकती, खीज नहीं सकती, उसे हर काम, हर जिम्मेदारी को खुशी-खुशी निभाना है। किसी महिला को सुपरवुमेन बनाकर हम यह भूल जाते हैं कि वह भी आखिर इंसान है। उसे भी आराम, सहयोग और समझ की जरूरत है।
परिवार और समाज को यह स्वीकार करना चाहिए कि घर और काम की जिम्मेदारियां साझा होनी चाहिए। सुपरवुमेन कहकर हर काम का बोझ केवल महिलाओं के कंधों पर नहीं डाला जा सकता। महिलाओं को सम्मान देने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि उन्हें समान भागीदारी, बराबरी और सहयोग मिले, न कि ऐसे खिताब जो उन पर अदृश्य बोझ डाल दें।
इस लेख पर आप अपनी प्रतिक्रिया निम्न ईमेल पर भेज सकते हैं। Women's Day पर आपके मन की बात हम पत्रिका डॉट कॉम पर प्रकाशित करेंगे abhishek.mehrotra@in.patrika com
Updated on:
07 Mar 2026 07:31 pm
Published on:
07 Mar 2026 06:22 pm
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