ओपिनियन

चामलिंग का दर्द

सिक्किम के मुख्यमंत्री चामलिंग राजनेता कम और जननेता ज्यादा हैं। हमें ऐसे जननेता को दुखी और परेशान होने का कोई अवसर नहीं देना चाहिए।

2 min read
Aug 22, 2018
indian parliament

सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग का यह कथन कि, ‘डोकलाम की स्थिति से हमें डर लगता है’, न केवल सिक्किम के लोगों को बल्कि सभी भारतवासियों को डराने वाला है। जब २४ वर्षों से इस प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर आसीन चामलिंग यह कहते हैं कि डोकलाम के बारे उन्हें कोई कुछ नहीं बता रहा। न तो केन्द्र सरकार और न ही फौज। तब यह डर और बढ़ जाता है। यह संयोग ही है कि जब चामलिंग का यह बयान मीडिया में आया है, तभी चीन के रक्षामंत्री वेई फेंग चार दिन की यात्रा पर भारत पहुंच रहे हैं। उनसे अन्य बातों के अलावा भारत सरकार डोकलाम गतिरोध के समाधान पर भी बात करेगी। ऐेसे में क्या यह प्रश्न उठना स्वाभाविक नहीं है कि इस बातचीत में चामलिंग को भी वहां होना चाहिए? देश का संघीय ढांचा इस बात का समर्थन करता है। और यदि वे इस बातचीत में ना भी हों तो क्यों नहीं केन्द्र सरकार और देश की रक्षामंत्री, चामलिंग से डोकलाम की जमीनी हकीकत पर बात करें। आखिर सुरक्षा के ऐसे मामलों पर उन्हें भी जानने का हक है।

निश्चित रूप से मौके पर मौजूद भारतीय सेना और हमारी गुप्तचर एजेंसियां, सरकार को समय पर सूचनाएं दे रही होंगी लेकिन प्रश्न फिर भी यही है कि क्या इस बातचीत में वहां की जनता का मत, उसकी दुख-तकलीफें नहीं आनी चाहिए। जाने-अनजाने जम्मू-कश्मीर में हमसे जो गलती हुई उसकी सजा देश आज तक भोग रहा है। लाखों-करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद हम कश्मीर की जनता को पूरी तरह हमसे नहीं जोड़ पा रहे। ऐसे में तस्वीर का भयावह रूप ही सामने आ रहा है। सिक्किम की स्थिति बिलकुल विपरीत है। कश्मीर की तरह खूबसूरत इस प्रदेश की जनता तो ४३ साल पहले बाकायदा जनमत संग्रह के साथ भारत के २२वें राज्य की जनता बनी। लेकिन सिक्किम पर तो चीन की निगाहें तब भी थीं और आज भी हैं। ऐसे हालात में क्या हमें सावधान रहने की जरूरत नहीं है? तब क्या हमें वहां भी जनता और वहां की सरकार को भरोसे में रखने की जरूरत नहीं है?

ये भी पढ़ें

केरल में तबाही का सबब

कश्मीर के साथ करगिल का उदाहरण हमारे सामने है। पाकिस्तान ने उसमें काफी अन्दर तक घुसपैठ कर ली, तब उसकी जानकारी देश को किसी और ने नहीं, भारतीय चरवाहों ने ही दी थी। डोकलाम में चीन की ऐसी घुसपैठ का खुलासा भी कुछ इसी तरह हुआ है। चीन हो या पाकिस्तान, दोनों हमारे कितने भी गले लग जाएं, इतिहास बताता है कि वे कभी दिल से हमारे न हुए और न होंगे। वर्ष १९६२ का भारत-चीन युद्ध और पाकिस्तान से हुईं लड़ाईयां इसके उदाहरण हैं। अभी भी डोकलाम के कुछ हिस्सों में चीन बैठा ही है। ऐसे में यह जरूरी है कि केन्द्र सरकार शी जिनपिंग और वेई फेंग से चाहे जितना बात करे लेकिन चामलिंग और सिक्किम की जनता को उनसे पहले भरोसे में ले। जहां तक चामलिंग का सवाल है, वे राजनेता कम और जननेता ज्यादा हैं। हमें ऐसे जननेता को दुखी और परेशान होने का कोई अवसर नहीं देना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि ऐसे नेता की अनदेखी, देश की परेशानी बन जाए।

ये भी पढ़ें

इमरान का वक्त शुरू होता है अब!

Published on:
22 Aug 2018 04:15 pm
Also Read
View All