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इमरान का वक्त शुरू होता है अब!

इमरान के सियासी एजेंडे के चार बड़े मुद्दे द्ग भ्रष्टाचार निरोध, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण द्ग खुद का अक्स दिखाने में थोड़ा वक्त तो लेंगे। उनमें कामयाबी मिलेगी या नाकामी, यह अलहदा बात है।

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Sunil Sharma

Aug 22, 2018

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Imran Khan

- सिरिल अल्मीदा, वरिष्ठ पत्रकार

यह सप्ताहांत सभी के लिए कुछ न कुछ लेकर आया द्ग थोड़ी उम्मीद, बदलाव का सामान, यथास्थिति, खुद को पुरजोर बनाती हकीकत, भद्दी सियासत और संशय द्ग कुल मिलाकर एक भाव है कि कुछ तो घट रहा है, भले उसकी दिशा साफ नहीं है। वजीरे आजम इमरान खान का वक्त शुरू हो चुका है। इस वक्त में बदलाव की कोई आहट है या नहीं, पर कुछ इशारे जरूर हैं कि बदलाव का एजेंडा भांपने के लिए नजर किस ओर की जाए।

इमरान का असल एजेंडा समझने में थोड़ी मुश्किलात आ सकती हैं द्ग या हो सकता है नहीं भी द्ग लेकिन उन्हें सुनते हुए आपको एक मोटा भाव समझ आता है जिसमें कुछ तत्व हैं, मसलन भ्रष्टाचार से मुक्ति, शिक्षा, सेहत और पर्यावरण। ये चारों अहम तत्व इमरान की सियासत के पायदान हैं। ये चारों ऐसे हैं जिनमें बदलाव की शिनाख्त बहुत तेजी से नहीं की जा सकती। बहुत मुमकिन है कि सुधारों की पहली झलक पाने के लिए ही साल-डेढ़ साल इंतजार करना पड़े। सकारात्मक बदलाव के लिए जिस तेजी से सियासत बदलती है, उसके मुकाबले खुद बदलाव की रफ्तार काफी धीमी है। इमरान के सियासी एजेंडे के चारों बड़े मुद्दे खुद का अक्स दिखाने में थोड़ा वक्त तो लेंगे। अब वे कामयाबी के रूप में सामने आएं या नाकामी के रूप में, यह अलहदा बात है।

हम समय के साथ देखेंगे कि खुशकिस्मती से बदलाव की सियासत को संचालित करने वाला पहला बदलाव आर्थिक मोर्चे पर आएगा। यहां इमरान को एक अदृश्य लाभ मिल रहा है। अर्थव्यवस्था और राज्य-वित्त के कुप्रबंधन के चलते नवाज शरीफ को ऐसी एकतरफा और अविवेकपूर्ण शिकस्त मिली कि आज की तारीख में इससे बड़ी कोई सियासी सच्चाई नहीं रह गई है कि पाकिस्तान पर एक बहुत विशाल, ऐतिहासिक और अप्रत्याशित वित्तीय संकट का पहले से बोझ है।

असल संकट यह है द्ग तकरीबन शून्य या ऋणात्मक जीडीपी वृद्धि दर, उच्च मुद्रास्फीति, तंत्र में बिजली का न होना, गंभीर बंदिशें या बाहरी कर्जदाताओं का किसी भी कीमत पर उपलब्ध न होना जबकि डॉलर संकट दस्तक दे रहा हो, राज्य के व्यय और राजस्व सृजन के बीच असाधारण रूप से चौड़ी खाई और अर्थव्यवस्था के आकार से काफी बड़ा कर्ज जिसे प्रबंधित किया जाना मुमकिन नहीं है। हालांकि पूर्व वित्त मंत्री डार का आतंक ऐसा था कि उसके चलते कोई भी तार्किक या विश्वसनीय व्यक्ति अब इस बात को नहीं कह सकता कि मौजूदा वित्तीय संकट अभूतपूर्व या अप्रत्याशित है या फिर इसे उपलब्ध तरीकों के रास्ते प्रबंधित नहीं किया जा सकता।

इमरान खान के लिए यह स्थिति अच्छी है क्योंकि एक बार सारा आख्यान थोड़ा सहानुभूतियुक्त हो जाता है, महज इस दावे के साथ कि कुछ तीव्र और विवेकपूर्ण कदमों से ऐतिहासिक संकट को टाल दिया गया है, तो कुल मिलाकर यह बदलाव और उम्मीद के एजेंडे की जीत ही नजर आता है। नतीजा द्ग चीजें बेहतरी की ओर जाती हैं या बेहतर हो सकती हैं। राजनीति के लिहाज से देखें तो अर्थव्यवस्था का असल कायाकल्प एक लंबा और जटिल काम है। शुरुआती कार्यकाल में ही इतना काम कर दो कि आप दूसरों से अलग दिखने लगो और यह उम्मीद बंधाए रखो कि बाहरी झटके से तंत्र इतना न हिल जाए कि चुनाव करवाने पड़ जाएं। बस इतने भर से दोबारा चुनाव लडऩे के लिए आप अच्छी स्थिति में आ जाते हैं।

इमरान के लिए और अच्छी खबरें हैं। जो चीजें उनके या पाकिस्तान के काबू से बाहर हैं, वहां भी उनकी शुरुआत अच्छी हुई है। मसलन, भारत के साथ कोई तात्कालिक संकट जैसी स्थिति नहीं है। अफगानिस्तान शांति वार्ता की ओर बढ़ रहा है। सउदी-ईरान का मामला थोड़ा विस्फोटक है लेकिन इतनी जल्दी उसका संकट सामने नहीं आने वाला। घरेलू स्तर पर उग्रवाद में कमी आई है। चीन साथ में है ही। पश्चिम की पाकिस्तान के साथ किसी ताजा टकराहट में दिलचस्पी फिलहाल नहीं है, बशर्ते 9/11 जैसा कुछ बड़ा न घट जाए।

घटनाएं कभी भी हो सकती हैं, और बेशक होंगी, लेकिन आज यदि आप इमरान की स्थिति में हैं तो आप क्षेत्रीय या अंतरराष्ट्रीय ताकतों की भूमिका की शिकायत नहीं करेंगे। प्रोजेक्ट इमरान अगर इस बुनियादी सवाल को नजरअंदाज कर देता है कि पाकिस्तान को कौन चलाता है, तो शुरुआती कुछ महीनों में दो बदलाव ऐसे होंगे जो इस सवाल को दोबारा खड़ा कर देंगे। पहला अक्टूबर के महीने में होगा, जिसका जिक्रकरने की फिलहाल छूट नहीं है। दूसरा बड़ा बदलाव अदालत में होना है। मौजूदा मुख्य न्यायाधीश का कार्यकाल खत्म होने के करीब है। उनकी जगह जो आएगा वह काफी तेजी से अपनी सर्वोच्चता को स्थापित कर देना चाहेगा।

इमरान की असल परीक्षा यहां होनी है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या बदलाव वाकई आएगा? चार में से तीन प्रांतों में राजकाज की भूमिका होने के चलते पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआइ) के पास खान के बहुस्तरीय एजेंडे पर प्रदर्शन के लिए पर्याप्त गुंजाइश होगी, लेकिन शीर्ष स्तर पर स्पष्टता, सोद्देश्यता और दिशा की दरकार है। इसे दूसरे तरीके से रखें तो खान के पास इच्छाशक्ति तो है, लेकिन क्या उन्हें दिशा का ज्ञान है?