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अवैज्ञानिक सोच से आगे निकलना होगा

जो चाहते हैं कि समाज में अंधविश्वास और अवैज्ञानिक सोच बनी रहे, उन्हें चुनौती देने का वक्त आ गया है।
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Sunil Sharma

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Aug 21, 2018

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- अजेय कुमार

पूरे पांच साल हो चले, जब महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की 65 वर्ष की उम्र में कट्टर लोगों ने पुणे में गोली मार कर हत्या कर दी थी। उस हादसे का मुख्य आरोपी अब जाकर पकड़ा गया है। दाभोलकर तर्कवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रथम प्रस्तावक थे। वह दलितों के प्रति जाति-भेदभाव के खिलाफ ‘एक गांव एक पनवथा’ (एक गांव एक जलस्रोत) अभियान के शुरुआती कार्यकर्ता भी थे, जिसे राज्य में समाजवादी विचारधारा के प्रमुख नेता डॉ. बाबा आधव ने 1970 के दशक में शुरू किया था। दाभोलकर ने कई प्रकार के अंधविश्वास, जैसे मानवबलि, काला जादू, जादू-टोना, पुनर्जन्म इत्यादि के खिलाफ संघर्ष किया।

अंधविश्वास, अवैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना संविधान में बताए गए नागरिक कत्र्तव्यों के भी खिलाफ है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पश्चिम के ज्ञानोदय से प्रेरणा लेकर ही बतौर राजनेता, वैज्ञानिक मनोवृत्ति के प्रोत्साहन का काम किया। 1940 में बने एसोसिएशन ऑफ साइंटिफिक वर्कर्स (एएसडब्लूआइ) नामक संगठन के वह पहले अध्यक्ष बने। अपनी किताब ‘भारत एक खोज’ में पहली बार उन्होंने ‘साइंटिफिक टेम्पर’ शब्द का इस्तेमाल किया और 1958 में संसद ने साइंटिफिक पॉलिसी रेजोल्यूशन एक्ट पास किया। 1976 में 42वां संविधान संशोधन कर धारा 51-ए जोड़ी गई जिसमें हर नागरिक का कत्र्तव्य तय किया गया कि वह देशवासियों में वैज्ञानिक मनोवृत्ति, अन्वेषण भावना, मानवतावाद और दोषनिवारण की प्रवृत्ति का विकास करेगा।

आज जो लोग ‘वैदिक साइंस’ के सुनहरे काल की बातें कर रहे हैं, जो कह रहे हैं कि हमारे देवता प्लास्टिक सर्जरी का परिणाम थे, कि टेलीविजन और इंटरनेट महाभारत काल से भारत में था, कि वेदों में आइंस्टाइन से बेहतर खोजों का जिक्र उपलब्ध है इत्यादि, वास्तव में असंगत खयाल फैला रहे हैं। इनमें पढ़े-लिखे लोग भी हैं और ऊंचे पदों पर आसीन नेता भी। तमाम लोग उन वैज्ञानिकों-प्रोफेसरों को, जो उनसे भिन्न राय रखते हैं, ‘मैकाले पुत्र’ या ‘पश्चिमी विचारधारा से प्रभावित’ ‘देशद्रोही’ करार देते हैं। वे अवैज्ञानिक तर्कों को स्कूली पाठ्यक्रमों में स्थान देने तक की वकालत करते हैं।

जो लोग चाहते हैं कि समाज में अंधविश्वास और अवैज्ञानिक सोच बनी रहे, उन्हें चुनौती देने का वक्त आ गया है। जो देशवासी संविधान में विश्वास करता है, उसे देश की वास्तविक संस्कृति और धर्मनिरपेक्ष परंपरा बचाने के लिए आगे आना होगा।