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अभियोजन पूर्व स्वीकृति की संवैधानिकता पर सवाल

आज भारत में भ्रष्टाचार व्यक्तिगत नैतिक पतन से आगे बढ़कर संस्थागत यथार्थ बन चुका है। जब अलग-अलग संस्थानों में, अलग-अलग पदों पर बैठे लोग एक जैसी प्रक्रियात्मक ढाल के सहारे बच निकलते हैं, तब स्पष्ट हो जाता है कि समस्या व्यक्ति की नहीं, बल्कि व्यवस्था की है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Jan 23, 2026

-गजेंद्र सिंह लोक नीति विश्लेषक

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए की संवैधानिकता पर दिए गए अपने फैसले में गंभीर, पर असहज सच्चाई की ओर संकेत किया है। यद्यपि पीठ के दोनों न्यायाधीश इस धारा की वैधता पर एकमत नहीं थे, लेकिन इस बात पर स्पष्ट सहमति उभरी कि भ्रष्टाचार के मामलों में जांच से पहले सरकार से अनुमति लेने की व्यवस्था न्यायसंगत नहीं है। न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने इसे भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देने वाला, जांच को बाधित करने वाला और अधिनियम के मूल उद्देश्य के प्रतिकूल बताया। यह फैसला केवल कानूनी व्याख्या नहीं है, बल्कि भारत में बढ़ते संस्थागत भ्रष्टाचार की समस्या पर एक गंभीर चेतावनी भी है। आज भारत में भ्रष्टाचार व्यक्तिगत नैतिक पतन से आगे बढ़कर एक संस्थागत यथार्थ बन चुका है। यह व्यवस्था के भीतर व्यवस्थित रूप से संरक्षित होता है और कई बार कानून व प्रक्रिया की वैधता के आवरण में छिपा रहता है।

हाल की घटनाएं दिखाती हैं कि जांच एजेंसियां, कानूनी प्रक्रियाएं और यहां तक कि संवैधानिक संस्थान भी अनेक अवसरों पर जवाबदेही तय करने के बजाय संरक्षण के उपकरण बन जाते हैं। भ्रष्टाचार को अक्सर हम किसी एक अधिकारी, नेता या राजनीतिक दल की नैतिक कमजोरी मानकर आगे बढ़ जाते हैं लेकिन जब अलग-अलग संस्थानों में, अलग-अलग पदों पर बैठे लोग एक जैसे बहानों, चुप्पी और प्रक्रियात्मक ढाल के सहारे बच निकलते हैं, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्या व्यक्ति की नहीं, बल्कि व्यवस्था की है। राजस्थान में 2 करोड़ रुपए की रिश्वत मांग के आरोप में गिरफ्तार आरपीएस अधिकारी दिव्या मित्तल का मामला संस्थागत भ्रष्टाचार की प्रकृति को उजागर करता है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत अभियोजन की अनुमति न देकर सरकार ने जांच को जिस तरह रोका, वह महज प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार-निरोधक तंत्र की विश्वसनीयता पर सीधा प्रश्न है। जो प्रावधान 'ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा' के नाम पर लाया गया था, वही व्यवहार में जांच से बचाव की ढाल बनता दिखा। आरोपी की ओर से वॉइस सेम्पल देने से इनकार और उसके बावजूद कार्रवाई का ठहर जाना इस संदेह को और गहरा करता है- यदि मामला झूठा था तो क्या एसीबी की जवाबदेही तय होगी और यदि नहीं, तो अभियोजन क्यों रोका गया? यही अनुत्तरित प्रश्न संस्थागत भ्रष्टाचार की असली पहचान है।

अभियोजन स्वीकृति की अवधारणा की जड़ें औपनिवेशिक शासन में हैं। ब्रिटिशकाल में लोक सेवकों को राजसत्ता का प्रतिनिधि माना जाता था और यह आशंका थी कि यदि हर प्रशासनिक निर्णय पर आपराधिक मुकदमे होंगे, तो शासन ठप हो जाएगा। इसी सोच के तहत दंड प्रक्रिया संहिता में यह प्रावधान जोड़ा गया कि 'सरकारी कर्तव्य' के निर्वहन में किए गए कार्यों के लिए किसी लोक सेवक के विरुद्ध अभियोजन से पहले सरकारी अनुमति आवश्यक होगी। स्वतंत्रता के बाद भी इसे ईमानदार अधिकारियों को राजनीतिक प्रतिशोध और झूठे मुकदमों से बचाने के उद्देश्य से बनाए रखा गया, लेकिन समय के साथ यह अपवाद नियम बन गया। धारा 17ए के तहत जांच शुरू करने से पहले ही सरकारी स्वीकृति की अनिवार्यता ने साक्ष्य-संग्रह और जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया को कमजोर किया है। परिणामस्वरूप कानून की समानता क्षीण होती गई और भ्रष्टाचार व्यक्तिगत अपराध से आगे बढ़कर संस्थागत समस्या का रूप लेने लगा। विधायकों और सांसदों के मामलों में भी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 19 और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 मिलकर अभियोजन को राजनीतिक सहमति पर निर्भर बना देती हैं। यद्यपि धारा 17ए सीधे उन पर लागू नहीं होती, फिर भी ये प्रावधान मिलकर एक ऐसा सुरक्षात्मक कवच बना देते हैं, जिसके चलते अभियोजन राजनीतिक सहमति या असहमति पर निर्भर हो जाता है। न्यायपालिका के संदर्भ में यह संरक्षण और भी कठोर है। के. वीरस्वामी बनाम भारत संघ (1991) के अनुसार, किसी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध प्राथमिकी, जांच या अभियोजन से पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश की पूर्व अनुमति आवश्यक है। यह कोई विधायी प्रावधान नहीं, बल्कि न्यायपालिकाकी ओर से विकसित नियम है, जो व्यवहार में धारा १७ए से भी अधिक मजबूत सुरक्षा प्रदान करता है। इस प्रकार जो संरक्षण ईमानदार अधिकारियों की रक्षा के लिए बनाया गया था, वह कई मामलों में भ्रष्ट आचरण की जांच और जवाबदेही को टालने का साधन बन गया है।

लोकतंत्र में वास्तविक समानता तभी स्थापित हो सकती है जब कानून सभी के लिए एक-सा हो- चाहे वह अधिकारी हो, जनप्रतिनिधि हो या न्यायपालिका का सदस्य। इस संकट का समाधान भी उतना ही संस्थागत होना चाहिए। क्या अभियोजन स्वीकृति जैसी औपनिवेशिक प्रक्रियाओं की वर्तमान व्यवस्था में प्रासंगिकता है, जब दंड प्रक्रिया संहिता की जगह भारतीय न्याय संहिता ने ले ली है? जांच एजेंसियों को वास्तविक स्वायत्तता देनी होगी। न्यायपालिका के लिए पारदर्शी और समयबद्ध जवाबदेही तंत्र विकसित करना होगा और राजनीति में नैतिकता को केवल भाषणों तक सीमित न रखकर आचरण में उतारना होगा। आज सवाल यह नहीं है कि भ्रष्ट लोग क्यों हैं। असली सवाल यह है कि भ्रष्टाचार से लडऩे वाली संस्थाएं खुद क्यों थकती, झुकती या समझौता करती दिख रही हैं? जब तक इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं मिलेगा, तब तक भ्रष्टाचार किसी एक चेहरे का नाम नहीं, बल्कि व्यवस्था का स्थायी चेहरा बना रहेगा। जब जांच, अभियोजन और जवाबदेही के मानक सभी के लिए समान होंगे, तभी नागरिकों का भरोसा लौटेगा।