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चुनाव आयोग विवाद से बढ़ी सियासी तपिश

ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली तथा एसआइआर पर सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल कोई फैसला सुनाने से तो परहेज किया, लेकिन कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए साफ कर दिया कि उसने फॉर्म-6 में किसी संशोधन को मंजूरी नहीं दी।
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Oct 08, 2026
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दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दस महीने में 14 बार आपत्तियों के मीडिया में खुलासे के बाद निशाने पर आए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध विभिन्न संगठनों के सड़क पर उतरने, पूर्व नौकरशाहों द्वारा महाभियोग एवं आरोपपत्र जारी करने और सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों से सरकार भी सवालों से घिर गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के बजाय दोनों आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू एवं विवेक जोशी की संयुक्त बैठक की तस्वीर और 'आयोग में सब कुछ ठीक' होने के दावे वाली प्रेस रिलीज ही जारी कर पाए, जिससे जवाब कम मिले, 'सुधारात्मक कदमों' से संदेहों को बल ज्यादा मिला।

परिणामस्वरूप कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) से लेकर विपक्ष तक तमाम संगठन मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे, एसआइआर से पहले की मतदाता सूची बहाल करने और ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव करवाने की मांग को लेकर सड़क पर हैं। सीजेपी ने मुंबई के शिवाजी पार्क से देशव्यापी आंदोलन की शुरुआत कर 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन की घोषणा की है तो 'इंडिया' गठबंधन के घटक दलों ने भी दो अक्टूबर से व्यापक आंदोलन शुरू कर दिया है। दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बाबत एक अंग्रेजी अखबार के खुलासे से उत्साहित 'इंडिया' गठबंधन अपने आरोपों को लेकर राष्ट्रपति के पास भी जाएगा और संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध महाभियोग भी लाएगा। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून की वैधता के साथ ही चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़ी याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय में भी सुनवाई चल रही है। ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली तथा एसआइआर पर सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल कोई फैसला सुनाने से तो परहेज किया, लेकिन कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए साफ कर दिया कि उसने फॉर्म-6 में किसी संशोधन को मंजूरी नहीं दी।

सुप्रीम कोर्ट का रुख तो चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, बैठकों के एजेंडा और उनकी मिनट्स की समीक्षा पर निर्भर करेगा, लेकिन उसके साथ ही सत्तापक्ष और विपक्ष की निगाहें जन साधारण की प्रतिक्रिया पर ज्यादा रहेंगी। पेपर लीक मामले में सीजेपी के बैनर तले जंतर मंतर पर 'जेन जी' आंदोलन के चलते नरेंद्र मोदी सरकार 12 साल में पहली बार अपने किसी मंत्री का इस्तीफा दिलवाने को मजबूर हुई। फिर भी दिल्ली पुलिस की ओर से जंतर मंतर आंदोलनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग और कथित पैलेट गन के इस्तेमाल की जिम्मेदारी के सवाल पर सत्तापक्ष और विपक्ष की तनातनी में संसद का मानसून सत्र बह गया।

दोनों चुनाव आयुक्तों को बताए बिना मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा फैसले लेने के मीडिया में खुलासे से संसद के शीतकालीन सत्र से पहले ही विपक्ष को उससे भी बड़ा मुद्दा हाथ लग गया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी महाराष्ट्र व हरियाणा विधानसभा चुनावों के बाद से ही चुनाव आयोग पर 'वोट चोरी' के आरोप लगाते रहे हैं, जो पश्चिम बंगाल के बाद 'सरकार चोरी' में बदल गए। चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ दल भाजपा उन आरोपों को खारिज करते हुए इसी बीच कुछ विधानसभा चुनावों में विपक्ष की जीत को लेकर सवाल पूछते रहे, लेकिन दो चुनाव आयुक्तों द्वारा फॉर्म-6 समेत एसआइआर प्रक्रिया व चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर आपत्ति के खुलासे से विपक्ष के तेवर ज्यादा आक्रामक हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ने भी पिछली बार राहुल गांधी से आरोपों पर हलफनामा देने या माफी मांगने की मांग जैसी तल्खी नहीं दिखाई।

भाजपा ही उनका बचाव कर रही है। भाजपा का तर्क है कि चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठाकर विपक्ष उसकी सरकारों की वैधानिकता पर संदेह का माहौल बना रहा है, इसलिए उसे जवाब देना पड़ रहा है, लेकिन इस बीच कर्नाटक समेत कुछ राज्यों में मतदाताओं के नाम कटवाने के लिए भाजपा से जुड़े लोगों द्वारा संदेहास्पद ढंग से थोक में फॉर्म-7 जमा करवाने के खुलासे से भी वह कठघरे में है। दरअसल, चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून को लेकर उठे सवालों के बीच चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर भी सार्वजनिक विमर्श में चिंताएं सामने आती रही हैं। सुप्रीम कोर्ट दो बार टिप्पणी कर चुका है कि चुनाव आयोग को स्वतंत्र होना ही नहीं चाहिए, दिखना भी चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां व सवाल आयोग के साथ सरकार को भी कठघरे में खड़ा करते हैं।

दरअसल दशकों तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति बिना किसी कानून के की जाती रही। नियुक्ति संबंधी कानून के अभाव में केंद्र सरकार की मनमर्जी रोकने के लिए पारदर्शी प्रक्रिया की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर की गईं। याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दो मार्च, 2023 को संविधान पीठ ने फैसला दिया कि इस बाबत संसद की ओर से कानून बनाए जाने तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति देश के मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता की समिति की सिफारिश पर होगी। उसी साल 28 दिसंबर को संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें व कार्यकाल) अधिनियम, 2023 पारित कर कानून बना दिया, जिसमें तीन सदस्यीय चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश के बजाय प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केबिनेट मंत्री को जगह दी गई। मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर केबिनेट मंत्री को शामिल करने से संदेश गया कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में सरकार वर्चस्व चाहती है। विपक्ष के तमाम संदेह और सवाल इसी संदेश से उपजे, जिन्हें आयोग के अंदरूनी विवाद से बल भी मिल गया है।

राजकुमार सिंह,(वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक)

Updated on:
08 Oct 2026 04:19 pm
Published on:
08 Oct 2026 04:19 pm