कश्मीर के मुद्दे पर नजर रखने वालों का कयास है कि मोदी-महबूबा की मुलाकात के पीछे दिल्ली में चल रही वह चर्चा है जिसके अनुसार जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन के विकल्प पर केंद्र विचार कर रहा है।
राजनीतिक समीक्षक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 25 मिनट तक चली मुलाकात के बाद जम्मू और कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा कि संवाद ही कश्मीर समस्या के समाधान का एकमात्र रास्ता है। साथ ही उन्होंने कहा कि बातचीत के लिए अनुकूल माहौल बनाना होगा।
पत्थरबाजों से सख्ती से निपटने के बयानों के बीच यह मांग भी बढ़ती जा रही है कि कश्मीर में सकारात्मक गर्मी का मौसम हो, इसके लिए जरूरी है कि वहां के लोगों से सीधे बात की जाए। कश्मीर के मुद्दे पर नजर रखने वालों का कयास है कि मोदी-महबूबा की मुलाकात के पीछे दिल्ली में चल रही वह चर्चा है जिसके अनुसार जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन के विकल्प पर केंद्र विचार कर रहा है।
इस बारे में विपक्षी कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस भी कह रहे हैं कि महबूबा वांछित परिणाम नहीं दे पाई हैं इसलिए अब सीधे दिल्ली का शासन जरूरी हो गया है। जाहिरा तौर पर महबूबा इस मांग से बेअसर दिखीं लेकिन हकीकत यह है कि इस विकल्प को इसलिए बढ़ावा दिया जा रहा है कि महबूबा को इस संकट से निपटने के लिए नरम और समझौतावादी रवैया अपनाने के बजाय सख्ती दिखाने के लिए तैयार किया जा सके।
प्रधानमंत्री मोदी खुद श्रीनगर-जम्मू राजमार्ग पर सुरंग का उद्घाटन करते हुए अपेक्षाकृत सख्त संदेश दे चुके हैं, जब उन्होंने कहा था कि कश्मीर के युवाओं को आतंकवाद और पर्यटन में से किसी एक को चुनना होगा। जबकि उनसे उम्मीद की जा रही थी कि वे कश्मीर के नाराज युवाओं से संवाद स्थापित करने की कोशिश करेंगे।
इस वक्तव्य के बाद राज्य में छात्र असंतोष देखने को मिला है जिसकी शुरुआत दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के एक डिग्री कॉलेज से हुई। समुदायिक असंतोष के एक नए चरण की शुरुआत हो गई जब विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और हायर सैकंडरी स्कूलों से छात्र निकलकर हर नुक्कड़ और चौराहे पर बिखर गए और पुलिस पर पथराव के तीखे संघर्ष में उलझ गए।
सरकार ने इससे निपटने के लिए एक सप्ताह के लिए स्कूलों और कॉलेजों में अवकाश घोषित कर दिया। महबूबा ने स्वीकार किया है कि पत्थरबाजी में शामिल कुछ युवा जहां निराश-हताश हैं, वहीं कुछ युवाओं को अलगाववादी ताकतों द्वारा गुमराह किया गया है।
वे कश्मीर के ताजा हालात से निपटने के लिए लगातार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पहल को आगे बढ़ाने का आह्वान करती रहती हैं। दिल्ली की सोच नहीं बदली है और यह अब भी 'कानून और व्यवस्था' के ढांचे में ही बंद है। यह सोच सैनिक निदान की है और अगर चीजें नहीं बदलीं तो यह पूरी ताकत से इस्तेमाल की जा सकती है। इससे हालात और बेकाबू होंगे।
अनंतनाग में चुनाव स्थगित करने के बाद दिल्ली पहले ही उनके सामने आत्मसमर्पण के संकेत दे चुका है जो नहीं चाहते कि चुनाव हों। लोगों ने बहुमत से इस चुनाव प्रक्रिया को सफल नहीं होने दिया और इससे पाकिस्तान को यह शोर मचाने में सहायता मिली है कि कैसे कश्मीरी भारतीय प्रणाली को पसंद नहीं करते हैं।
अगर राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता है तो लोकतंत्र का मुखौटा भी आगे आने वाले कुछ समय के लिए नहीं रहेगा। क्या सरकार अंतराष्ट्रीय स्तर पर इसका सामना कर पाएगी? शायद नहीं, इसलिए वे महबूबा से वह सब करवाने की कोशिश करेंगे जो कि वे करना चाहते हैं।
मेरा यह मानना है कि पीडीपी इस समय कमजोर स्थिति में है और भाजपा से हाथ मिलाने के कारण जमीनी स्तर पर साख के संकट से जूझ रही है। उल्लेखनीय है कि भाजपा व पीडीपी के मध्य एजेंडा ऑफ एलायंस के शिल्पी हसीब द्राबू, जो कि जम्मू-कश्मीर सरकार में वित्त मंत्री भी हैं, जम्मू भाजपा के कार्यालय में राम माधव से मिलने पहुंचे।
इतना ही नहीं, अब तक पीडीपी-भाजपा के गठबंधन की शर्तों के एक भी बिंदु का क्रियान्वयन नहीं हो पाया है जबकि भाजपा के चुनावी घोषणा के तीन बिंदुओं को पूरे जोर-शोर से लागू किया गया है। आज जबकि केंद्र स्थित मोदी सरकार कश्मीर में सख्ती की बात कर रही है, तो यह स्थितियों के साथ मेल नहीं खाता है।
वाजपेयी का तरीका टकराव का नहीं बल्कि सुलह-समझौते और हाथ बढ़ाने का था। महबूबा सरकार को हालात से खुद निपटने के लिए जरूरी समर्थन देना चाहिए और इसमें दिल्ली को दखल नहीं देना चाहिए। सरकार के मंत्रियों को शासन के लिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
ऐसी सार्वजनिक लोकतांत्रिक जगहें बनाई जाएं जहां युवा संवाद करें और अपने विचारों से अवगत करा सकें। महबूबा यह स्वीकारती हैं कि आने वाले दो-तीन माह निर्णायक होने जा रहे हैं, इसके साथ ही उनको स्थिति की गंभीरता से केंद्र को भी अवगत कराना होगा।
अगर यह नहीं किया गया तो सकारात्मकता सिर्फ एक सपना बन कर ही रह जाएगी। जो लोग पर्यटन के रास्ते कश्मीर में सामान्य हालात बहाल होने की बात कर रहे हैं, उनको यह समझना होगा कि सिर्फ शांति और स्थिरता ही ऐसा होने में मदद कर सकती है, इसके लिए रास्ता राजनीतिक तरीकों से होकर जाता है न कि कानून व्यवस्था की सोच के तरीकों से।
- कैच न्यूज से