वस्तुत: प्रणब मुखर्जी का संदेश राष्ट्र के नाम न होकर संघ के नाम था। संघ से संबंधित कई कड़वी सच्चाइयों को वे अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर उजागर कर गए।
किसी वृहद विश्वविद्यालय के लिए दीक्षांत समारोह का जो महत्त्व होता है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए संघ शिक्षा तृतीय वर्ष समारोह का वही महत्त्व है। गुरुवार को नागपुर में हुए इस समारोह के मुख्य अतिथि पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दीक्षित हो रहे संघ शिक्षार्थियों को संदेश दिया। इस संदेश पर शिक्षार्थियों के साथ संघ के पदाधिकारी भी गंभीरता से मनन करें तो आने वाले समय में संघ बड़ी और सार्थक भूमिका निभा सकता है।
मुखर्जी का भाषण उनके पचास साल के अनुभव का, विशेष तौर से संघ के बारे में उनकी समझ का निचोड़ कहा जा सकता है। उन्होंने संकेतों में उन बिंदुओं को स्पष्ट कर दिया, जिन पर कार्य करना और संगठन में सुधार करना संघ के लिए आवश्यक हो गया है। डॉ. हेडगेवार ने १९२५ में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव रखी थी, उस समय काल, परिस्थितियां और वातावरण कुछ और था। तब से आज तक जमाना एकदम बदल गया है। लेकिन संघ में जो सकारात्मक बदलाव आने चाहिए थे, वो नहीं आए। हां, मूल उद्देश्य से भटकाव अवश्य देखने को मिला।
पूर्व राष्ट्रपति ने जब कहा कि सहिष्णुता में ही ताकत है, तो उनका स्पष्ट संकेत था कि संघ में असहिष्णुता बढ़ती जा रही है। राष्ट्रवाद और एकात्मवाद के नारों के बीच ‘नफरत’ शब्द ने कहीं चुपके से प्रवेश कर लिया है। जब उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद किसी धर्म में नहीं बंटा है और उसमें जाति, मजहब या नस्ल का भेद नहीं होता, तो इसका सीधा तात्पर्य यह था कि संघ के लिए राष्ट्रवाद का मतलब केवल एक धर्म से बंधना रह गया है। जब वे ‘नफरत से पहचान को खतरा’ जैसी बात करते हैं तो वह यह संदेश दे रहे थे कि संघ को नफरत का प्रचार करने वाले तत्वों से छुटकारा पा लेना चाहिए। इसी तरह प्रजा की खुशी की बात कहकर उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि आज राजा तो खुश है, पर प्रजा की खुशी से किसी को मतलब नहीं है।
संघ प्रमुख मोहन भागवत अपने पिछले संबोधनों में लगातार यह कह रहे हैं कि हिन्दू एक धर्म नहीं, संस्कृति है, तो अब समय आ गया है कि संघ इन वक्तव्यों को लागू भी करके दिखाए। अपनी स्थापना के बाद संघ में पहली बार बड़ा परिवर्तन अगर कोई दिखाई दिया तो वह हाल ही में संघ गणवेश में किया गया बदलाव था। मुखर्जी संघ को परोक्ष रूप से यही समझाने का प्रयास कर रहे थे कि संघ को नई पहचान बनाते हुए आगे बढऩा है तो अपनी मूल आचार-संहिता में आवश्यकतानुसार परिवर्तन करना होगा। समय के साथ उपयुक्त परिवर्तन ही किसी संगठन की जीवंतता को बनाए रख सकते हैं।
वस्तुत: मुखर्जी का संदेश राष्ट्र के नाम न होकर संघ के नाम था। संघ से संबंधित कई कड़वी सच्चाइयों को वे अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर उजागर कर गए। समय के साथ संघ कहां अपनी मूल अवधारणा से भटका। उसकी वर्तमान तस्वीर कैसी है, इसे वे बखूबी बता गए।
अच्छा तो यही होगा कि दलगत राजनीति और विचारधारा से ऊपर उठकर संघ में इन मुद्दों पर मंथन हो। इतनी सीधी, सच्ची और स्पष्ट तस्वीर दिखाने का साहस मुखर्जी के अलावा कौन कर सकता था। इसी भावना में उनके वक्तव्य को लिया जाएगा तो संघ अपनी भूमिका अधिक सार्थक बना पाएगा।