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भारत का आदर्श नहीं हो सकता अमरीका का मॉडल

जब न्याय और समानता जैसे नैतिक मूल्यों की अनदेखी होती है और लालच को प्रोत्साहन मिलता है, तो उसके व्यावहारिक दुष्परिणाम भी सामने आते हैं।

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जगदीश रत्तनानी वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार(द बिलियन प्रेस) - ऑक्सफैम की इसी माह जारी एक रिपोर्ट ने दुनिया के अति-धनी वर्ग की ओर से टैक्स हैवन देशों में छिपाकर रखी गई बेहिसाब संपत्ति की ओर ध्यान आकर्षित किया है। रिपोर्ट में सरकारों से कर प्रणालियों को मजबूत करने, वित्तीय पारदर्शिता बढ़ाने और ग्लोबल एसेट रजिस्टर बनाने का आह्वान किया गया है, ताकि सबसे अमीर व्यक्तियों की संपत्तियों को पहचान कर उन पर उच्च दर से कर लगाया जा सके।

ब्रिटेन की इस संस्था के अनुसार, दुनिया के शीर्ष 0.1 प्रतिशत अमीरों की ओर से विदेशों में छिपाकर रखी गई अघोषित संपत्ति, सबसे गरीब आधी आबादी यानी लगभग 4.1 अरब लोगों की कुल संपत्ति से भी अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार, 'पनामा पेपर्स' लीक के दस साल बाद भी अति-धनी वर्ग कर चोरी के लिए विदेशी प्रणालियों का दुरुपयोग कर रहा है। वर्ष 2024 में इस छिपाई गई दौलत का अनुमान 3.5 ट्रिलियन डॉलर लगाया गया है, जो फ्रांस की जीडीपी से भी अधिक और दुनिया के 44 सबसे कम विकसित देशों की संयुक्त जीडीपी के दोगुने से ज्यादा और भारत की जीडीपी का लगभग 85 प्रतिशत है। आंकड़ों की यह भयावह तस्वीर बताती है कि कैसे मुट्ठी भर अमीर अपार शक्ति और नियंत्रण का उपयोग कर रहे हैं। धन का यह अभूतपूर्व संकेंद्रण न केवल असमानता को जन्म देता है, बल्कि समाज को भी छिन्न-भिन्न कर रहा है। यह आर्थिक असमानता सशस्त्र संघर्षों, अत्याचारों और यहां तक कि नरसंहारों को भी वित्तपोषित करती है- जैसा कि हम वैश्विक सैन्य टकरावों में देख रहे हैं।

यह युद्ध तंत्र ऐसे 'डिजिटल-मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स' को खाद-पानी देता है, जो रिमोट से चलने वाले 'पुश-बटन' युद्धों के माध्यम से मुनाफा कमाता है, जिसमें अनगिनत निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं। सीमाओं के पार फैलने वाली यह हिंसा, देशों के भीतर भी असमानता के रूप में दिखाई देती है, जो अवसरों को सीमित करती है, औसत आयु को घटाती है और गरीबों, महिलाओं तथा वंचित समूहों पर सर्वाधिक प्रभाव डालती है। इसी तरह, आर्थिक प्रतिबंध युद्ध से भी बदतर त्रासदी लाते हैं, 'लैंसेट' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों के कारण दुनियाभर में हर साल लगभग 5,64,000 अतिरिक्त मौतों का कारण बनती है। ऑक्सफैम की यह रिपोर्ट वैश्विक चेतना को झकझोरने वाली है और भारत के लिए इसके विशेष मायने हैं, जहां हाल के वर्षों में एक नया अति-धनी वर्ग पैदा हुआ है। जब देश दुनिया की चौथी से तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, तब इस तरह की चेतावनियों को नजरअंदाज किया जाना विडंबनापूर्ण होगा। अमरीकी आख्यानों का अनुसरण करना और शेयरधारक पूंजीवाद की नकल करना भारतीय लोकाचार और 'वसुधैव कुटुंबकम' के मूल्यों के अनुरूप नहीं है। इससे उसी तरह संसाधनों की लूट बढ़ेगी और वही विसंगतियां पैदा होंगी, जो आज अमरीका में दिख रही हैं। ऑक्सफैम की यह रिपोर्ट विफल होती वैश्विक व्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने में आती दरार और हिंसा के उभरते खतरे को दिखाती है। जब न्याय और समानता जैसे नैतिक मूल्यों की अनदेखी होती है और लालच को प्रोत्साहन मिलता है, तो उसके व्यावहारिक दुष्परिणाम भी सामने आते हैं। अमरीका और इजरायल के साथ भारत की बढ़ती कूटनीतिक नजदीकी को सिर्फ रणनीतिक साझेदारी के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। इसमें अमरीकी विचारधारा के उस जाल में फंसने का भी जोखिम है, जिसकी अपनी कोई स्थायी मित्रता नहीं, केवल स्वार्थ हैं। भारत का मॉडल अमरीका का वह विफल मॉडल नहीं हो सकता, जहां भीतर ढांचागत हिंसा है और बाहर सैन्य आक्रामकता।
आज भारत में भी हर क्षेत्र में असमानता के संकेत दिख रहे हैं।

अस्पतालों पर कब्जा करती निजी इक्विटी से लेकर वातानुकूलित स्कूलों की आसमान छूती फीस तक और लाखों का टर्नओवर करने वाले ऐप्स के लिए कम मजदूरी पर काम करने वाले बेरोजगार युवाओं से लेकर सरकारी अस्पतालों व बसों की बदहाली तक यह जाहिर है। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद समाजवादी ढांचे से बाजार अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ा। भारत अब हर चीज की खरीद-फरोख्त वाले एक 'बाजार समाज' बनने की ओर बढ़ रहा है। हार्वर्ड के प्रो. माइकल सैंडल के अनुसार, बाजार अर्थव्यवस्था उत्पादन को संगठित करने का साधन है, जबकि बाजार समाज वह है जहां हर चीज की कीमत तय हो जाती है। यह भारत की नियति नहीं हो सकती। यहां 'अर्थ' से पहले 'धर्म' का स्थान है और यही संतुलन हमें बनाए रखना होगा।