इंदौर के भागीरथपुरा की घटना ने यह साबित कर दिया है कि स्वच्छता का जो महल खड़ा किया गया है, उसकी नींव में बुनियादी ढांचे की भारी कमजोरी है।
दूषित पानी पीने से मौत की घटना देश में कहीं भी हो- शर्मनाक है। इंदौर जैसे शहर में ऐसी घटना का होना और भी चिंता की बात है क्योंकि यह शहर कई वर्षों से देश का सबसे स्वच्छ शहर होने का तमगा लिए फिरता है। स्वच्छता सर्वेक्षणों में लगातार अव्वल आने वाले शहर में अगर सैंकड़ों लोग दूषित पानी के कारण बीमार पड़ जाएं और उन्हें जीवन-मौत से जूझना पड़े, तो यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या 'स्वच्छता' का अर्थ केवल सड़कों की सफाई और पेंटिंग तक ही सीमित है? क्या नागरिकों को शुद्ध पेयजल जैसा मौलिक अधिकार देना नगर निगम और प्रशासन की प्राथमिकता में नहीं है? यह त्रासदी हमें इसलिए भी झकझोरती है क्योंकि अन्य शहरों के मुकाबले यहां कहीं अधिक चाक-चौबंद व्यवस्था की अपेक्षा रही है। यह महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्थागत विफलता का भयावह चेहरा है। जिम्मेदारों पर आपराधिक लापरवाही की कार्रवाई होनी चाहिए।
इंदौर के भागीरथपुरा की घटना ने यह साबित कर दिया है कि स्वच्छता का जो महल खड़ा किया गया है, उसकी नींव में बुनियादी ढांचे की भारी कमजोरी है। पाइपलाइन में लीकेज के कारण गंदे पानी की आपूर्ति की शिकायतें की जा रही थीं लेकिन, प्रशासन की कुंभकर्णी नींद तब तक नहीं खुली, जब तक घरों से अर्थियां नहीं निकलीं। जब जनता अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए गुहार लगा रही हो और जिम्मेदार अधिकारी उदासीन रहें तो इसे 'आपराधिक लापरवाही' के अलावा और क्या नाम दिया जाए? इस त्रासदी में सबसे अधिक आहत करने वाला पहलू मंत्री एवं स्थानीय विधायक कैलाश विजयवर्गीय का रवैया रहा है। लोकतंत्र में जनता अपने नुमाइंदों को इसलिए चुनती है कि वे संकट के समय उनके साथ खड़े होंगे, न कि इसलिए कि वे उनकी मौतों को 'फोकट की बात' करार देंगे।
एक तरफ इंदौर को 'स्मार्ट सिटी' और 'स्वच्छ शहर' के रूप में ग्लोबल ब्रांड बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं के अभाव में गरीब बस्तियों के लोग दम तोड़ रहे हैं। ऊपर से राजनीतिक नेतृत्व का यह अहंकार न केवल निंदनीय है, बल्कि यह उस भरोसे का कत्ल भी है जो जनता अपने प्रतिनिधियों पर करती है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की टिप्पणी इस मामले में एक उम्मीद की किरण है। अदालत ने स्पष्ट रूप से प्रशासन की विफलता को रेखांकित किया है। फौरी तौर पर कुछ अधिकारियों पर हुई कार्रवाई इस समस्या का समाधान नहीं है। पानी की पाइपलाइनों का ड्रेनेज लाइनों के साथ मिलना या उनमें लीकेज होना कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन इसकी नियमित निगरानी की कमी एक बड़ा अपराध है। यह घटना केवल इंदौर के लिए नहीं, बल्कि देश के उन तमाम शहरों के लिए एक चेतावनी है जो बुनियादी ढांचे को नजरअंदाज कर बाहरी सौंदर्यीकरण पर पैसा बहा रहे हैं। जन-स्वास्थ्य किसी भी शहर की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।