सीटें भरने के लिए कटऑफ को शून्य तक गिराना कोई समाधान नहीं है। सरकार और नियामक निकायों को व्यावहारिक समाधानों पर विचार करना चाहिए। निजी कॉलेजों की अत्यधिक फीस को नियंत्रित किया जाना चाहिए, ताकि मेधावी छात्र आर्थिक कारणों से सीटें न छोड़े।
-प्रो. अशोक कुमार पूर्व कुलपति, गोरखपुर विश्वविद्यालय
भारत की चिकित्सा शिक्षा प्रणाली आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है, जहां निर्णय 'मेरिट' (योग्यता) के आधार पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक 'मजबूरी' के आधार पर लिए जा रहे हैं। 'नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज' की ओर से नीट-पीजी 2025 के लिए जारी किए गए नए कटऑफ ने पूरे देश के बुद्धिजीवियों और चिकित्सा जगत को स्तब्ध कर दिया है। यह निर्णय न केवल शिक्षा की गुणवत्ता के गिरते स्तर को दर्शाता है, बल्कि समाज के प्रति हमारी जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। जब योग्यता का पैमाना नकारात्मक अंकों (-40) तक गिर जाए, तो हमें यह सोचने की आवश्यकता है कि हम भविष्य में किस प्रकार के विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार कर रहे हैं। काउंसलिंग के संशोधित नियमों पर गौर करें तो स्थिति चिंताजनक और चौंकाने वाली है। 800 अंकों की इस राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में कटऑफ को जिस तरह घटाया गया है, वह किसी भी शैक्षणिक मानक के विरुद्ध है।
सामान्य और ईडब्ल्यूएस वर्ग के लिए न्यूनतम योग्यता को 50 पर्सेंटाइल (276 अंक) से घटाकर सीधे 7 पर्सेंटाइल (103 अंक) कर दिया गया है। आरक्षित वर्ग (एससी/एसटी एवं ओबीसी) में तो गिरावट की सारी सीमाएं पार कर दी गई हैं। 40 पर्सेंटाइल (235 अंक) की अनिवार्यता को समाप्त कर शून्य (0) पर्सेंटाइल कर दिया गया है, जिसका अर्थ है कि -40 अंक लाने वाला अभ्यर्थी भी अब विशेषज्ञ डॉक्टर बनने के योग्य माना जाएगा। दिव्यांग वर्ग में योग्यता को 45 पर्सेंटाइल से घटाकर महज 5 पर्सेंटाइल (90 अंक) कर दिया गया है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि अब प्रतिस्पर्धा और उत्कृष्टता का स्थान मात्र 'उपलब्धता' ने ले लिया है। इस निर्णय के पीछे का तर्क यह दिया जा रहा है कि सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में पीजी (पोस्ट-ग्रेजुएशन) की सीटें खाली न रहें। सीटें खाली रहना निश्चित रूप से ढांचागत और आर्थिक नुकसान है, लेकिन क्या आर्थिक नुकसान की भरपाई मरीजों की जान जोखिम में डालकर की जानी चाहिए? ऐसा प्रतीत होता है कि शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य अब कुशल जीवन-रक्षक तैयार करने के बजाय केवल सीटों को भरना और कॉलेजों के वित्तीय हितों की रक्षा करना रह गया है। चिकित्सा एक ऐसा पेशा है, जहां त्रुटि की कोई गुंजाइश नहीं होती।
एक सर्जन या फिजिशियन की छोटी-सी चूक जानलेवा हो सकती है। जब हम महज 7 या 0 पर्सेंटाइल वाले छात्रों को विशेषज्ञता की अनुमति देते हैं, तो हम सीधे तौर पर चिकित्सा की गुणवत्ता से समझौता कर रहे होते हैं। यदि प्रवेश का स्तर ही इतना कमजोर होगा, तो इन डॉक्टरों की ओर से दी जाने वाली विशेषज्ञ सेवाओं की दक्षता पर सवाल उठना अनिवार्य है। जब एक मरीज को यह पता चलेगा कि उसका इलाज करने वाला 'विशेषज्ञ' नकारात्मक अंकों के आधार पर चयनित हुआ है, तो डॉक्टर-मरीज के बीच का पवित्र विश्वास खंडित हो जाएगा। यह स्थिति समाज में एक नए प्रकार के असुरक्षा भाव को जन्म देगी। भारत आज 'मेडिकल टूरिज्म' के एक बड़े केंद्र के रूप में उभर रहा है। हमारी चिकित्सा सेवाओं की वैश्विक साख हमारी कड़ी शैक्षणिक प्रक्रियाओं और योग्य डॉक्टरों पर टिकी है। यदि योग्यता के साथ इसी तरह समझौता किया गया, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय डॉक्टरों की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। मानकों में यह ढील न केवल घरेलू स्तर पर बल्कि वैश्विक मंच पर भी आत्मघाती सिद्ध होगी। सीटें भरने के लिए कटऑफ को शून्य तक गिराना कोई समाधान नहीं है। सरकार और नियामक निकायों को व्यावहारिक समाधानों पर विचार करना चाहिए। निजी कॉलेजों की अत्यधिक फीस को नियंत्रित किया जाना चाहिए ताकि मेधावी छात्र आर्थिक कारणों से सीटें न छोड़े।
सीटों को आकर्षक बनाने के लिए ग्रामीण सेवा की शर्तों में सुधार और बेहतर प्रोत्साहन राशि दी जानी चाहिए। योग्यता से समझौता करने के बजाय शिक्षण व्यवस्था को इतना सुदृढ़ किया जाए कि छात्र स्वत: ही इन सीटों की ओर आकर्षित हों। शिक्षा का मूल आधार 'योग्यता' ही होनी चाहिए, विशेषकर चिकित्सा जैसे जीवन रक्षक क्षेत्र में। नीट-पीजी 2025 का यह नया मानदंड न केवल मेधावी छात्रों के साथ अन्याय है, बल्कि देश के स्वास्थ्य भविष्य के साथ एक खतरनाक जुआ भी है। हमें यह याद रखना होगा कि एक कमजोर नींव पर कभी एक मजबूत इमारत नहीं खड़ी की जा सकती। सरकार को इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए और सीटों के बजाय 'सक्षमता' को प्राथमिकता देनी चाहिए। चिकित्सा शिक्षा के गिरते मानकों को केवल भावनाओं के चश्मे से नहीं, बल्कि कठोर सांख्यिकीय आंकड़ों के साथ समझने की जरूरत है। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो स्पष्ट होता है कि भारत में पीजी सीटों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। लगभग 10-15 % सीटें, विशेष रूप से निजी मेडिकल कॉलेजों में 'प्री-क्लिनिकल' और 'पैरा-क्लिनिकल' विषयों की हर साल खाली रह जाती हैं। इनका वार्षिक शुल्क 25 लाख से 60 लाख रुपए तक होना ही मुख्य बाधा है।
नियामक संस्थाएं फीस संरचना को तर्कसंगत बनाने और बुनियादी ढांचे को सुधारने में अधिक रुचि ले रही हैं। यदि हम 'नेक्स्ट' जैसी परीक्षाओं की बात करते हैं, तो प्रवेश प्रक्रिया में इतनी ढील देना विरोधाभासी है। भविष्य की चुनौती केवल सीटें भरना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि ग्रामीण व दूरस्थ क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हों, जिसके लिए बेहतर वेतनमान, अनिवार्य ग्रामीण कैडर व पारदर्शी स्थानांतरण नीति जैसे प्रशासनिक सुधारों की जरूरत है। अन्यथा, हम संख्यात्मक रूप से समृद्ध होंगे, पर गुणात्मक रूप से एक बीमार स्वास्थ्य प्रणाली की ओर अग्रसर होंगे।