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अपशिष्ट प्रबंधन से ही प्रदूषण मुक्त होंगी देश की नदियां

जब तक हम अपना अपशिष्ट प्रबंधन तंत्र ठीक नहीं कर लेते, नदियों को प्रदूषण मुक्त नहीं किया जा सकता। जरूरी है कि शहरों का सीवेज प्रबंधन समुचित हो और उद्योग प्रदूषण न फैलाएं। जलवायु संकट के इस दौर में हमें यह चुनौती पहचाननी ही होगी। वर्षा की अनियमितता के कारण पानी की कमी बढ़ती जाएगी। हमें इस तनाव का प्रबंधन करना ही होगा। जलाशयों में वर्षा जल का संचय तो करना ही होगा, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जल की एक बूंद भी प्रदूषित न हो।
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Apr 28, 2022
अपशिष्ट प्रबंधन से ही प्रदूषण मुक्त होंगी देश की नदियां
अपशिष्ट प्रबंधन से ही प्रदूषण मुक्त होंगी देश की नदियां

सुनीता नारायण
सतत विकास की हरित अवधारणा की पैरोकार, सीएसई की महानिदेशक


जब तक हम अपना अपशिष्ट प्रबंधन तंत्र ठीक नहीं कर लेते, नदियों को प्रदूषण मुक्त नहीं किया जा सकता। भारत कई सालों से इसी कोशिश में लगा है कि हमारी नदियां प्रदूषित नहीं हों, लेेकिन सफलता नहीं मिल रही। जरूरी है कि शहरों का सीवेज प्रबंधन समुचित हो और उद्योग प्रदूषण न फैलाएं। जलवायु संकट के इस दौर में हमें यह चुनौती पहचाननी ही होगी। वर्षा की अनियमितता के कारण पानी की कमी बढ़ती जाएगी। हमें इस तनाव का प्रबंधन करना ही होगा। जलाशयों में वर्षा जल का संचय तो करना ही होगा, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जल की एक बूंद भी प्रदूषित न हो।
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत पाया गया कि नदियों में प्रदूषण से जंग तब तक नहीं जीती जा सकती, जब तक कि प्रत्येक भारतीय के पास शौचालय न हो, मानव मल-मूत्र विसर्जन से जुड़ा तंत्र न हो, ताकि यह प्रदूषण और खराब स्वास्थ्य का स्रोत न बने। असल एजेंडा केवल शौचालय बनाना नहीं, बल्कि ऐसा स्वच्छता तंत्र बनाना है, जो सभी के लिए उपलब्ध हो। विकास स्थाई रूप से हो, इसके लिए जरूरी है यह सबके लिए कम खर्च में उपलब्ध और समावेशी हो। हमारी असल चुनौती यही है, जो हमें अलग व प्रभावी ढंग से काम करने का अवसर देती है। अभी तक शहरी स्वच्छता थोड़ी महंगी रही है, लेकिन अलग-अलग शहरों में मल-मूत्र अपशिष्ट की स्थिति भयावह है। इसका सही निस्तारण नहीं हो रहा। इसकी एक वजह यह है कि हम अक्सर शौचालय को स्वच्छता से जोड़ देते हैं।
दरअसल, शौचालय से ही मल-मूत्र को पाइप से जुड़े नाले से बाहर कर दिया जाता है लेकिन यह पाइप सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट(एसटीपी) से जुड़ा होना जरूरी है, जो हो सकता है नहीं भी जुड़ा हो। यानी घरेलू अपशिष्ट का सुरक्षित निस्तारण नहीं हो पाता। यह अक्सर बिना किसी शोधन प्रक्रिया के पास की नदी में छोड़ दिया जाता है। यह मैला पानी ही बढ़ते प्रदूषण का कारण है। इस कारण बीमारियां भी बढ़ती हैं। बजाय महंगे भूमिगत सीवर नेटवर्क बनने का इंतजार करने के एक और रास्ता है, जिसे मल-मूत्र के निस्तारण का विकल्प माना जा सकता है। आज भारत के बहुत से मकान सैप्टिक टैंक से जुड़े हैं। अगर इन सेप्टिक टैंकों का निर्माण अच्छी तरह करवाया गया है, तो यह कीचड़ जमा कर पानी को एक गड्ढे में छोड़ देता है। जमा मल को आगे निस्तारण के लिए भेजा जा सकता है। यह व्यवस्था तभी कारगर है जबकि सेप्टिक टैंक खास तौर पर इसी के अनुरूप तैयार किया गया हो। सही तरह से निस्तारित मल को ट्रीटमेंट पॉइंट पर ले जाया जाता है, ताकि इसे पुन: इस्तेमाल के लिए सुरक्षित बनाया जा सके। मानव मल-मूत्र का रूपान्तरण कर इसे उर्वरक की तरह उपयोग कर नाइट्रोजन साइकल में बदल सकते हैं। यह ऑर्गेनिक खाद के तौर पर खेतों में काम में लिया जा सकता है या इसे ट्रीट करने के बाद अन्य ऑर्गेनिक अपशिष्ट जैसे रसोई से निकलने वाले कचरे के साथ मिलाकर बायोगैस या ईंधन बनाने के काम में लिया जा सकता है।
हम प्राचीन रोम और टोक्यो के उदाहरण से सीख सकते हैं। रोम में बड़े-बड़े जलसेतु बनाए जाते थे, जिनके जरिये निवास स्थलों तक पानी लाया जाता था। विशेषज्ञ रोम के इस जलापूर्ति तंत्र की सराहना करते आए हैं, लेकिन यही रोम का पर्यावरण कुप्रबंधन साबित हुआ। यही वहां की प्रमुख नदी टाइबर के प्रदूषण का कारण बना। घरों का अपशिष्ट बह कर नदी में मिलने के कारण अब लोगों को दूर से चल कर पानी लाना पड़ता था। इसके विपरीत जापान के पारम्परिक समाज ने अपने मल-मूत्र को नदियों में नहीं बहने दिया। इसके लिए उन्होंने इसे खाद में बदला और खेतों में उपयोग किया।
जल एवं सभ्यता साथ-साथ चलते हैं। इसलिए पानी की कमी का कारण मात्र वर्षा कम होना ही नहीं है। जल संरक्षण और उसके भंडार को साझा करने में समाज की विफलता भी एक कारण है। कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि हम तब तक अपनी नदियों का स्थाई प्रबंधन नहीं कर सकते, जब तक कि अपशिष्ट प्रबंधन को ठीक नहीं कर लेते। शुद्ध जल की उपलब्धता न केवल जल के विवेकपूर्ण प्रबंधन पर, बल्कि अपशिष्ट के समुचित प्रबंधन पर भी निर्भर है।

Published on:
28 Apr 2022 08:17 pm