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जीवंत लोक संस्कृति और सामूहिक स्मृतियों की विरासत ‘सांझी’

मिट्टी की सांझी में चिकनी मिट्टी को दीवार पर लगाकर उसे विभिन्न रंगों से सजाने की परंपरा भी मिलती है। इस विविधता में भारतीय लोककला का वह दर्शन दिखाई देता है जिसमें सृजन के लिए साधन नहीं, संवेदना महत्वपूर्ण होती है।
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Oct 01, 2026
sanjhi art
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भारत की लोकसंस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां कला केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति है। लोकजीवन में पर्व आते हैं तो उनके साथ गीत, रंग, चित्र, अनुष्ठान और सामूहिक स्मृतियां भी जीवित हो उठती हैं। ऐसी ही अद्भुत लोकपरंपराओं में 'सांझी' का स्थान विशिष्ट है। यह एक ओर राधा-कृष्ण की भक्ति से जुड़ी कलात्मक अभिव्यक्ति है, तो दूसरी ओर बेटियों की सृजनशीलता, पारिवारिक संस्कार और सामुदायिक सहभागिता का सुंदर उत्सव भी है। मेवाड़, वागड़ व ब्रज सहित सभी अंचल में पितृपक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक सांझी बनाने की परंपरा रही है। संध्या समय घरों और मंदिरों में सांझी सजती है और उसके साथ आरती तथा पूजा का क्रम चलता है। सांझी के माध्यम से बालिकाएं और महिलाएं अपनी कल्पना, श्रद्धा और कलात्मक कौशल को आकार देती हैं। यही कारण है कि सांझी को केवल लोकचित्र या सजावटी कला मानना उसके व्यापक सांस्कृतिक अर्थ को सीमित करना होगा।

सांझी की विशेषता इसकी सहजता है। इसके लिए महंगे साधनों की आवश्यकता नहीं होती। गोबर, मिट्टी, फूल-पत्तियां, रंगीन कागज, केले के पत्ते, रंगोली और उपलब्ध प्राकृतिक सामग्री से सांझी का संसार रचा जाता है। कहीं दीवारों पर गोबर से आकृतियां उकेरी जाती हैं, कहीं जमीन पर रंगोली सजती है, तो कहीं जल में तैरती आकृतियों के माध्यम से सांझी का नया रूप सामने आता है। गोबर की सांझी में गाय के गोबर के साथ फूल, रंगीन कागज और माली के पत्तों का प्रयोग किया जाता है। मिट्टी की सांझी में चिकनी मिट्टी को दीवार पर लगाकर उसे विभिन्न रंगों से सजाने की परंपरा भी मिलती है। इस विविधता में भारतीय लोककला का वह दर्शन दिखाई देता है जिसमें सृजन के लिए साधन नहीं, संवेदना महत्वपूर्ण होती है। सांझी की खूबसूरती यह भी है कि यह एक दिन में समाप्त होने वाली कला नहीं। पितृपक्ष के दिनों में प्रतिदिन अलग-अलग सांझी बनाई जाती है। सांझी के माध्यम से ब्रज की स्मृतियां, राधा-कृष्ण की लीलाएं, प्रकृति और लोकजीवन के विविध रूप सामने आते हैं। कहीं यमुना दिखाई देती है, कहीं वृंदावन, कहीं गोवर्धन, कहीं कुंड, कहीं राधा-कृष्ण की लीला व कहीं हरियाली तथा प्राकृतिक दृश्य। इस प्रकार सांझी एक तरह की लोकचित्रात्मक कथा बन जाती है, जिसमें धार्मिक आख्यान और लोककल्पना एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। केले के पत्तों से बनने वाली सांझी भी इसी परंपरा का आकर्षक पक्ष है।

यह कला बताती है कि लोकजीवन में प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि सृजन की सहयात्री है। सांझी की परंपरा का सबसे भावपूर्ण पक्ष इसका बालिकाओं और महिलाओं से जुड़ाव है। बालिकाएं इसे बनाती हैं, सजाती हैं, पूजा करती हैं व लोकगीतों के माध्यम से भावनाएं व्यक्त करती हैं। यह किसी औपचारिक कला विद्यालय में नहीं सीखी जाती। मां से बेटी, दादी से पोती और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इसका हस्तांतरण होता है।आज शहरीकरण, बदलती जीवनशैली, आधुनिक मनोरंजन के साधनों और पारंपरिक कलाओं से नई पीढ़ी की बढ़ती दूरी के कारण अनेक लोकपरंपराएं धीरे-धीरे सीमित होती जा रही हैं। सांझी भी इस चुनौती से अछूती नहीं है। सांझी को बचाना केवल एक कला को बचाना नहीं है। इसके साथ लोकगीत, प्रकृति से जुड़ाव, सामूहिक स्मृति भी जुड़ी हुई है। जरूरत है कि स्कूल-कॉलेजों के माध्यम से सांझी कार्यशालाएं आयोजित हों। कलाकारों को मंच मिले, दस्तावेजीकरण हो और डिजिटल माध्यमों पर इसकी विधियों तथा लोकगीतों को सुरक्षित किया जाए।

सेवानिवृत्त शिक्षा अधिकारी

Updated on:
01 Oct 2026 06:19 pm
Published on:
01 Oct 2026 06:19 pm