
हरित क्रांति से लेकर जलवायु-अनुकूल खेती तक, भारतीय कृषि की लगभग हर बड़ी उपलब्धि के पीछे वैज्ञानिक अनुसंधान की छाप दिखाई देती है। लेकिन आज सवाल केवल अधिक उत्पादन का नहीं है, बल्कि यह है कि बदलती जलवायु, घटते प्राकृतिक संसाधनों और बढ़ती आबादी के बीच खेती को टिकाऊ, लाभकारी और भविष्य के अनुकूल कैसे बनाया जाए। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) की स्थापना के 98वें वर्ष में यही सवाल उसके सम्मुख प्रमुख चुनौती के रूप में उपस्थित हैं।
पिछले एक दशक में कृषि क्षेत्र ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। खाद्यान्न उत्पादन में लगभग 49 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि बागवानी, पशुपालन और मत्स्य क्षेत्र ने भी तेज रफ्तार से विस्तार किया है। इसका अर्थ केवल अधिक अनाज या फल-सब्जियां पैदा होना नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नए अवसरों का सृजन भी है। आज कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों का आर्थिक योगदान पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो चुका है। इस सफलता का बड़ा आधार कृषि विज्ञान में हुआ निवेश है। हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में ऐसी फसल किस्में विकसित की गई हैं, जो सूखा, बाढ़, खारेपन और बढ़ते तापमान जैसी चुनौतियों का सामना कर सकती हैं। इनमें वे पोषण-संपन्न किस्में भी शामिल हैं, जो उत्पादन बढ़ाने के अलावा कुपोषण जैसी समस्या से लडऩे में भी सहायक हैं। यह बदलाव इस सोच का परिणाम है कि कृषि का उद्देश्य केवल पेट भरना नहीं, बल्कि बेहतर पोषण उपलब्ध कराना भी है। पशुपालन के क्षेत्र में भी तस्वीर तेजी से बदली है। पशुओं के लिए स्वदेशी टीकों का विकास, नई नस्लों का संरक्षण और जीन विज्ञान में हुई प्रगति ने इस क्षेत्र को नई दिशा दी है। दूध और मांस में मिलावट पहचानने वाली स्वदेशी तकनीकें तथा पशु रोगों पर नियंत्रण की बेहतर व्यवस्था न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक हैं, बल्कि उपभोक्ताओं के हितों की भी रक्षा करती हैं। समुद्री मत्स्य पालन में एआइ और दूसरी नई तकनीकों का उपयोग यह संकेत देता है कि कृषि अब पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के संगम की ओर बढ़ रही है।
फिर भी उपलब्धियों के इस चमकदार परिदृश्य के पीछे कई गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं। भारत के अधिकांश किसानों के पास छोटी और बिखरी हुई जोत है। भूजल का लगातार गिरता स्तर, मिट्टी के उपजाऊपन में कमी, जैव विविधता का क्षरण और जलवायु परिवर्तन खेती में जोखिम को पहले से अधिक बढ़ा रहे हैं। अनियमित मानसून, अचानक आने वाली बाढ़ या लंबे सूखे जैसी घटनाएं अब अपवाद नहीं, बल्कि नई वास्तविकता बनती जा रही हैं। ऐसे समय में केवल उत्पादन बढ़ाने की रणनीति पर्याप्त नहीं होगी। खेती को संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने वाली, पर्यावरण के अनुकूल और जलवायु-सहिष्णु बनाना ही भविष्य का रास्ता है। भविष्य की खेती मानसून के भरोसे नहीं, बल्कि सटीक सिंचाई, जलग्रहण प्रबंधन, भूजल पुनर्भरण और एआइ आधारित मौसम पूर्वानुमान जैसी तकनीकों पर अधिक निर्भर होगी। कम पानी और कम रसायनों के साथ अधिक उत्पादन करना ही आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी कसौटी होगी।
कृषि में बदलाव का एक महत्वपूर्ण पक्ष मानव संसाधन भी है। नई तकनीकें तभी सफल होंगी, जब किसान उन्हें अपनाने के लिए प्रशिक्षित और तैयार होंगे। कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों और युवा उद्यमियों की भूमिका इसलिए लगातार बढ़ रही है। कृषि अब केवल खेती तक सीमित पेशा नहीं रही। इसमें स्टार्टअप, ड्रोन, डिजिटल सेवाएं, जैव-प्रौद्योगिकी, खाद्य प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन जैसे नए अवसर तेजी से उभर रहे हैं। ग्रामीण भारत में रोजगार के नए द्वार भी इसी परिवर्तन से खुल सकते हैं। हाल के वर्षों में अनुसंधान से विकसित तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने के प्रयास तेज हुए हैं, क्योंकि किसी भी वैज्ञानिक उपलब्धि का वास्तविक मूल्य तभी है, जब उसका लाभ किसान तक पहुंचे। भारतीय कृषि अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ गुणवत्ता, पोषण, निर्यात, खाद्य प्रसंस्करण और पर्यावरण संरक्षण को समान महत्व देना होगा।
विकसित भारत 2047 का सपना केवल अधिक अनाज पैदा करने से पूरा नहीं होगा। इसके लिए ऐसी कृषि व्यवस्था बनानी होगी जो किसानों की आय बढ़ाए, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करे और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारतीय कृषि को नई पहचान दिलाए। इस लक्ष्य की प्राप्ति में सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों और किसानों की साझेदारी जितनी आवश्यक है, उतनी ही निजी क्षेत्र, कृषि स्टार्टअप और नवाचार आधारित उद्यमों की भागीदारी भी। अनुसंधान को प्रयोगशाला से खेत तक और खेत से बाजार तक पहुंचाने की पूरी शृंखला को मजबूत करना होगा। विज्ञान और अनुसंधान नि:संदेह भारतीय कृषि की दिशा बदल रहे हैं। लेकिन आने वाले वर्षों की सफलता केवल नई तकनीकें विकसित करने में नहीं, बल्कि उन्हें हर छोटे किसान तक पहुंचाने में निहित होगी। अनुसंधान, नवाचार और नीति के इस समन्वय से भारतीय कृषि केवल आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि विश्व के लिए एक टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल विकास मॉडल बन रही है। यही वैज्ञानिक सोच, नवाचार और किसान-केंद्रित नीतियों का समन्वय भारतीय कृषि को समृद्ध, टिकाऊ और आने वाली पीढिय़ों के लिए सुरक्षित बनाने की दिशा में निर्णायक कदम साबित होगा।