दार्शनिक दृष्टि से देखें तो मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष स्वयं से होता है। हम अपनी 'असली इच्छा' से डरते हैं। जानते हैं क्यों? क्योंकि यदि हमने सच में खुद को सुन लिया तो संभव है कि हमें कुछ बदलना पड़े।
मनुष्य का जीवन बाहर से जितना स्पष्ट दिखता है, भीतर से उतना ही जटिल होता है। हम चलते हैं, काम करते हैं, रिश्ते निभाते हैं, निर्णय लेते हैं और धीरे-धीरे मान लेते हैं कि यही हमारी जिंदगी है। पर कभी किसी शांत क्षण में, जब आस-पास की आवाजें धीमी पड़ जाती हैं, एक प्रश्न भीतर उठता है, 'क्या यह जीवन सच में मेरा है? या यह किसी और की उम्मीदों का विस्तार है?' जन्म लेते ही हम संबंधों के जाल में प्रवेश करते हैं।
परिवार, समाज, परंपराएं, मान्यताएं… सब हमें आकार देने लगते हैं। कोई हमें बताता है कि सफल होना क्या है, कोई सिखाता है कि अच्छा इंसान कौन है, कोई तय करता है कि हमें किस दिशा में चलना चाहिए। बचपन में यह मार्गदर्शन आवश्यक भी होता है। पर असल समस्या तब शुरू होती है जब मार्गदर्शन धीरे-धीरे निर्देश बन जाता है और निर्देश पहचान।
हमारी बहुत-सी चाहतें उधार की होती हैं। जैसे- हमने देखा कि अमुक व्यक्ति को सम्मान मिला तो इच्छा हुई कि हमें भी वैसा सम्मान चाहिए। हमने सुना कि फलां उपलब्धि महान है तो हम भी उसी को महान मान लेते हैं। धीरे-धीरे हमारे सपने भी तुलना की मिट्टी से बनने लगते हैं। हम अपने भीतर नहीं झांकते, बाहर देखते हैं और बाहर से ही तय करते हैं कि हमें क्या बनना है।
सबसे कठिन काम है स्वयं को सुनना क्योंकि भीतर की आवाज धीमी होती है। वह भीड़ में नहीं चिल्लाती। वह आदेश नहीं देती, बस संकेत देती है, लेकिन हम इतने अभ्यस्त हो चुके हैं बाहरी आवाजों पर प्रतिक्रिया देने के कि भीतर की फुसफुसाहट अनसुनी रह जाती है। दार्शनिक दृष्टि से देखें तो मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष स्वयं से होता है। हम अपनी 'असली इच्छा' से डरते हैं। जानते हैं क्यों? क्योंकि यदि हमने सच में खुद को सुन लिया तो संभव है कि हमें कुछ बदलना पड़े।
शायद हमें यह मानना पड़े कि जो हमने अब तक चाहा, वह सच में हमारा नहीं था। कई लोग पूरी उम्र यह सोचते हुए गुजार देते हैं कि वे अपने लिए जी रहे हैं, पर अंत में उन्हें लगता है कि उन्होंने बस अपेक्षाएं पूरी कीं। अपेक्षाएं पूरी करना गलत नहीं है; हम संबंधों में बंधे हैं, लेकिन अपेक्षाओं के बीच हमारी इच्छा पूरी तरह दब जाए तो जीवन बोझ बन जाता है।
स्वयं की आवाज सुनने का पहला कदम है- रुकना। कुछ देर के लिए तुलना से बाहर आना। कुछ देर के लिए 'लोग क्या कहेंगे' को शांत करना और स्वयं से ईमानदारी से पूछना- मैं क्या महसूस कर रहा हूं या रही हूं? हो सकता है उत्तर तुरंत न मिले। हो सकता है भीतर केवल भ्रम हो, पर प्रश्न पूछना ही जागरूकता की शुरुआत है। जब इच्छा स्पष्ट होती है, तब जीवन में शांति आती है। जीवन का सार यही है- उधार के सपनों को धीरे-धीरे लौटाते हुए, आदतों की परतें हटाते हुए, अपेक्षाओं के शोर से गुजरते हुए, एक दिन अपनी सच्ची आवाज तक पहुंच जाना।