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सिल्वर इकोनॉमी – बुजुर्गों की देखभाल को केवल बाजार न समझें

बुजुर्गों के लिए आवासीय परिसरों (सीनियर केयर होम्स) की सख्त आवश्यकता है, जहां न केवल उन्हें आवास, भोजन, सामान्य चिकित्सा सेवाएं, देखभाल और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों, बल्कि सामुदायिक जीवन (कम्युनिटी लिविंग) के जरिए उनके अकेलेपन को भी दूर किया जा सके। वे जीवन के अंतिम चरण में अपने हमउम्र लोगों के सानिध्य में सम्मानपूर्वक समय व्यतीत कर सकें।
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May 07, 2026
Senior citizen protection

आर.के. विजय
(लेखक नेशनल इंश्योरेंस कंपनी में वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं)

वैश्विक स्तर पर बुजुर्गों की तेजी से बढ़ती संख्या एक अहम सामाजिक सरोकार ही नहीं, बल्कि नीति-निर्धारकों के लिए भी बड़ी चुनौती है। भारत में भी बदलते सामाजिक तथा आर्थिक परिवेश के चलते बहुत से बुजुर्गों की समुचित देखभाल का अभाव चिंता का विषय बनता जा रहा है। नीति आयोग के वर्ष 2024 में जारी पेपर ‘सीनियर केयर रिफॉम्र्स इन इंडिया’ के अनुसार भारत में 60 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों की आबादी करीब 10.4 करोड़ है। यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन फंड के अनुसार वर्ष 2050 तक यह संख्या 31.9 करोड़ (कुल जनसंख्या का 19.5 प्रतिशत) तक पहुंचने का अनुमान है।

संयुक्त परिवार व्यवस्था के लगभग ध्वस्त हो जाने तथा बच्चों के शिक्षा, रोजगार और विवाह आदि कारणों से होने वाले प्रवासन (माइग्रेशन) के बीच बहुत से बुजुर्ग अकेले जीवन बिताने को विवश हैं। आर्थिक रूप से सक्षम बुजुर्गों की देखभाल सिल्वर इकोनॉमी के जरिए कुछ हद तक संभव हो पाती है। बुजुर्गों की विशिष्ट जरूरतों, उपभोग और क्रय-क्षमता को लक्षित करने वाली आर्थिक प्रणाली को सिल्वर इकोनॉमी कहा जाता है। यह व्यावसायिक व्यवस्था बुजुर्गों को आश्रितों के बजाय सक्रिय उपभोक्ता के रूप में देखती है तथा उनकी आवश्यकताओं को एक बड़े अवसर और बाजार के रूप में प्रस्तुत करती है। इसका लक्षित समूह मुख्यत: आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग है। नीति आयोग के पेपर के अनुसार भारत में वर्ष 2024 में सिल्वर इकोनॉमी का आकार लगभग 73,082 करोड़ रुपए था। एक अन्य अनुमान के अनुसार वर्ष 2030 तक इसके 4,50,000 करोड़ रुपए से अधिक होने की संभावना है।
ऐसे बुजुर्गों के लिए आवासीय परिसरों (सीनियर केयर होम्स) की सख्त आवश्यकता है, जहां न केवल उन्हें आवास, भोजन, सामान्य चिकित्सा सेवाएं, देखभाल और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों, बल्कि सामुदायिक जीवन (कम्युनिटी लिविंग) के जरिए उनके अकेलेपन को भी दूर किया जा सके। वे जीवन के अंतिम चरण में अपने हमउम्र लोगों के सानिध्य में सम्मानपूर्वक समय व्यतीत कर सकें। दुर्भाग्य से सिल्वर इकोनॉमी का इस क्षेत्र की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि आतिथ्य सत्कार उद्योग (हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री) को इसमें निवेश अधिक और आय कम होने की आशंका है, इसलिए अब तक इस दिशा में व्यापक स्तर पर पहल नहीं हो सकी है।
पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के जरिए इस समस्या का काफी हद तक समाधान किया जा सकता है। ऐसे परिसरों की स्थापना के लिए सरकार निशुल्क अथवा नाममात्र की दरों पर जमीन उपलब्ध कराए, जबकि इनका संचालन करने वाले उद्यमी मूलभूत ढांचा तैयार करें। इन परिसरों में उपलब्ध आवासों को दो भागों में बांटा जा सकता है। एक बड़ा हिस्सा उन बुजुर्गों के लिए पूर्णत: व्यावसायिक आधार पर संचालित हो, जो सुविधाओं का निर्धारित शुल्क चुका सकें। वहीं दूसरा हिस्सा बड़ी हाउसिंग सोसायटियों में अल्प आय वर्ग के लिए आरक्षित आवासों की तर्ज पर कम संसाधनों वाले बुजुर्गों के लिए रियायती (सब्सिडाइज्ड) शुल्क पर उपलब्ध कराया जाए। आर्थिक रूप से कमजोर बुजुर्गों को दी जाने वाली सुविधाओं के लिए सरकार कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) फंड्स को इस दिशा में मोडऩे के प्रभावी उपाय कर सकती है।

व्यावसायिक गतिविधियों के जरिए धनार्जन के साथ व्यवसाय जगत की कुछ सामाजिक जिम्मेदारियां भी होती हैं। हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री को फिलहाल सीनियर केयर होम्स में भले ही आशानुरूप लाभ प्राप्त न हो, लेकिन सामाजिक जिम्मेदारियों को देखते हुए ऐसे अधिक से अधिक होम्स स्थापित करने के ईमानदार प्रयास होने चाहिए। निकट भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए भारत में व्यावसायिक आधार पर संचालित सीनियर केयर होम्स उद्योग भी लाभप्रद साबित होगा, ऐसी आशा की जा सकती है।

Updated on:
10 May 2026 02:28 pm
Published on:
07 May 2026 05:16 pm