
अरुण जोशी,(दक्षिण एशियाई कूटनीतिक मामलों के जानकार)
दुनिया को यह जानना चाहिए कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में क्या हो रहा है, लेकिन वर्तमान में वहां की जमीनी हकीकत को देखने का कोई जरिया नहीं है। दर्जनों लोग मारे जा चुके हैं और अनगिनत अन्य घायल हैं, जबकि सैकड़ों लापता लोगों का कोई पता नहीं है। यह तब हो रहा है जब पाकिस्तान इन कब्जाए गए क्षेत्रों में विधानसभा चुनावों का ढोंग रच रहा है। लोगों ने चुनावों का बहिष्कार किया है और पाकिस्तानी सेना यह सुनिश्चित कर रही है कि पाकिस्तानी हुकूमत के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने वालों को गोलियों से चुप करा दिया जाए, जबकि बहिष्कार करने वालों को बाहरी दुनिया से छिपाया गया है।
यह पाकिस्तानी कब्जे के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों को खत्म करने का एक सुनियोजित अभियान है। पाकिस्तान की कब्जा करने वाली सेना वही कर रही है जो वह हमेशा से करना चाहती थी। अत्यधिक दमन के साथ विद्रोह की आवाजों को कुचलना, लोगों को उनकी पहचान और गरिमा के साथ जीने के बुनियादी अधिकार से वंचित करना। हालांकि, जो बात वास्तव में हैरान करने वाली है, वह है आम जनता, पुरुषों, महिलाओं और बच्चों पर किए जा रहे इन अत्याचारों पर वैश्विक समुदाय की चुप्पी। क्या यह चुप्पी जानबूझकर है, या सरासर अज्ञानता के कारण? इसका ईमानदार जवाब यह है कि यह जानबूझकर और सोची-समझी है। हाल के महीनों में, सोशल मीडिया और अन्य वैकल्पिक चैनलों के माध्यम से जो जानकारी सार्वजनिक डोमेन में आई है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। अपने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के लिए प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोलियां चलाई गईं। 100 से अधिक लोग मारे गए और घायल तथा गिरफ्तार लोगों की कोई आधिकारिक गिनती नहीं है। संचार माध्यमों पर प्रतिबंध के कारण नुकसान के सटीक पैमाने का निर्धारण करना मुश्किल हो गया है। पाकिस्तान ने पूरे क्षेत्र को प्रेस के लिए प्रतिबंधित घोषित कर दिया है। हालांकि, यह सेंसरशिप कई सवाल भी खड़े करती है कि जम्मू और कश्मीर के उसके द्वारा अवैध रूप से कब्जाए गए क्षेत्रों में पाकिस्तानी सेना द्वारा शुरू किए गए इस खूनी अभियान के लिए और कौन जिम्मेदार है।
भारत के लिए यह शुरू से ही स्पष्ट था कि पाकिस्तान को केवल जम्मू और कश्मीर की जमीन में दिलचस्पी है और उसे वहां के लोगों से कोई प्यार नहीं है, जिसमें वे क्षेत्र भी शामिल हैं जिन्हें उसने अक्टूबर 1947 में रियासत पर आक्रमण करने के बाद अपने कब्जे में ले लिया था। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से पश्चिम और इस्लामिक दुनिया, हमेशा पाकिस्तान के नैरेटिव के साथ रहा है। आत्मनिर्णय के अधिकार की कल्पना करने वाले संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों की बड़ी तस्वीर को कभी पूरी तरह से नहीं दिखाया गया। पाकिस्तान ने शुरुआती आक्रमण के बाद कब्जाए गए क्षेत्रों से अपने सभी सैनिकों और नागरिकों को वापस बुलाने की अनिवार्य पूर्व-शर्त का कभी पालन नहीं किया, जिसके कारण अंतत: हिमालयी क्षेत्र में पूर्ण युद्ध हुआ। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसके दीर्घकालिक परिणामों को पूरी तरह समझे बिना संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से हुए संघर्ष विराम को स्वीकार कर लिया था। नेहरू ने एक रणनीतिक भूल की जब उन्होंने जनमत संग्रह के सिद्धांत पर सहमति जताई। इस बात से परे कि क्या पाकिस्तान ने कभी समझौते के अपने हिस्से को पूरा किया, नेहरू कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने और इसे संयुक्त राष्ट्र के रिकॉर्ड में एक स्थायी अंतरराष्ट्रीय विवाद के रूप में छोडऩे के दोष से बच नहीं सकते। कश्मीर ने उस रणनीतिक और कूटनीतिक भूल की भारी कीमत चुकाई और अब पीओके के लोगों को भी ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि पाकिस्तान एक के बाद एक अत्याचार कर रहा है।
जम्मू और कश्मीर के कब्जाए गए क्षेत्रों में भयानक परिस्थितियों के लिए सीधे तौर पर पाकिस्तान जिम्मेदार है, जहां लोगों को शारीरिक और मनोवैज्ञानिक दोनों रूपों में व्यवस्थित रूप से तोड़ा जा रहा है। इसके अलावा, क्षेत्र को आधिकारिक तौर पर प्रतिबंधित घोषित किए जाने से बहुत पहले से ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया पीआके से रिपोर्ट करने में संकोच कर रहा था। वह विरोध प्रदर्शनों के पीछे की सच्चाई और उस क्रूरता को उजागर करने के लिए अत्यधिक अनिच्छुक था, जिसके साथ पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स ने उनसे निपटा। वैश्विक प्रेस ने बुनियादी अधिकारों और राजनीतिक स्वायत्तता की मांग करने वाले लोगों की दुर्दशा पर आंखें मूंद लीं, वे अधिकार जिन्हें 'आजाद कश्मीरÓ के भ्रामक नामकरण के तहत उन्हें देने का वादा किया गया था। क्रूर सच्चाई यह है कि उनके साथ कभी भी स्वतंत्र नागरिकों जैसा व्यवहार नहीं किया गया, बल्कि उन्हें पाकिस्तानी हुकूमत द्वारा कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने के मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया गया। पाकिस्तान के लिए, 1947 के विभाजन के बाद से, कश्मीर का मुद्दा केवल भारतीय नियंत्रण रेखा (एलओसी) की तरफ कश्मीर घाटी की जमीन सुरक्षित करने के बारे में रहा है। इसने अंतिम समाधान तक स्वायत्तता का भ्रम पैदा करने के लिए लगातार 'आजाद कश्मीरÓ शब्द का एक भ्रामक राजनीतिक बयान के रूप में हथियार के रूप में इस्तेमाल
किया है। जमीन पर मौजूद तथ्य पूरी तरह से अलग कहानी कहते हैं। पाकिस्तान ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय समुदाय और जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के सामने एक विकृत तस्वीर पेश की है ताकि उसके द्वारा अवैध रूप से कब्जाए गए क्षेत्रों को एक ऐसे स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में दिखाया जा सके जहां मुस्लिम आबादी को पूर्ण धार्मिक और राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त है।विडंबना यह है कि जमीनी हकीकत की जांच करने के बजाय, पश्चिमी शक्तियों और उनके मीडिया ने पूरी तरह से इस झांसे को स्वीकार कर लिया। यह काफी हद तक भू-राजनीतिक पक्षपात और इस तथ्य के कारण था कि पाकिस्तान ऐतिहासिक रूप से पश्चिमी हितों के प्रति नरम रहा है। आज, उस समझौतावादी दृष्टिकोण ने पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू और कश्मीर में एक गहरा राजनीतिक और मानवीय संकट पैदा कर दिया है। यदि पाकिस्तानी सेना पीओके के लोगों पर बिना किसी डर के अत्याचार करना जारी रखती है, तो उस जिम्मेदारी का एक बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर पश्चिम और उसके मूक मीडिया पर है। पीओके में घटनाओं की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच तथा वहां के लोगों की आवाज को सामने लाना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्राथमिकता होनी चाहिए।