
के.एस. तोमर, (सामरिक मामलों के स्तंभकार और वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक)
भारत में चुनावी राजनीति का स्वरूप हर दशक में बदलता रहा है। अब एक नया दौर सामने है, जहां कुछ सेकंड की इंस्टाग्राम रील, यूट्यूब शॉर्ट या वायरल मीम लाखों लोगों तक पलभर में पहुंचकर राजनीतिक विमर्श की दिशा बदल सकता है। इसलिए यह प्रश्न अब गंभीर बहस का विषय बन चुका है कि क्या 2029 का लोकसभा चुनाव वास्तव में देश का पहला 'सोशल मीडिया चुनाव' साबित होगा? परीक्षा अनियमितताओं को लेकर 'कॉकरोच जनता पार्टी' के आंदोलन ने इस बदलाव की झलक दिखा दी है। बिना किसी बड़े राजनीतिक संगठन, विशाल संसाधनों या पारंपरिक नेतृत्व के यह अभियान सोशल मीडिया के सहारे पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया। व्यंग्य, हास्य और छोटे वीडियो ने ऐसी जनभागीदारी पैदा की कि स्थापित राजनीतिक दलों और मुख्यधारा के मीडिया को भी इस पर प्रतिक्रिया देनी पड़ी। इससे स्पष्ट संकेत मिला कि डिजिटल युग में कई बार कथा (नैरेटिव) संगठन से पहले दौडऩे लगती है।
भारतीय चुनावों में प्रचार का तरीका तेजी से बदल रहा है। विशाल रैलियां, पोस्टर, बैनर अब भी मौजूद हैं, लेकिन मतदाता तक सबसे पहले पहुंचने का माध्यम बदल चुका है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब, वाट्सएप चैनल, फेसबुक और अन्य डिजिटल मंच आज राजनीतिक दलों के लिए सबसे तेज संचार तंत्र बनते जा रहे हैं। देश में करोड़ों युवा मतदाता डिजिटल दुनिया में रहते हैं। राजनीतिक संदेश अब भाषणों से अधिक छोटे वीडियो, ग्राफिक्स और मीम्स के माध्यम से लोगों तक पहुंच रहे हैं। भारत में संगठित डिजिटल राजनीतिक अभियान की शुरुआत सबसे प्रभावी ढंग से भाजपा ने की। उसने बहुत पहले सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों, प्रशिक्षित स्वयंसेवकों, सोशल मीडिया प्रभावकों और बूथ स्तर तक फैले वाट्सएप नेटवर्क का विशाल ढांचा तैयार कर लिया था। परिणामस्वरूप वह ऑनलाइन राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने में सफल रही। भाजपा की विशेषता केवल तकनीकी निवेश नहीं रही, बल्कि उसका मजबूत संगठन भी रहा जिसने डिजिटल संदेशों को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही कारण है कि उसकी ऑनलाइन और ऑफलाइन मशीनरी एक-दूसरे की पूरक बन गई।
हालांकि अब स्थिति पहले जैसी नहीं रही। विपक्षी दलों और नेताओं ने भी डिजिटल माध्यमों की ताकत को समझना शुरू कर दिया है।
इंस्टाग्राम रील, पॉडकास्ट, लाइव सत्र और यूट्यूब कार्यक्रमों के जरिये वे मतदाताओं से संवाद स्थापित कर रहे हैं। सोशल मीडिया ने अपेक्षाकृत छोटे दलों और नए चेहरों को भी अवसर दिया है कि वे सीमित संसाधनों के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें। यदि कोई संदेश लोगों की भावनाओं को छू ले, तो उसका प्रसार संगठनात्मक क्षमता से कहीं अधिक तेज हो सकता है। आज यह केवल राजनीतिक दल नहीं तय करते कि जनता क्या देखेगी। सोशल मीडिया मंचों के एल्गोरिदम यह निर्धारित करते हैं कि किस व्यक्ति तक कौन-सा संदेश पहुंचे, कितनी बार दिखाई दे और किस शैली में प्रस्तुत हो। राजनीतिक दल अब अलग-अलग आयु वर्ग, भाषा, क्षेत्र और सामाजिक समूहों के अनुसार अलग सामग्री तैयार कर रहे हैं। लक्ष्य अब अधिकतम प्रसारण नहीं, बल्कि अधिकतम ध्यान आकर्षित करना है।
यही कारण है कि भावनात्मक अपील, दृश्य प्रभाव और संक्षिप्त संदेश चुनावी रणनीति का अनिवार्य हिस्सा बनते जा रहे हैं। यह धारणा अब पुरानी हो चुकी है कि सोशल मीडिया केवल महानगरों की राजनीति को प्रभावित करता है। आज किसी महानगर में बनाई गई रील भी छोटे कस्बों और दूरस्थ गांवों तक पहुंच जाती है। वहां वही वीडियो चाय की दुकानों, पंचायत बैठकों, कॉलेज परिसरों और स्थानीय बाजारों में चर्चा का विषय बन जाता है। प्रवासी कामगार, विद्यार्थी, छोटे व्यापारी और स्थानीय युवा स्वयं राजनीतिक सामग्री के प्रसारक बन गए हैं। इसलिए राजनीतिक दल अब सोशल मीडिया अभियान को बूथ प्रबंधन और स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ जोडऩे की रणनीति पर काम कर रहे हैं। सोशल मीडिया जितने अवसर लेकर आया है, उतनी ही गंभीर चुनौतियां भी सामने खड़ी हैं। एआइ से तैयार डीपफेक वीडियो, झूठी सूचनाएं, संपादित क्लिप और संगठित दुष्प्रचार चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। एल्गोरिदम प्राय: तथ्यों से अधिक सनसनी और भावनात्मक सामग्री को बढ़ावा देते हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए केवल डिजिटल प्रचार पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें तथ्य-जांच, त्वरित प्रतिक्रिया, साइबर सुरक्षा और विश्वसनीय सूचना तंत्र भी विकसित करना होगा। भविष्य की राजनीति में भरोसा सबसे मूल्यवान पूूंजी बन सकता है।
यह कहना कठिन है कि 2029 का लोकसभा चुनाव पूरी तरह सोशल मीडिया से जीता जाएगा, लेकिन इतना निश्चित है कि चुनावी रणनीति का केंद्र अब डिजिटल मंच बन चुके हैं। भाजपा के पास अभी भी व्यापक संगठनात्मक नेटवर्क है, पर उसकी डिजिटल बढ़त को विपक्ष चुनौती देने लगा है। विपक्ष यह समझ चुका है कि प्रभावी डिजिटल नैरेटिव कई बार संसाधनों की कमी की भरपाई कर सकता है। फिर भी भारतीय चुनाव केवल मोबाइल स्क्रीन पर तय नहीं होंगे। स्थानीय नेतृत्व, बूथ प्रबंधन, उम्मीदवार की स्वीकार्यता, सरकार का प्रदर्शन और सामाजिक समीकरण आगे भी निर्णायक बने रहेंगे। लेकिन एक बड़ा परिवर्तन हो चुका है- मतदाता मतदान केंद्र तक पहुंचने से पहले अपनी राय का बड़ा हिस्सा अब मोबाइल स्क्रीन पर बना रहा है। संभव है कि इतिहास 2029 को उस चुनाव के रूप में याद करे, जब एल्गोरिदम और डिजिटल प्रचार के नए रूप देखने को मिले।