वर्ष 2025 में अमरीका की नई सरकार की ओर से भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगाया जाना रुपए के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ। इस वर्ष वैश्विक निवेशकों का व्यवहार भी अनिश्चित रहा है।
-विजय गर्ग, आर्थिक विशेषज्ञ, भारतीय एवं विदेशी कर प्रणाली के जानकार
वर्ष 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ, तब 3.3 भारतीय रुपए एक अमरीकी डॉलर के बराबर थे। बीते 78 वर्षों में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। डॉलर लगातार मजबूत हुआ है और भारतीय रुपया धीरे-धीरे कमजोर होता गया। विडंबना यह है कि जिस दौर में रुपया डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक दबाव में है, उसी समय यूरो और ब्रिटिश पाउंड जैसी मुद्राएं मजबूती दिखा रही हैं। जब भारत 'विकसित भारत @2047' के अपने महासंकल्प की ओर अग्रसर है, तब वैश्विक वित्तीय गलियारों में भारतीय रुपया एक कठिन और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपए का 90-91 के ऐतिहासिक निचले स्तर तक पहुंचना केवल एक आंकड़ों की गिरावट नहीं है। यह बदलती वैश्विक कूटनीति, व्यापारिक टकराव और घरेलू आर्थिक प्राथमिकताओं का संयुक्त और जटिल प्रतिबिंब है।
वर्ष 2025 में रुपए की गिरावट के पीछे मुख्य रूप से एक 'त्रिस्तरीय संकट' सक्रिय दिखाई दिया। पहला, अमरीकी आर्थिक और व्यापारिक नीतियां। दूसरा, विदेशी निवेश का भारत से पलायन और तीसरा, आयात का लगातार बढ़ता बोझ। वर्ष 2025 में अमरीका की नई सरकार की ओर से भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगाया जाना रुपए के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ। इस वर्ष वैश्विक निवेशकों का व्यवहार भी अनिश्चित रहा है। भारत में सोने के प्रति गहरा सांस्कृतिक लगाव भी इस समस्या को बढ़ाता है। वर्ष 2025 में जब सोने की कीमतें 1.40 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम के पार पहुंचीं तो सोने का आयात भारत के लिए एक बड़ा आर्थिक बोझ बन गया। सोने के आयात के लिए भारी मात्रा में डॉलर बाहर भेजने पड़ते हैं, जिससे चालू खाता घाटा बढ़ता है। चालू खाता घाटा बढऩे का अर्थ है, रुपए की बुनियाद का कमजोर होना। एक आम भ्रांति यह है कि रुपया केवल इसलिए गिर रहा है, क्योंकि डॉलर बहुत मजबूत हो गया है, लेकिन वर्ष 2025 के आंकड़े एक अलग कहानी कहते हैं।
इस वर्ष अमरीकी डॉलर इंडेक्स (डीएक्सवाइ) में वास्तव में गिरावट देखी गई है। जहां डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगभग 5-6 प्रतिशत कमजोर हुआ है, वहीं यूरो लगभग 12 प्रतिशत और ब्रिटिश पाउंड करीब 7 प्रतिशत तक मजबूत हुए हैं। इंडोनेशियाई रुपियाह और फिलीपींस पेसो जैसी एशियाई मुद्राओं के मुकाबले भी भारतीय रुपया कमजोर प्रदर्शन करता दिख रहा है। वैसे सरकार और आरबीआइ की इस स्थिति पर पूरी नजर है। उनके प्रयास तीन स्तरों पर दिखाई देते हैं। पहला, लगभग 700 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के सहारे आरबीआइ समय-समय पर बाजार में डॉलर बेचकर रुपए की गिरावट की गति को थामने का प्रयास करता है। यह व्यवस्था एक अग्निशामक की तरह काम करती है। दूसरा, रूस, यूएई और पड़ोसी देशों के साथ वोस्ट्रो खातों के माध्यम से रुपए में व्यापार शुरू करना डॉलर-निर्भरता को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। तीसरा, घरेलू अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए आरबीआइ ने रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर संतुलित रखा है। रुपए को स्थायी मजबूती देने के लिए भारत को केवल तात्कालिक उपायों से आगे बढऩा होगा। इसके लिए 'सुरक्षा' और 'रणनीति' के नए मॉडल की आवश्यकता है। भारत को अमरीका या चीन जैसे चुनिंदा बाजारों पर ज्यादा निर्भरता कम करनी होगी।
यूरोपीय संघ व अफ्रीकी देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों को प्राथमिकता देना जरूरी है। भारत का सबसे बड़ा डॉलर-व्यय तेल और सोने के आयात पर होता है। जितना कम तेल आयात होगा, उतना अधिक डॉलर देश के भीतर रहेगा। इसके साथ ही, शेयर बाजार का एफपीआइ (फॉरेन पोर्टफोलियो इंवेस्टमेंट) निवेश स्वभाव से अस्थिर होता है। भारत को ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जो विदेशी कंपनियों को यहां उत्पादन और इंफ्रास्ट्रक्चर में दीर्घकालिक निवेश यानी एफडीआइ के लिए प्रोत्साहित करें। यह भारत के लिए अपनी आर्थिक नीतियों को नए सिरे से परखने और सुधारने का अवसर भी है। हमें ऐसी 'आर्थिक इम्युनिटी' विकसित करनी होगी कि वैश्विक बाजार का कोई भी झटका हमारे रुपए की ताकत और हमारे आत्मविश्वास को कमजोर न कर सके।