संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024-25 में अकेले भारत के डेटा सेंटर्स ने लगभग 150 अरब लीटर पानी की खपत की है, जिसके 2030 तक 358 अरब लीटर पहुंचने का अनुमान है। डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी और चौबीसों घंटे बिजली की जरूरत होती है। वर्तमान में हमारे मुख्य डेटा सेंटर मुंबई, चेन्नई और बेंगलूरु जैसे क्षेत्रों में केंद्रित हैं, जो पहले से ही गंभीर जल संकट से जूझ रहे हैं।
हाल ही अमरीकी कंपनी एंथ्रोपिक द्वारा अपने सबसे शक्तिशाली एआइ मॉडल्स 'फेबल 5' और 'मायथोस 5' के उपयोग पर गैर-अमरीकियों के लिए लगाया गया प्रतिबंध वैश्विक टेक जगत के लिए बड़ा 'वेक-अप कॉल' है। यह घटना साबित करती है कि वैश्विक डिजिटल निर्भरता के इस दौर में कोई भी देश दूसरे देशों के एआइ टूल्स पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर सकता। यदि कभी अन्य प्रमुख एआइ टूल्स का रास्ता भी भारतीयों के लिए बंद हो जाए, तो हमारे बढ़ते स्टार्टअप्स और डिजिटल इकोसिस्टम का कामकाज ठप हो सकता है। ऐसे में इंडिया एआइ मिशन और स्वदेशी एलएलएम का विकास करना अब हमारी मजबूरी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीकी संप्रभुता का मामला बन गया है।
इस तकनीकी होड़ के बीच एक दूसरा बड़ा संकट भी हमारे सामने खड़ा है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024-25 में अकेले भारत के डेटा सेंटर्स ने लगभग 150 अरब लीटर पानी की खपत की है, जिसके 2030 तक 358 अरब लीटर पहुंचने का अनुमान है। डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी और चौबीसों घंटे बिजली की जरूरत होती है। वर्तमान में हमारे मुख्य डेटा सेंटर मुंबई, चेन्नई और बेंगलूरु जैसे क्षेत्रों में केंद्रित हैं, जो पहले से ही गंभीर जल संकट से जूझ रहे हैं। भारत को अपना डेटा सुरक्षा के लिए खुद का एआइ इंफ्रास्ट्रक्चर भी चाहिए। साथ ही, अपने सीमित बिजली-पानी के संसाधनों को भी बचाना है। लेकिन, यहां एक तीसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष आर्थिक व्यवहार्यता और टैलेंट का भी है। 'फेबल 5' जैसे अत्याधुनिक मॉडल्स को प्रशिक्षित करने में अरबों डॉलर का खर्च आता है। भारत के लिए उच्च क्षमता वाले चिप्स की वैश्विक कमी और शीर्ष एआइ विशेषज्ञों के ब्रेन ड्रेन को रोकना एक बड़ी ढांचागत चुनौती है। सही मायने में केवल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना पर्याप्त नहीं है, उसे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना भी जरूरी है। हमें तकनीक का अंधा विरोध किए बिना एक संतुलित मल्टी-मॉडल स्ट्रैटेजी अपनानी होगी। इस दिशा में चीन का प्रयोग एक सबक हो सकता है, जिसने कूलिंग के लिए समुद्र के नीचे डेटा सेंटर स्थापित किए हैं। भारत तीन तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है। ऐसे में अपनी विशाल तटीय रेखा का उपयोग इस तकनीक के लिए कर सकता है। इसके अलावा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में ग्रीन एनर्जी जिसमें सौर और पवन ऊर्जा शामिल है, उनके जरिए डेटा सेंटर्स को संचालित करने के जो प्रयोग हो रहे हैं, उन्हें पूरे देश में लागू करना होगा।
अब समय है कि सरकार डेटा सेंटर्स के लिए लिक्विड इमर्शन कूलिंग और उपचारित पानी का उपयोग अनिवार्य करे। अमरीकी प्रतिबंध की इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए हमें एक ऐसी संतुलित नीति बनानी होगी, जहां आत्मनिर्भर तकनीक का विकास भी हो और पर्यावरण का संरक्षण भी।